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Monday, November 21, 2016

कनमन

कनमन

साढ़े चारि‍ बजैत। हाइ स्‍कूलसँ अबि‍ते सुधीरक नजैर दरबज्‍जापर बैसल बाबा–श्‍याम सुन्‍दर–पर पड़लैन‍। बाबाक खसल मन देख दरबज्‍जा-अँगनाक बीच मोड़पर सुधीर तेकठी जकाँ ठाढ़ भेल। केमहर डेग बढ़ौत से फरि‍छेबे ने करइ। पहिने बाबाकेँ पुछिऐन जे किए मन खसल अछि‍, आकि‍ कि‍ताब रखि‍ कपड़ा बदैल आबी। रस्‍तेसँ भूखो-पि‍यास लगल अछि‍। नबे बजेक खेलहा छी...।
तेकठीक तीनू खुट्टाक बीच अपनाकेँ सुधीर पौलक जे दूटाक कनाइत तेकठी नाओं धरबैए‍ जखन कि‍ तेसरक नाओं गोड़ी भऽ जाइ छै, जेकरा ऊपर लाद लादि‍ लदाना दइ छइ। बाबाक बात बुझब सभसँ जरूरी अछि‍, मुदा बरदाएल हाथे कइए की सकबैन..?
कपड़ा बदलब ओते महत नै रखैए‍ तँए एना करी जे बाबाकेँ कहिऐन‍- हमहूँ आबि‍ गेलौं जइसँ जाबे ओ अपन बात बजता-बजता ताबे पोथी रखि आएब। कनी डेगेमे झाड़ आनए पड़त...।
सहए करैत बाजल-
बाबा, किए मन खसल अछि‍?”
कहि‍ पोथी रखए आँगन गेल। पोथी रखि श्‍याम सुन्‍दरक लग आबि‍ सुधीर बाजल-
बाबा, मन खसैक कारण की अछि‍?”
आस-नि‍आसक बीच श्‍याम सुन्‍दर ओझड़ाएल छला, तँए नजैर खसल छेलैन‍। पोताक प्रश्‍न भारी पबै छला। चालीस बर्खक संगी हेरा-फेरीमे जहल चलि‍ गेल छेलैन‍‍, तेकरे सोग रहैन। मुदा बाल-बोध लग बाजी वा नै बाजी? छि‍पाएब झूठ हएत नै छि‍पाएब सेहो तँ नीक नहि‍येँ हएत। नीकक चर्च हेबाक चाही, अधलाक तँ फलो अधले हएत...।
सोचैत-विचारैत श्‍याम सुन्‍दरक मनमे उठलैन- एहनो तँ भऽ सकैए जे छि‍पबैत-छि‍पबैत छि‍नारक छिनरपनीए छीप जाए! मुदा एहनो तँ भऽ सकैए जे एक-दोसराक अधला छि‍पबैत-छि‍पबैत छिपारेक समाज बनि‍ जाए! ..तत्-मत् करैत श्‍याम सुन्‍दर बजला-
बौआ, अखने सुनलौं जे रूपलाल जहल चलि‍ गेल। मि‍रचाइक झाँझ जकाँ वएह मनकेँ मलीन केने अछि‍।
श्‍याम सुन्‍दर जे कहि‍ अपनाकेँ हटबए चाहैथ‍ से लगले नइ हटलैन‍। कारण भेल जे जहलक नाओं सुनि‍ सुधीर दोहरा देलकैन‍-
किए रूपलाल बाबा जहल गेला?”
सुधीरक प्रश्‍न श्‍याम सुन्‍दरकेँ ज्‍वर आनि‍ देलकैन‍ मुदा ज्‍वार नै बनि‍ तुरछैत ज्‍वारि‍ तँ आबि‍ए गेल रहैन‍। बुझबैत कहलखिन-
एते पुरान रहि‍तो रूपलाल समैकेँ ठेकानबे ने केलक। पुरना चालि‍सँ आब काज चलैबला छै! बुझथुन जे केहेन दादासँ पल्‍ला पड़ल। m
शब्‍द संख्‍या- 323

आने जकाँ

आने जकाँ

हलसल-फूलसल पत्नी बजली-
आइ धरि‍ अहाँ कहि‍यो मोनसँ नै चाहलौं। सभ दि‍न बि‍गड़ले रहै छी!”
पत्नीक बात सुनि‍ क्षुब्‍ध भऽ गेलौं जे एहेन बात किए कहलैन‍? निच्‍चाँ-ऊपर देख‍ पुछलयैन-
अहाँ केते चाहै छी?”
कहलैन‍-
जहि‍ना सभकेँ देखै छि‍ऐ।
कहलयैन‍-  
आने जकाँ हमहूँ भऽ जाइ तखन ने?”m

शब्‍द संख्‍या- 46

उड़हैड़

उड़हैड़
एक तँ ओहि‍ना जुड़शीतलक भोर, चारि‍ए बजेसँ इनार चन्‍द्रकूप बनि‍ अकास-पताल एक केने, सि‍रसि‍राइत वसन्‍त सि‍र सजबै पाछू बेहाल, जे जेतइ से तेतइसँ पीह-पाह करैत, तैपर तीन दि‍नसँ एकटा नवका गप सेहो गाममे सेहो उपैक‍ गेल अछि। ओ ई जे कपरचनमा उड़हैड़‍ गेल! कपरचना उड़हैड़ गेल..!
ओना ऊपरका जहाज जकाँ स्‍त्रीगणक बीच गप हवाइ भेल मुदा पुरुखक बीच कोनो सुनि‍-गुनि‍ नहि। तँए कपरचनमाक पि‍ता–रघुनाथले धैनसन। माए कुड़बुड़ाइत रहइ, मुदा सासुक डरे मुँह नै खोलैत। ओना, परगामी भेने माइयो आ पत्नियोँक मन ओते घबाह नइ होइत। होइत तँ ओतए अछि जेतए सीमानक आड़ि‍ धारक बाढ़ि‍मे भँसिया जाइए। कपरचनमाक दादी–कुसुमा दादी–क मनमे मि‍सियो भरि‍ हलचल नहि। कोनो कि‍ बेटी जाति‍ छी जे अबलट लागत। बेटा धन छी जेतए रहत ओतए खुट्टा गाड़ि‍ कऽ रहत। कि‍यो बजैए तँ अपन मुँह दुइर करैए।
जुड़शीतल पाबैन‍, अपने हाथे कुसमा दादी इनारसँ पानि‍ भरि असीरवाद बँटबे करती। तहूमे तेहेन गप परि‍वारक उड़ल छैन‍‍ जे बाँटबो‍ जरूरीए छैन। ओना दादी अन्‍हरगरे उठली‍, मुदा पहरक ठेकान नै रहलैन‍। जखन गाममे पीह-पाह शुरू भेल तखनए फुरफुरा कऽ उठि‍ लोटा-डोल नेने इनार दि‍स बढ़ली। मनमे ईहो रहैन‍‍ जे इनार परहक असीरवाद अँगनाक अपेक्षा बेसी नीक होइ छइ। तँए सभसँ पहि‍ने इनारपर पहुँचब जरूरी बुझलैन‍। आब कि‍ कुशक जौर आकि घट थोड़े रहल, मुदा तैयो...।
इनारसँ डोल ऊपरो ने भेल छेलैन‍ कि‍ नवनगरवाली अबि‍ते देखलैन‍ जे दादी असगरे छैथ तँए अवसरक लाभ उठा ली, नइ तँ पचताइये कऽ की हएत...। उपरागी जकाँ नवनगरवाली पुछलखिन-
उढ़ड़ा एलैन‍ कि नहि?”
नवनगरवालीक बोल कुसमा दादीकेँ मि‍सियो भरि‍ नै कबकबौलकैन‍। मनमे नचैत रहैन‍‍ जे एके पीढ़ी ऊपरक लोकक ने संकोच करैए, हम तँ दू पीढ़ी छि‍ऐ। बाल-बोधक उकठपनो गपक जवाब उकठपने जकाँ दिऐ से केहेन हएत! नवनगरवालीक आँखि‍मे आँखि‍ चढ़बैत दादी बजली-
कनि‍याँ, अहाँ कहुना भेलौं तँ पोते-पोती भेलौं। कि‍छु छी कपरचना तँ बेटा धन छी। जँ केकरो लैयो कऽ चलि‍ गेल हेतै तँ सोचि‍ नेने हेतै जे ठाठसँ जि‍नगी केना बि‍ताएब। जेतए रहत जगरनथिया खन्‍ती गाड़ि देत।
भादवक बर्खा जकाँ कुसुमा दादीक मुँह बरिसैत रहैन‍। इनारक कि‍नछैड़मे कनबाहि‍ भेल दुलारपुरवाली सेहो दादीक सभ बात सुनि‍ नेने रहैथ‍। मन भि‍न-भि‍ना गेल रहैन‍। तैपर जुड़शीतलक उखमजक जे टटका-बसियाक भि‍रंत छि‍हे। टटका नीक आकि‍ बसिया? बसिया नीक आकि‍ तेबसिया? तेबसिया नीक आकि‍ अमवसिया? मुदा टटके नवनगरवालीक पक्ष लैत दुलारपुरवाली दादीक सोझ आबि बजली-
सभटा कएल हि‍नके छिऐन। दुनि‍याँमे नाओंक अकाल पड़ि‍ गेल छेलै जे कपरचनमा नाओं रखलखि‍न?”
सतैहिया बर्खाकेँ छुटैक आशामे थोड़े छोड़ल जा सकैए। बीचोमे जोगारक जरूरत ऐछे। जँ से नइ तँ बि‍ल-बाल होइत केमहर-केमहर बहि‍‍ जाएत से थोड़े बुझि‍ पेबइ। कुसमा दादी दुलारपुरवालीकेँ कहए लगलखि‍न-
तों सभ फुलक नाओंकेँ बेसी पसि‍न करै छहक, मुदा तोंही कहह जे जेते अपना गाममे फूल अछि‍ ओकर मूल्‍य कि‍ हेबाक चाही। मुदा देखै कि‍ छहक। पोताक नाओं कोनो अधला रखने छी जेहेन चालि‍-ढालि‍ देखलि‍ऐ तेहेन नाउओं रखि‍ देलि‍ऐ।
दादीक उतारा सुनि‍ नवनगरवाली मुँह चमकबैत बजली‍-
दादी, अबेर भेल जाइ छइ। एक चुरूक असीरवाद देती तँ दोथु नइ तँ अपन राखथु।
अगुआएल काजकेँ पछुआइत देख‍ दादी डोल नेनहि‍ नवनगरवालीकेँ कहलखि‍न-
मन तँ होइए जे सौंसे डोल उझैल‍ दि‍अ मुदा अखन काजक बेर अछि‍, जा तोहूँ घर-अँगना देखहक।m
शब्‍द संख्‍या- 504

मेकचो

मेकचो

पछुआ पकड़ैत मिथि‍लांचलक कि‍सानकेँ अपनो दोख ओतबे छैन‍‍ जेते सरकारक। कि‍एक तँ ओहो अपनाकेँ जनतंत्रक कि‍सान नइ बुझि‍ पेलैन‍।
पाँच बीघा जोतक कि‍सान चुल्हाइ। आठम दसकमे गहुमक खेतीक संग सरकारी खादक अनुदान आएल। बीघा भरि‍ गहुमक खेती चुल्हाइ करत। एक बोरा यूरि‍या आ एक बोरा ग्रोमर खादक पूजी लगबैक वि‍चार केलक। ओना समुचि‍त खादो आ पौष्‍टि‍क तत्वो खेतमे देब जुरब परहक फुरब भेल।
ब्‍लौकक माध्‍यमसँ खाद भेटै छइ। पाँच दि‍न बरदा चुल्हाइ भी.एल.डब्‍ल्‍यू.सँ फर्म भरौलक। तीन दि‍नक पछाइत‍‍ कर्मचारियो लि‍खि‍ देलखि‍न। दू दि‍नक पछाइत‍‍ बी.ओ. साहैबक लिखला पछाइत‍‍ फर्म ब्‍लौक-ऑफि‍स पहुँचत जे आठम दि‍न भेटतै।
फार्म जमा केला पछाइत‍‍ घरपर आबि‍ चुल्हाइ चपचपाइत‍ पत्नी लग बाजल-
ऐबेर अपन गहुमक खेती नीक हएत!”
पति‍क चपचपीमे चपचपा रूसनी चपि-चपि गैंचियाइत नजैर दैत बजली-
फगुआमे नवके पुड़ी खाएब।
तीस दि‍सम्‍बरकेँ चुल्हाइ गहुम बागु केलक। पच्‍चीस कि‍लो कट्ठा उपज भेल।  
टुटैत उपजासँ टुटल चुल्हाइक मन पत्नीकेँ कहलक-
ऐ बेरसँ नीक पौरुके भेल। चालीस कि‍लो कट्ठा भेल रहए।
रूसनी बजली-  
एना किए भेल?”
चुल्हाइ बाजल-
तेहेन चमरछोंछमे पड़ि‍ गेलौं जे मेकचो-पर-मेकचो लगैत गेल। जइसँ बागु करैमे डेढ़ मास पछुआ गेलौं! उपजा टुटि गेल!
पति‍क घाउपर मलहम लगबैत रूसनी बजली-
खेती जुआ छि‍ऐ। हारि‍-जीत चलि‍ते रहै छइ। तइले की हाथ-पएर मारि‍ बैस जाएब।
बि‍सवास भरल पत्नीक बात सुनि‍ संकल्‍पि‍त होइत चुल्हाइ बाजल-
आब एहेन फेरि‍मे नै पड़ब।m

शब्‍द संख्‍या- 216

झूटका विदाइ

झूटका वि‍दाइ

जहि‍ना हारल नटुआकेँ झूटका वि‍दाइ होइ छै तहि‍ना ने हमरो भेल! मनमे अबि‍ते प्रोफेसर रतनक चि‍न्‍तन धार ठमैक गेलैन‍।
पि‍ताक श्राद्ध-कर्म समपन्न भेलाक तेसरा दि‍न प्रोफेसर रतन दरबज्‍जाक कुर्सीपर ओंगैठ‍ कऽ बैस मने-मन बीतल काजक समीक्षा करै छला। जहि‍ना नख-सि‍खक वर्णन होइत तहि‍ना ने सि‍ख-नखक सेहो होइए। मुदा काजक समीक्षा तँ मशीन सदृश होइए, जे पार्ट पाछू लगौल जाइए आ खोलैकाल पहि‍ने खुलैए‍।
प्रोफेसर रतन छगुन्‍तामे पड़ल छैथ जे समए केतए-सँ-केतए ससैर गेल आ...। आब‍ की थारी-लोटा आ कपड़ा-लत्ताक घटबी ओइ तरहेँ अछि‍ जेना पहि‍ने छल? कहू, ई केहेन भेल जे एते रूपैआ लोटा पाछू गमा देलौं! जँ समाजक बात नै मानितौं तँ दोखी होइतो, मानलौं तँ की मानलौं! लोटाक चर्च हुनका सभकेँ नै करक चाहि‍ऐन‍। तहूमे तेना लाबा-फरही करए लगला जे इस्‍टिलि‍या केना देबै, लोहा छी अशुद्ध होइए। नियमत: फूल, पि‍तैर‍ वा ताम हेबाक चाही! चानी-सोना तँ राजा-रजबारक भेल। ..वि‍चार अनि‍वार्य भऽ गेल। फेर एहेन प्रश्‍न किए उठल जे घरही नै दऽ बच्‍चासँ बुढ़ धरि‍ जे पंच औता सभकेँ होइन। सियानोक पनि‍पीबा वएह हएत जे धि‍या-पुताक।‍ तखन तँ लोटासँ लोटकी धरि‍क ओरि‍यान करू। तहूमे तेहेन अनरनेवा गाछ जकाँ भरि‍गर गाछ ठाढ़ कऽ देलैन‍‍ जे हाइ स्‍कूलक शिक्षक–गंगाधर–लोटाक संग धोतियो बँटलैन‍। तैठाम एको अलंग नै करितैथ, से केहेन होइतैन।
बजारसँ घुमला पछाइत‍ जहि‍ना नीक वस्‍तु देखलापर‍ मनमे उमकी उठैत, आ अधला देखलापर डुबकी लि‍अ पड़ैत, सएह ने भेल...।
प्रोफेसर रतनक मन कोसी-कमलाक एकबट्ट भेल पानि‍ जकाँ घोर-मट्ठा भऽ गेलैन‍। चि‍लहोरि‍ जकाँ झपटैत पत्नीकेँ कहलखि‍न-
मन बि‍साइन-बि‍साइन भेल जाइए आ अहाकेँ एक कप चाहो ने जुड़ैए?”
पति‍क आदेश सुनि‍ सुजीता चाहक ओरि‍यान केलैन‍।
चाह दैत सुजीता, पजरामे बैस जट-जटीन जकाँ पुछलखि‍न-
की भेल जे एना मन वि‍धुआएल अछि‍?”
ओना चाहक चुस्‍कीसँ रतनक बि‍सबि‍सी थोड़े कमलैन‍ जरूर, मुदा नि‍ड़कटोवैल‍ भऽ कऽ छुटल नै छेलैन‍। ओही झोंकमे झोंकि‍ देलखि‍न-
हएत कथी झूटका वि‍दाइ भेल!”
पति‍क बात सुजीता नै बुझि‍ सकली। बुझि‍यो केना सकि‍तैथ‍। मुदा रोड़ाएल दालि‍क सुगन्‍ध जकाँ अनुमानए लगली। मनमे जे कुवाथ भेल छैन‍‍‍ से जाबे खोलता नइ, ताबे केना बुझब? जँ कोनो तेहेन बात रहि‍तैन‍ तँ एना साँप जकाँ गैंचि‍या-गैंचि‍या किए चलि‍तैथ‍! बजली-
कनी-काल अराम करू, हमरो हाथ काजेमे बाझल अछि, ओकरा सम्‍हारि‍ लइ छी।m
शब्‍द संख्‍या- 359

मुँहक खतियान

मुँहक खतियान

ऐबेर दुर्गापूजाक नव उत्‍साह अछि‍। उत्‍साहो उचि‍ते, हाले-सालमे मलेमासक वि‍दाइ भेल अछि‍‍। एक दि‍न माघ बितने तँ आशा फुरफुराइत पाँखि‍ झाड़ए लगैए‍, भलेँ पच्‍चीस दि‍नक टप-टप पाला खसैत शीतलहरी आगू किए ने हुअए। मुदा से नहि, कहि‍यो नावपर गाड़ी चढ़ैए तँ कहि‍यो गाड़ीपर नाव। तहूमे दुनूक बीच, एहेन रंग-रूपक मि‍लानी रहै छै जे दुनू दुनूकेँ पीठेपर उठबैए आ पेटेमे रखैए। से ऐबेर थोड़े हएत, तेते ने लोक रौदियाएल अछि‍ जे महारेपर सँ कुदि-कुदि‍ उमकत...।
औझुका दि‍न भगवतीक माटि‍ लेल जाएत। भोजक पाते देख‍ धि‍या-पुता चपचपाए लगैत जे खूब खेबैन। आखि‍र भोज होइते किए छइ। चारि‍ बजे भोरेसँ पीह-पाह शुरू भऽ गेल। ओना रघुनी भायकेँ बुझल रहैन‍‍ मुदा तैयो पीह-पाह नीक नै लगैत रहैन‍। कारण रहइ जे दि‍नक फल भोजन बुझि‍ क्रमि‍क काजक क्रि‍या बुझै छैथ। जाबे चौकक हवा-पानि पीबए जइतैथ, तइसँ पहिनहि चाहक चुल्हि‍ पजरल देखलैन‍।
अपन मनकमना पुरबैत तेतरा दस कप चाहक भोज केलक। भोजक सत्तैर‍‍मे भोजैत अपन बात बजि‍ते अछि, तेतरो बाजल-
भाय, ट्रेन्‍ड डरेबर भऽ गेलि‍यौ, भगवतीक दयासँ आब कोनो दुख-तकलीफ परि‍वारकेँ नै हएत।
दोकानक दोसर ब्रेंचपर पोखरिया, असामी आ रामेसर सेहो बैसल छल। तेतराक बात जेना रामेसरक छातीमे छेदि‍ केलकै तहि‍ना रामेसरकेँ झोंक चढ़ि गेलइ। बाजल-
बाप जे मरूआ लेलकै से तँ अखन तक सठाएले ने भेलइ। आ..!”
रामेसरक बात सुनि‍ते तेतरा लोढ़ियौलक। मुदा कएल की‍ जाए? दुनूकेँ थोम-थाम लगबैत रघुनी भाय कहलखि‍न-
दू घन्‍टा लोककेँ बातो बुझैमे लगतैन‍ तँए दू घन्‍टा दुनू गोरे अपन-अपन घरपर जाउ।
घर दिस रामेसर बढ़ैत बाजल-
बाढ़ि‍मे घर खसि‍ पड़ल, नइ तँ अखने बोही आनि‍ कऽ पंचक बीचमे फेक‍ दैति‍ऐ।
घरमुहाँ होइत तेतरा बाजल-
की बुझि पड़ै छै जे बबेबला सनकी अछि‍, झाड़ि‍ देबइ। जँ ओकर बाँकीए छै तँ मनुख जकाँ फुटमे कहैत।m

शब्‍द संख्‍या- 278

हूसि‍ गेल

हूसि‍ गेल

भोज खा बाबा अबि‍ते रहैथ‍ कि पोता–रमचेलबा–मन पड़लैन। तखने देखलैन‍ जे तीमन-तरकारीक मोटरी माथपर नेने दच्‍छिनसँ अबैए‍। रमचेलबाकेँ देखते बाबाक मन सहैम‍ गेलैन‍ जे सभ दि‍न पोताकेँ संग नेने जाइ छेलौं, आ...। लगले मनमे एलैन‍ जे जे पूत हरवाहि करए गेल देव-पि‍तर सभसँ गेल...। तैबीच हाथमे लोटा देख रमचेलबा लग आबि पुछि देलकैन-
केतए गेल छेलह बाबा हौ?”
बाबा अवाक भऽ गेला।मनमे उठलैन- आब तँ यएह सभ ने करत, तँए अनुकूल बना राखब जरूरी अछि। निधोख होइत बाबा बजला-
बौआ, तूँ हाटपर गेलह आ एमहर बिझो भऽ गेलै तँ की‍ करि‍तौं?”  
जहि‍ना नि‍धोख बाबा बजला तहि‍ना रमचेलबा पुछलकैन-
बनलह कि‍ने?”
बाबाकेँ मन पड़ि‍ गेलैन‍ पूर्वांचलक मणिपुरी भोज; जइमे जे वस्‍तु जेते नीक रहै छै ओ ओते पहि‍ने परोसि खुऔल जाइए। मुदा अपना ऐठाम तँ अन्नकेँ अन्न बुझनि‍हार आगूमे आएल पहि‍ल अन्नक पूजा करत...। बाबा बजला-
बौआ, नीक भेलौ जे तों नइ गेलेँ।
अपन बात सुनि‍ रमचेलबा पुछलकैन-
से की हौ?”
अनुकूल होइत रमचेलबाकेँ देख बाबा कहलखिन-
धुर! हूसा गेल।
अकचकाइत रमचेलबा पुछि देलकैन-
से की हौ?”
की कहबौ, भात-दालि‍ बड़ पवि‍त्र बनल छेलै, तैपर अल्‍लू-परोरक तरकारी तेहेन बनल छेलै जे देखि‍ए कऽ मन हलैस‍ गेल। खूब खेलौं। तेकर पछाइत‍‍ जे नीक-नीक वि‍न्‍यास सभ आबए लगलै, ओकरा दि‍स केना तकितौं!”
तब तँ खूब बनलह?”  
अपूछ भऽ गेल!”m


शब्‍द संख्‍या- 204

सरही सौबजा

सरही सौबजा


दि‍न भरि‍ सात गोरेक संग झंझारपुरि‍या वेपारी आम तोड़ि काँच-पाकल आ फुटल बेरा, टौकड़ी बना, ट्रकक प्रतिक्षामे टहलैत गामक चाहक दोकानपर आबि‍ अनेरे बजैत-
एहेन ठकान जि‍नगीमे नइ ठकाएल छेलौं, जेहेन आइ ठकेलौं!”
चाहे दोकानक छर्ड़ा बुझि‍ आनो-आन छर्ड़ा छोड़लक-
झंझरपुरि‍या तँ इलाकाकेँ ठकैए आ ओकरा ठकि‍ लेत हमर गौंआँ?”
वेपारियोकेँ मनमे कि‍छु रहै तँए पाछू हटैले तैयार नहि। बत-कटौवैल‍ एहेन चलि‍ गेल जे ने एकोटा ऐ गामक नीक अछि‍ आ ने झंझरपुरि‍या। बोलीक मारि‍ तँ धुड़-झाड़ होइत, मुदा आगू बढ़ैक साहस कि‍यो ने करए। एकटा गामक प्रति‍ष्‍ठा बुझि‍ तँ दोसर घोड़नक कटान बुझि।
ओना चौकक रोहानी ठीक छेलै कि‍एक तँ सूर्यास्‍तक समए छल। चौकक रोहानी देखते जटा भाय चाहे दोकानपर बैसला। समाजि‍क प्रश्‍न, तँए हस्‍तक्षेप कएल जा सकैए। जटा भाय पुछलखिन-
कथीक घोंघौज छी?”
झंझारपुरबला वेपारी कहलकैन-
अहीं गाममे लखनजी सँ पाँच हजारमे सौबजा आमक एकटा गाछ नेने छेलौं तइमे ठकि‍ लेलैन‍।
अपन चर्च सुनि‍ लखनजी सेहो मोबाइलि‍क दोकानपर सँ चाहक दोकानक आगूमे आबि‍ ठाढ़ भेला। वेपारीक प्रश्‍न उठि‍ते लखनजी पुछलखि‍न-
की ठकि‍ लेलौं, बाजू।
वेपारी कहलकैन-
कलमी बुझि‍ नेने छेलौं, सरही दऽ ठकि‍ लेलौं!”  
तैपर लखनजी पुछलखिन-
केतेमे नेने छेलौं आ आम केतेक भेल?”
से तँ नफगर अछि‍, पाँच हजारमे नेने छेलौं। खर्च-बर्च काटि‍ कहुना पाँच हजार बँचबे करत?”
जटा भाय पुछलखिन-
तखन जे एना बजै छी से उचि‍त भेल?”
वेपारी कहलकैन-
हमर बात दोसर अछि‍। सौबजा कलमी होइ छइ। हि‍नकर अँठियाहा छिऐन, माने सरही छिऐन। ओना साइजोमे ठीक छैन।
जटा भाय-
अहाँ केना बुझै छी जे मुँह-नाक एक रहि‍तो सरही छी?”
वेपारी कहलकैन-
चचाजी, अहूँ भासि‍ जाइ छी। कहुना भेलौं तँ वेपारी भेलौं कि‍ने। कुमारि‍-बियौहतीक भाँज जँ नै बुझबै तँ घटकैती कएल हएत?m
शब्‍द संख्‍या- 269

दुधबला

दूधबला

फगुआक समए। पीह-पाहसँ मौसमक रंग चढ़ि‍ रहल छल। दि‍नुका काज उसारि‍ नि‍त्‍यानन्‍द काका दरबज्‍जापर बैस सालक फगुआक नीक-बेजापर ऊपर-निच्चाँ वि‍चारि रहल छला। जाड़सँ गरमीक प्रवेश भऽ रहल अछि‍। ठाढ पानिकेँ इनहोराइ-ले ठंढ मारि‍ तँ सि‍रसि‍साइए पड़तै। जँ से नइ तँ इनहोराएत केना? मुदा तेहेन दोखाह दोरस हवा बहि‍‍ गेल जे सोझ बाट माने नीक रस्‍ता बाउल-गरदासँ अन्‍हरा कऽ तेहेन बहबाँरि‍ बनि‍ रहल अछि‍ जे भरि‍ मुँह बाजब कठि‍न भेल जा रहल अछि‍।
सूर्यास्‍त तँ भऽ गेल मुदा अन्‍हराएल नै छेलइ। मोटर साइकि‍लसँ उतैर‍ मनोहर नि‍त्‍यानन्‍द काकाकेँ प्रणाम करैत आगूक चौकीपर बैसल।
कि‍छु दि‍न पूर्व धरि‍ नि‍त्‍यानन्‍द काका मनोहरकेँ दूधबेच्‍चा बुझै छला, मुदा पनरह-बीस दि‍न पहि‍ने शंका जगलैन‍ से जगले रहि‍ गेलैन‍। जइसँ वि‍चार बदलए लगल छेलैन‍। मुदा कोनो वि‍चारकेँ बदलैसँ पहि‍ने ऊपर-निच्चाँ देख लेब जरूरी बुझि‍ पुछलखि‍न-
कारोबारक की हाल छह?”
नि‍त्‍यानन्‍द कक्काक उत्तर दइसँ पहि‍ने मनोहरक मनमे आएल जे जखन फगुआक सनेस अनने छिऐन तखन आगूमे रखैमे कोन लाज। अनेरे साँइक नाओं सभ जानए आ हए-हए करए!’ जुगोक तँ धर्म होइ छइ। के भँगखौका शराब नै पीबैए‍। ओ सभ तँ निशोकेँ पानि‍ उताइर‍ देने अछि‍। भाय जखन एकटा प्रेमी अछि‍ तखन तँ जि‍नगी भरि‍ प्रेम करू नइ तँ पुरुखक आँखि‍सँ गिरब ओते महत नै रखै छै जेते मौगीक आँखि‍सँ। ..मुदा अपनाकेँ सम्‍हारि‍ वि‍चारि लेब जरूरी बुझि‍ बाजल-
काका, आइक जुगमे दूध बेचने गुजर चलत, तखन तँ..?”
मनोहरक बात नि‍त्‍यानन्‍द काकाकेँ ठहकलैन‍। मुदा तेयौ मन नै मानलकैन‍ बजला-
केते गोरे गाममे दूधबेच्चा छह?”
गर पाबि‍ मनोहर बाजल-
काका, आब कि‍ कोनो गाइए-महींसिक दूध बिकाइए! आब तँ गाछसँ लऽ कऽ लोहा धरि‍क दूध बि‍काइए। केतेक नाओं कहब। जेम्‍हरे देखै छी, तेम्‍हरे सएह।
सएहक सह पाबि‍ नि‍त्‍यानन्‍द काका हूँहकारी भरलैन-
से सएह।m
शब्‍द संख्‍या- 275 

बुढ़िया दाादी, कथाकार श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल

बुढ़ि‍या दादी

नहि जानि‍ दादीकेँ एहेन क्रोध किए भऽ गेलैन‍। एक तँ औहुना बैशाख-जेठक सुखाएल जारैन‍ चरचराइत रहैए, खढ़क छाड़ल-छार पटपटाइत रहैए, तइ हि‍साबे दादियोक खटखटाएब अनुकूले भेल। दादी माने तीन पीढ़ी ऊपर नहि, गामक बनौआ दादी। नवो-नौतारि‍ बनौआ दादी होइते छैथ, उचि‍तो छइ।
आठ-दस बर्खक पोता अपन कुत्ताकेँ अनठि‍यासँ लड़ा देलक जइसँ कोनचरक सजमैनक गाछ टुटि‍ गेलैन‍, तेकरे तामस दादीकेँ पोतापर रहैन‍। जखन टुटलैन‍ तखन बाधमे रहैथ‍ तँए नै देखलखि‍न। तखन ततबे, कुत्तेक झगड़ा भरि‍।
बारह बजे बाधसँ अबि‍ते, जहि‍ना हजारो चेहराक बीच प्रेमीक नजैर प्रेमि‍कापर जा अँटैक जाइत, तहि‍ना दादीक नजैर सजमैनक गाछपर पहुँच‍‍ गेलैन‍। लटुआएल-पटुआएल पड़ल देखलखि‍न। नरसिंह तेज भेलैन‍, मुदा परि‍वारक सभ गबदी मारि‍ देलक। तँए अधडरेड़ेपर तामस अँटैक गेलैन‍। जँ अकासक पानि‍केँ धरती नै रोकए तँ पताल जाइमे देरी लगतै?
दोसर साँझ जखन बाधसँ घुमि‍ कऽ दादी एली तँ नीक जकाँ भाँज लगि‍ गेलैन‍ जे पोताक कि‍रदानीसँ गाछ नोकसान भेल। तामस लहरए लगलैन‍। छौड़ाकेँ सोर पाड़लखि‍न-
अगति‍या छेँ रौ, रौ अगति‍या?”
नाओं बदलल बुझि‍ गोवि‍न्‍दोकेँ अवसर भेटलै। अन्‍हारे गरे चौकी-दोगमे नुका रहल। अपने फुरने दादी भटभटाए लगली-
भरि‍ दि‍न छौड़ा एमहर-सँ-ओमहर ढहनाइत रहैए आ कुत्ता-वि‍लाइ तकने घुड़ैए!”  
मुदा लगले मन ठमैक गेलैन‍। भरि‍सक अँगनामे नै अछि‍, खाइ-बेर भेल जाइ छै, केतए छिछियाइ-ले गेल जे अखन धरि‍ अँगनामे नै अछि‍। पुतोहुकेँ पुछलखिन‍-
कनि‍याँ, बौआ कहाँ अछि‍।
बेटाकेँ अपन जान सुरक्षि‍त बुझि‍ पुतोहु कहलकैन-
बड़ी-काल सँ नै देखलि‍ऐ।
पोताकेँ तकैले बुढ़ि‍या दादी वि‍दा भेली।  
सुतै बेर गोवि‍न्‍दा अलि‍साएल आबि‍ दादीकेँ कहलक-
दादी बि‍छान बीछा दे।
गोवि‍न्‍दक बात सुनि‍ दादी पि‍घैल गेली। ओछाइन ओछा कऽ सुता देलखि‍न। सेन्‍धपर पकड़ल चोर जकाँ, तामस फेर करुआ गेलैन‍। मुदा नि‍नि‍याँ देवीक कोरामे गोविन्‍दाकेँ देख‍ क्रोध घोंटए लगली। मनमे उठलैन- अखन छोड़ि‍ दइ छि‍ऐ, भोरहरबामे पेशाब करैले उठेबे करत, बुझतै केहेन होइ छै सजमैनक गाछ तोड़नाइ। जाबे सभ करम नै कराएब ताबे चालि‍ नै छुटतै।
भोरहरबामे गोवि‍न्‍द दादीकेँ उठबैत बाजल-
दादी-दादी।
दादी गबदी मारैक वि‍चार केलैन‍। मुदा तीन बेरक पछाइत‍‍ तँ गरि‍येबे करत, तइसँ नीक जे तेसर हाकमे अपने बाजि‍ दिऐ। की हेतै, एकटा सजमनि‍येँक गाछ ने टुटल। फेर रोपि‍ लेब।m

शब्‍द संख्‍या- 332 

''बजन्‍ता-बुझन्‍ता'' बीीहैन कथा संग्रहक दोसर संस्‍करणसँ सँसाभार...

Tuesday, April 8, 2014

कथोप-कथन

जगदीश प्रसाद मण्‍डल जीक चारि‍ गोट लघु कथाक कथोप-कथन

भोँटक गहमी
मास्‍सैव, ओना पछि‍ला भोँट नीक जकाँ मनो ने अछि‍, मुदा ऐबेर तँ बहुत गहमा-गहमी देखै छि‍ऐ, से की?”
मास्‍सैव, अपन देश जनतंत्र छि‍ऐ, तखनि‍ कि‍ए प्रधानमंत्री के बनत से पहि‍ने लोक गर्द करै लगैए?”
बौआ, अखनि‍ सवाल अबैक समए अछि‍, तँए तोहर सवाल कागतपर लि‍खि‍ कऽ रखि‍ लेलि‍अ। पछाति‍ बुझा देबह।
मास्‍सैव, लाउडस्‍पीकरपर प्रति‍बंध लगि‍ गेल अछि‍, मुदा गाड़ीक-गाड़ी बाजा बाजि‍ रहल अछि‍ से एना कि‍ए अछि‍?”
कि‍ए अछि‍ कि‍ए नै रहत, ई वि‍चारणीय प्रश्न छी। हमर संसद तँ यएह भेल, तोहीं सभ ने काल्हि‍ पटना-दि‍ल्‍ली संसदोमे बैसबहक, कानूनो बनेबहक। आ कानून बना लागुओ करबहक।
आइ भरि‍ प्रश्न रखैक छह, काल्हि‍ सबहक बीच वाद-वि‍वाद करेबह, जँ समए बँचत तँ काल्हि‍ये नै तँ परसू, छुटल-बढ़ल सभ सवालक रस्‍ता बुझा देबह। अखनि‍ एतबे बूझि‍ लैह जे साम्राज्‍यवादी जालमे फँसल जा रहल छी।
भँसैत नाह
यात्री भाय, समधान भऽ जाउ, भऽ सकैए बीचमे कहीं भकमोड़ ने लऽ लि‍अए। अपन-अपन भार अपना-अपना ऊपर रहल। हमर केकरो ने।
जखनि‍ नाहमे सवार भेलौं तखनि‍ ओइ पार गेने बि‍ना नै छोड़ब।
कि‍यो करए आपले माएले ने बापले।
पान पराग
जगरनाथ, पान-पराग सठि‍ गेल अछि‍, दोकानसँ नेने आबह।
अखनि‍ दोकान खुजल हएत कि‍ नै?”
चाहवाली तँ अहूसँ पहि‍ने उठि‍ कऽ दोकान खोलि‍ दइ छै।
दोकानमे पराग कीनि‍, सैति‍ कऽ जीबीमे रखि‍ लीहऽ आ घुमती काल मि‍स्‍त्री सभकेँ देखने अबि‍हऽ जे उठल कि‍ नै।
सभटा झूठ-फूस बजनाहार सभ छी।
भाय, काज तँ सभ करबे करैए कि‍यो मूडसँ करैए कि‍यो भाँज पुड़बैए।
हौ, केकरो सीमा-नांगरि‍ नै छै। ने डाक्‍टरक कहने हएत आ ने नै हएत, होइ छै अपना कि‍रतबे। जँ ओकरा केने हाइतै तँ अपने कि‍ए सि‍गरेट पीब कऽ छाति‍ए जरा लइए?”
बौआ, तूँ नोकर छहक, जा कऽ डाक्‍टर साहैबकेँ कहि‍हनु जे छहटा पान-पराग खर्च अछि‍, से अपन रोजमे सँ लगैए।
मि‍स्‍त्री सभ उठल कि‍ नै?”
बाबा, मि‍स्‍त्री सभ उपराग दइए?”
अहाँ सबहक चाह सेरा कऽ पानि‍ भऽ गेल आ अहाँ सभ ओछाइनो ने छोड़लौं हेन?”
ऐ कोढ़ि‍याकेँ देखै छि‍ऐ, एहेन खेबैया अछि‍ तँ राति‍एमे ओरि‍या कऽ कि‍ए ने रखि‍ लइए?”
कथी‍ रखि‍ लइत?”
अहीले ओछाइन नै छोड़ैए।
डाक्‍टर साहैब, भरि‍ दि‍नमे छहटा पुरि‍या खाइ छी।
केते दि‍नसँ खाइ छह?”
से कि‍ कोनो दि‍न-महि‍नाक लि‍खा-पढ़ी करै छी, भरि‍ दि‍नक कमाइसँ भरि‍ दि‍न जीब लेलौं, तँ ऐसँ बेसीक आशा अनेरे कि‍ए करब। पहि‍ने शि‍खर खाइ छेलौं, रेडि‍यो-अखबार थोड़े पढ़ै छी जे आन ठीनक बात बुझबै, मुदा जइ दि‍न गामेमे एक गोरे शि‍‍खर खाइत-खाइत मरि‍ गेल तइ दि‍नसँ हमहूँ छोड़ि‍ देलि‍ऐ।
देखि‍यौ, जहि‍ना तमाकुलक रंग-रंगक वस्‍तु बना ओकर शक्‍ति‍केँ कम-बेसी कऽ लोककेँ पोलहा-पोलहा खेबाक चहटि‍ लगबैए तहि‍ना तँ चाहो अछि‍ए, तहूमे जँ कौफी फेँटि‍ देलि‍ऐ तँ आरो बेसी रंग चढ़ा दइ छै। तेतबे कि‍ए, एकटा संगी छथि‍ ओ चाहेमे अफीम फेँटि‍ दइ छथि‍। खैर छोड़ू ऐ बातकेँ?”
डाक्‍टर साहैब, अखने कनी पहि‍ने तमाकुलक खि‍धांस रेडि‍योमे सुनलौं...?”
अहाँ तँ रेडि‍योक समाचार कहै छी, सत् बजैए कि‍ फूसि‍ तइ पाछू अनेरे कि‍ए बौआएब। डाक्‍टर बाबा पढ़बै काल तीन दि‍न कहलथि‍ हेन।
बाबा, अहाँक पएर छूबि‍ कहै छी जे आइ दि‍नसँ पान-पराग नै खाएब।
बौआ जगरनाथ, जखने जागी तखने परात। अखनि‍ धरि‍ जे तोहर नि‍श्छल निर्मल जि‍नगी रहलह, ओहने हमरो भेटए, तँए तोड़े सप्‍पत खा, आइसँ पान-पराग छोड़ि‍ देब।
बाबा, अहाँ जे एते कमेलि‍ऐ से अहीले तीनमहला छोड़ि‍ एकमहलमे बुढ़ाड़ी बि‍‍ताएब?”
तीनि‍येँटा कोठरीक मकानमे रहब नीक लागत?”
से ते मनमे हेबे करत, मुदा ओही मनकेँ रबाड़ि‍ पकड़ि‍ अपन जि‍नगीक संग रगड़बै। तहूमे दुइए परानी भेलौं आ तेसर जगरनाथ भेल। अनेरे कम्‍पाउण्‍डर-नर्स इत्‍यादि‍ रखैक कोन जरूरत अछि‍। जे रोगी औत ओकरा देखि‍-सुनि‍ लेबै। तइले बेसी घरक खगते कोन अछि‍। चारूकात छहर देबाल जोड़ि‍ घेरि‍ देबै, अपना रहैक, खाइ-पीबैक आ नहाइ-धोइक घर सहि‍टमे बनल रहत तइसँ कि‍ए आसकति‍ हएत। आसकति‍ तँ ओइठाम होइ छै जैठाम नि‍च्‍चाँ-ऊपर सीढ़ी टपए पड़ै छै।
जँ कहि‍यो बेटा-पुतोहु औता, तखनि‍ ओ सभ केतए रहता?”
ऊपरमे तँ खालीए रहत कि‍ने, अबैए काल वि‍चारि‍ लेता जे केते समए रहैक अछि‍ तइ हि‍साबसँ अपन ओरि‍यान केने औता।
मन-तन खराप हएत, तखनि‍ कि‍ करबै?”
अपनो ने डाक्‍टरो छी। आन रोगीक बात नहि‍योँ बुझबै कि‍एक तँ बहुत बात बहुत रोगी बाजि‍तो ने अछि‍, मुदा अपन देहक पीड़ाक अनुभव तँ अपने हएत। तइ हि‍साबसँ हि‍फाजत केने तँ काज चलि‍ सकैए। तखनि‍ तँ ई देहे काँच-माटि‍क बनल अछि‍, एकर केते बि‍सवास।
बाबा, अपने काजकेँ पछुअबै छि‍ऐ जेतेकाल गप-सप्‍प करबै तेते देरी हएत।
सि‍रमा
बाबा, पुरनाकेँ बदलि‍ दि‍यौ, सभ कि‍छु नवका अनलौं अछि‍।
बाउ मुरारि‍, अपना जनैत तँ नीके जानि‍ अनने छह, तँए बदलबे करब। मुदा...?”
बौआ, जे लूँगी फटि‍ जाइए ओकर सि‍रमो खोल बना लइ छी आ रूमालो बना लइ छी, तँए पाँच तह अछि‍। सालमे एकबेर जुड़शीतल दि‍न खीचि‍ कऽ खोलो सुखा लइ छी आ पेटमे जे देने छी तेकरो रौद लगा लइ छी।
बौआ, जइ दि‍न ई चद्दरि‍ कीनलौं, ओही दि‍न एकटा केसमे सजा भऽ गेल, दुनूक (अपनो आ चद्दरि‍ओक) बीच पहि‍ल भेँट जहलेमे भेल। अखनो मन अछि‍ जे नि‍रदोस चद्दरि‍ संगे जहल कटलक, केना बि‍सरि‍ जेबै?”
बाबा, प्रेम कहलि‍ऐ?”
हँ-हँ, जे सालमे गाहीक गाही कपड़ा कीनत ओ केकरासँ प्रेम करत, प्रेम तँ ओ भेल जे जि‍नगी भरि‍ प्रेमसँ संगे रहल। जीबैतमे जे रहल से तँ रहबे कएल, जे मुइला पछाति‍ओ सि‍रमेमे रखने छी।
बाबा, जखनि‍ चद्दरि‍क इति‍हास-बात कहि‍ए देलि‍ऐ तखनि‍ बँकि‍योहोक कहि‍ए दि‍यौ?”
बौआ, जहि‍एसँ धोती पहि‍रैमे नीक लागए लगल तहि‍एसँ फाटब शुरू भेल। मुदा बात दोसर दि‍स बहकि‍ जाएत।
ईहो कीनने छि‍ऐ?”
नै, ई धोती जहलेमे देने रहए।
बौआ, जि‍ला भरि‍क लोक कोसी नहरि‍ आ पनि‍बि‍जली डैमक संग मैथि‍ली भाषाक मांग करैत जहल गेेलौं। पनरह दि‍न रखलक। सोलहम दि‍न एक-एकटा धोती दऽ वि‍दा केलक, वएह धोती छी।
बाबा, जखनि‍ चद्दरि‍-धोतीक बात कहि‍ए देलि‍ऐ तखनि‍ लूँगीओ-गमछाक कहि‍ दि‍यौ।
बौआ, ईहो जहलेक छी। अपन कीनल लूँगीक सि‍रमाक खोल छी आ जहलक लूँगीकेँ पेटभर देने छि‍ऐ।
बाबा, नवका सि‍रमा नै लेबै?”
हँ हौ, कि‍ए ने लेब मुदा चारूक एक-एकटा कोन काटि‍ नवकाक पेटमे भरि‍ दहक, जाबे जीबैत रहब ताबे माथ टेकने रहब।



Monday, September 10, 2012

पटोटन :: जगदीश प्रसाद मण्‍डल


पटोटन

अद्राक पहि‍ल बरखा। मास्‍टर सहाएब आ बड़ाबाबू, दुनू गोटे एक्के मोटर साइकि‍लसँ गामसँ झंझारपुर जाइत रहथि‍। साते कि‍लोमीटर झंझारपुर तँए दुनू गोटे गामेसँ जाइ अबै छथि‍। थानाक बड़ाबाबू नै कोर्टक बड़ाबाबू देवनन्‍दन आ हाइस्‍कूलक शि‍क्षक प्रेमनन्‍दन। ओना दुनू गोटे शहरूआसँ बेसी गमैइये छथि‍ मुदा तैयो कलप कएल कपड़ा पहीरि‍ कऽ ऐबे-जेबे करै छथि‍।
पँचकोशीमे सि‍ंहेश्वरक नाओं एकटा नीक घरहटि‍याक रूपमे लोक जनैत। ओना नाउऍं तँ नाआें छी, तइमे तँ कमी नै भेलनि‍ अछि‍ मुदा परदेशि‍याक कमाइ आ इन्‍दि‍रा आवासक चलैत काजमे कमी तँ भइये गेलनि‍ अछि‍। उमेर बेसी भेने मनमे खुशि‍ये होइत रहै छन्‍हि‍ जे भने काज कमि‍ रहल अछि‍। एक तँ परदेश भगने नव घरहटि‍या नै बनि‍ रहल अछि‍, दोसर हमहीं सभ जे पुरना पाँच गोटे छी सएह कते सम्‍हारब।
ब्रह्मपुर गाममे प्रवेश करि‍ते बुन्‍दाबुन्‍दी पानि‍ शुरू भेल। बड़ाबाबू ड्रइवरी करैत आ मास्‍टर सहाएब पाछूमे बैसल। बुन तँ गोटगर पड़ैत रहै मुदा कम-सम। बीत-डेढ़ बीतक दूरीपर बुन खसै तँए कपड़ा सोखनहि‍ चलि‍ जाइत मुदा जते आगू बढ़ैत छलाह तते मानि‍यो बेशि‍आएल जाइत। बढ़ैत-बढ़ैत सि‍ंहेश्वर घर लग अबि‍ते अँटकि‍‍ जाएब नीक बुझलनि‍। सड़केपर गाड़ी लगा दुनू गाटे सि‍हेश्वरक दरबज्‍जापर पहुँचलाह। दरबज्‍जा कि‍ मालक घर। अाधा घरमे माल बन्‍हैत आधामे दरबज्‍जा बनौने। दरबज्‍जा कि‍ एकटा चौकी मात्र। सि‍ंहेश्‍वर अपने दरबज्‍जेपर। चारसँ चुबैत बुन्नकेँ नि‍हारि‍-नि‍हारि‍ देखैत जे रौदमे फाटि‍ गेल अछि‍ आ कि‍ कौआ खोदने अछि‍। मुदा लगले मन पड़ि‍ गेलनि‍ आद्रा आबि‍ गेल, घर कहाँ छाड़लौं। तखने दुनू गोटे पहुँचलाह। चौकीपर उठि‍ सि‍ंहेश्वर दुनू गोटेकेँ बाँहि‍ पकड़ि‍ चौकीपर बैसबैत अपनो बैसलाह। तड़तड़ौआ बरखा शुरू भेल। कलप कएल कपड़ापर खढ़क चुबाटसँ कपड़ा दुइर होइए। एक तँ बेचारेकेँ अपने मनमे दुख होइत हेकतनि‍ जे केना साल खेपब तइपरसँ हमहूँ भारी बना दि‍अनि‍ ओ उचि‍त नै। दागे लगत तँ कि‍ हेतै, कोनो कि‍ केरा-दारीमक दाग छी जे नै छूटत। मुदा बड़ाबाबूकेँ मुँहसँ बजा गेलनि‍-
अहाँक नाओं पँचकोसीमे अछि‍ सि‍ंहेश्वर भाय, मुदा अपना घरक हालत एहेन बनौने छी?”
बड़ाबाबूक वि‍चारसँ सहमत होइत सि‍ंहेश्वर बाजल-

बड़ाबाबू, गामसँ लोककेँ भगने गाममे काज बढ़ि‍ गेल अछि‍, मुदा काजक धुनि‍ तेहेन पकड़ि‍ लेलक जे ठेकाने ने रहल जे बरखा मास आबि‍ गेल। आब पानि‍ छुटैए तँ नै छाड़ल हएत तँ पटोटनो तँ दइये देबै।

मुसाइ पंडि‍त :: जगदीश प्रसाद मण्‍डल


मुसाइ पंडि‍त

गाममे वि‍ख्‍यात मुसाइ पंडि‍त छथि‍। ओहन पंडि‍त जि‍नकर बात मुसाइये पंडि‍तक नाओंसँ वि‍ख्‍यात अछि‍।

मध्‍यम् जाति‍क मुसाइ पंडि‍त, माइक कोरपच्‍छु बेटा भेने, दौजी फड़ जकाँ तीन सालमे माए आ सात सालमे पि‍ताक श्राद्ध केलनि‍। मुदा बाल-वि‍वाहक शुभ फल भेटि‍ गेल रहनि‍। पि‍ताक श्राद्धसँ तीन मास पहि‍ने बि‍आह भऽ गेलनि‍। जँ कहीं तीन मास पछुऐतथि‍ तँ सि‍मरि‍या गाड़ी जकाँ मास नै कऽ पबि‍तथि‍, मुदा भाग्‍य तँ भाग्‍य छी, से मुसाइ पंडि‍तकेँ सुतरलनि‍। जेकरा माए-बाप रहै छै तेकरा तँ पोथी-पतरा काज दइते छैक जे बि‍नु-भाइयो-बापबलाकेँ सुतरल। मुसाइ पंडि‍त पि‍ताक श्राद्धक तीन दि‍न पछाति‍ ससुरकेँ अरि‍आतए काल पुछलनि‍-
बाबू, आब तँ यएह सभ ने माता-पि‍ता भेला, हमरा कि‍ हएत? भाय-भौजाइक हालत अपनो गाममे देखि‍ते हेथि‍न।
जमाइक प्रश्न सुनि‍ कमलाकान्‍त गुम्‍म भऽ गेलाह। मने-मन वि‍चारए लगलाह जे बेटी-जमाइक भार उठाएब भारी होइ छै। फेर मन घुमलनि‍ जे भगि‍नमान तँ कुलश्रेष्‍ठ होइए। मुदा लगले मन बदलि‍ गेेलनि‍। घी-जमाए भगि‍ना, जहि‍ना घरमे सि‍दहामे नै रहने भूखक लहरि‍ जोर पकड़ै छै तहि‍ना आगूक जि‍नगी मुसाइकेँ जोर मारलक। दोहरबैत बाजल-
बाबू, कि‍छु बजलखि‍न नै?”
कमलाकान्‍तक मन फेर बहटलनि‍। पत्नीसँ पूछि‍ लेब जरूरी अछि‍, मुदा से खोलि‍ कऽ केना समधि‍यौरमे जमाए लग बाजब। बेटोकेँ तँ पूछि‍ लेब अछि‍। मुदा पुतोहु बेरमे पुछबे ने केलौं आ बेटी-जमाए बेरमे कि‍अए पुछबै। मन बनि‍ते बजलाह-
दुनू भाय-भौजाइकेँ बजबि‍औ। आखि‍र माता-पि‍ताक परोछ भेने तँ वएह सब ने माता-पि‍ता भेलाह।
मुसाइ दुनू भाँइकेँ पुछलक। एक तँ ओहना लोकक घराड़ी घटल जाइ छै तइपर जँ बढ़ि‍ जाए, ई के नै चाहत। दुनू भाँइयो आ भौजाइओ मुसाइकेँ सासुर जाइक आदेश दऽ देलक। गाए-नेरूक मि‍लान तँ ठेहुने-पानि‍ दुहान।
कमलाकान्‍त संगे चलए कहि‍ पुछलखि‍न-
कपड़ो-लत्ता लेब।
मुसाइ- हँ, हँ, जते सरधुआ कपड़ा अछि‍ ओ जँ नै लऽ लेब तँ ऐठाम मूसे-दि‍वार खा जाएत।

एक तँ ओहि‍ना मुसाइ सहलोल, तइपर सासुरक वि‍द्यालय पहुँचि‍ गेल। सासुरँ जँ सारि‍-सरहोजि‍सँ गलथोथरि‍मे हाि‍र जाएब तँ कोन डोराडोरि‍बला भेलौं। जहि‍ना वि‍षुवत रेखाक समान दूरीपर दुनू दि‍शा समान मैसम होइत तहि‍ना अन्‍हार-इजोतक बीच सेहो होइत अछि‍।

पच्‍चीस बर्खक अवस्‍थामे मुसाइ सासुरसँ मुसाइ पंडि‍त भऽ दूटा धि‍या-पुता नेने गाम आबि‍ गेलाह। जहि‍ना फुटलो खपटाक जरूरति‍ समए पाब होइ छै तहि‍ना मुसाइ पंडि‍तक जरूरति‍ गाममे आइ भेल।
मौसमी बेमारीक जानकारी दि‍अ गाममे बहरबैया सभ औताह जखने सँ मुसाइ पंडि‍त सुनलक तखनेसँ मटि‍या तेल देलहा कुत्ता जकाँ मनमे उड़ी-बीड़ी लगि‍ गेलनि‍।

जहि‍ना समए ि‍नर्धारि‍त छल तहि‍ना कार्यक्रम शुरू भेल। अभ्‍यागती सुआगत सभकेँ भेलनि‍। बारहो मासक मौसमी बेमारी आ ओइसँ पथ-परहेजक नीक जानकारी देलखि‍न। गाममे नव फल भेटल। बीचमे बैसल मुसाइ पंडि‍त सुनैपर कम धि‍यान देने रहए। संगसोरमे जहि‍ना लोक हरेलहो जगहपर गपे-गपमे पहुँचि‍ जाइत अछि‍ तहि‍ना मुसाइ पंडि‍त सेहो पहुँचि‍ गेलाह। हड़लनि‍ ने फुड़लनि‍ उठि‍ कऽ बीचमे ठाढ़ भऽ गेला। ठाढ़ होइते बैसि‍नि‍हारक आँखि‍ पड़ै लगलनि‍। दुनू हाथसँ शान्‍ति‍ बना रखैक इशारा दैत बजलाह-
अभ्‍यागत लोकनि‍क वि‍चार उत्तम अछि‍, सभकेँ अनुकरण करैक चाहि‍यनि‍।

अपन समर्थन पाबि‍ बाहरी लोकनि‍ आरो अगि‍ला बात सुनैले जि‍ज्ञासा जगौलनि‍। मुदा जे पहि‍ने बाजत ओ चोर गाम-घरक खेलक मंत्र छै। तँए आँखि‍, कान तँ मुसाइ पंडि‍त दि‍स सभ देलनि‍ मुदा मुँह घुमौनहि‍ रहला। मुसाइ पंडि‍त लेल धनि‍ सन। कहि‍या लोक हमर बात सुनलक आ देखलक। सुनह नै सुनह, मनक उदगार छी, बजबे करब। मुदा सइयो आँखि‍ भीष्‍म–पि‍तामह जकाँ गड़ल देखि‍ सम्‍हरैत मुसाइ पंडि‍त बजलाह-
आम-जामुन इलाकाक हाड़-पाँजर टुटब, कि‍सानी ज्ञानमे साँप-कीड़ा काटब, हाड़मे पैसल जाड़केँ सेहो तँ देखए पड़त?”
गौंआँ वक्‍ता बूझि‍ जोरसँ सभ थोपड़ी बजौलक मुदा थोपड़ी सुनि‍ मुसाइ पंडि‍त अकवकमे पड़ि‍ गेलाह जे लोकक थोपड़ीक अवाज की छल। हास हँसी आकि‍ हँसी हास।

गुहारि‍ :: जगदीश प्रसाद मण्‍डल


कमला कातक नवटोलीक गहबर बड़ जगताजोर। सएह सुनि‍ अपनो गुहारि‍ करबैक वि‍चार भेल। भाँज लगेलौं तँ पता चलल जे तीनू वेरागन-सोम, बुध आ शुक्र- भगता भाउ खेलाइ छथि‍ मुदा शुक्र दि‍नकेँ तँ साक्षात् भगवति‍येक आवाहन रहै छन्‍हि‍। मन थि‍र भेल। डाली लगबए पड़ै छै तँए ओरि‍यौनक वि‍चार भेल। मन भेल जे पत्नीकेँ डाली ओरयौनक भार दि‍यनि‍। मुदा बोलकेँ रोकि‍ वि‍चार कहलक- देवालयक काज छी, एकोरत्ती कुभाँज भेने गुहारि‍यो उनटे हएत। डालीक बौस बाजरसँ कीनए पड़त। मुदा सस्‍ता दुआरे जनि‍जाति‍ उनटा-पुनटा बौस कीन लेतीह।
मन उनटि‍ गेल। अपने हाथे कि‍नैक ि‍नर्णए केलौं।

बाजार पहुँच फूल काढ़ल सीकीक रँगर डालीक संग बेसि‍ये दाम दऽ दऽ नीक-नीक बौस कीनलौं। मन पड़ल जे भरि‍ दि‍न उपास करए पड़त। चाहो तक नै पीब सकै छी। जँ पीबैओक मन हएत तँ गोसाँइ उगैसँ पहि‍ने भलहि‍ं पीब लेब।
तनावसँ भरि‍ दि‍न मन उदग्‍नि‍ रहैए। ने काज करैक मन होइए आ ने कि‍यो सोहाइए। एहेन तनाव दुि‍नयाँमे ककरो भरि‍सके हेतै।
कोन जालमे पड़ि‍ गेल छी। तहूमे एकटा रहए तब ने। जालक-जाल लागल अछि‍। जमीन-जत्‍थाक जाल, जन-जाल, मन-जाल, तन-जाल, शब्‍द-जाल, अर्थ-जाल, वि‍चार-जाल, वाक्-जाल नै जानि‍ कते जाल बनौनि‍हार कते जाल बना कऽ पसारि‍ देने अछि‍। एक तँ ओहि‍ना इचना माछ जकाँ लटपटाएल छी तइपरसँ जालक-जाल। गैंचीक नजरि तँ‍ नै जे ससरि‍-फसरि‍ छछारी कटैत जान बचा सोलहन्नी जि‍नगी पाबि‍ लेब। तँए नवटोलीक गहबरमे डाली लगेलौं।

गुहरि‍याक कमी नै। अकलबेरेसँ गुहरि‍या पहुँच पति‍यानी लगा बैस गेल। गहबरक भीतर भगत बैस धि‍यान मग्‍न भऽ गेलाह। गहबरसँ उदेलि‍त भाव भगतक हृदैकेँ कम्‍पि‍त करैत। गुहारि‍ करए बाहर नि‍कलल। हाथमे जगरनथि‍या बेंतक छड़ी लेने। भगत गुहारि‍ शुरू करैत कहलखि‍न- भगत-अश्रमसँ श्रमक बाट पकड़ि‍ चलि‍ जाउ। आगू कि‍छु ने हएत।
भगतक पछाति‍ डलि‍वाह कहथि‍न- पाछु घुि‍र नै ताकब। कतबो जोगि‍न सभ कानि‍-कानि‍ कि‍अए ने बजए मुदा घुरि‍ नै ताकब।

हमरो नम्‍बर लगि‍चएल। मुदा एक्के वाक् सुनि‍ उत्‍सुकता ओते नहि‍ये रहए जते नव वाक् सुनैक होइत। अनेरे मनमे तुलसीक वि‍चार उठि‍ गेल। कहने छथि‍ जे जेकरा जंजाल रहै छै तेकरा ने चि‍न्‍ता होइ छै। जकरा नै छै?
तही बीच भगत सोझमे आबि‍ गेलाह। पैछले बातकेँ दोहरबैत एकटा नव बात पुछलनि‍- छुटि‍ गेल कि‍ने?”
बि‍नु तारतमे बजा गेल- हँ।

वि‍दा भेलौं। बाटमे वि‍चारए लगलौं जे अश्रमक अर्थ कि‍ होइ छै। मुदा कोनो अर्थे ने लागल। हारि‍ कऽ ऐ नि‍ष्‍कर्षपर एलौं जे एक सोगे आएल छलौं दोसर लेने जाइ छी।

गाम अबि‍ते टोल-पड़ोसक लोक भेँट करए आबए लगलाह। सभ एक्के बात पुछथि‍- की भेल?”
कि‍छु गोटेकेँ प्रश्ने बना कहलि‍यनि‍- अश्रमक अर्थे ने बुझलौं। अहीं कहू। मुदा जते मुँह तते रँगक उत्तर भेटऽ लगल। सुनैत-सनैत मन घोर-मट्ठा भऽ गेल। पछाति‍ जे कि‍यो पूछथि‍ तँ कहए लगलि‍यनि‍- जहि‍ना छलौं तहि‍ना छी।-2
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