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Sunday, July 5, 2015

देह

लगभग एक वर्ष बाद लघुकथा लिखबाक प्रयास केलहु ।ई लिखबाक हिस्सक छुटि गेल छल ।केहन बनलै से जरूर बताएब ।
लघुकथा - 186
देह

लालबाबूकेँ देख कऽ आबि रहल छी ।बुझू तऽ अंतिमे दर्शन छल ।आब बचबाक कोनो चान्स नै छै ।बड पैघ हैमरेज भेल छै ।एकटा आँखि बाहर भऽ गेल छै ।देखिते मोन हौरऽ लागल तेँ हाॅस्पिटलसँ चलि एलियै ।आबिते कनियाँ गहूँम पिसेबाक लेल कहि देलनि ।हमर मोन कोनादन कऽ रहल छल ।देहमे शक्ति नै बुझना जाइत छल ।हम दबले अबाजमे कहलियनि, " हे यै, आइ हमरासँ गहूँमक बोरा नै उठाएल हएत ।आइ छोड़ू ।साँझमे भाते बना लेब ।"
ई सुनिते कनियाँ तामसे चिकरऽ लागली ," बुझल अछि ने जे हमरा सोहारिये नीक लगैत छै ।एते टा चकत्ता सन देह पोसने छी तखनो बोरा नै उठत !"
बुझू तऽ ई सुनिते हमर रोआँ भुलकि गेल ।लालबाबूक कल्हुका बलिष्ठ देह आ अझुका मरनासन्न देह देख अपन कनियाँक अज्ञानतापर आश्चर्य भऽ रहल छल ।आखिर देह कते दिन एक समान रूपसँ संग दै छै ?

अमित मिश्र

Friday, January 3, 2014

खबरिक मोल

170. खबरिक मोल

पूरा परोपट्टामे शोकक लहरि दौड़ गेल छलै ।सभक आँखि नोराएल छलै ।जिनगी भरि समाजक सेवा करऽ बला युवा समाजसेवी रामशंकर लालकेँ किछु अज्ञात अपराधी हत्या कऽ देने छलै ।धरती-अकाश चित्कार कऽ उठल छल ।पुलीस आएल ।पोस्टमार्टम करेलक ।जाँचक अश्वासन देलक आ चलि गेल । दोसर दिन परोपट्टाक लोक जाँचक खबरि जनबाक लेल उत्सुक छल ।भोरे-भोर कतेको जोड़ा आँखि अखबारमे खबरि ताकऽ लागल, मुदा... रामशंकर लालक बारेमे कोनो खबरि नै छपल छलै । हँ सब अखबारक मुख्य पृष्ठपर एते जरूर छपल छलै जे एकटा लोकप्रिय अभिनेत्रीक पिल्लीकेँ चारि टा बच्चा भेलैए ।

अमित मिश्र

Thursday, January 2, 2014

प्रभाव

169. प्रभाव

बीस टा लाउडिस्पिकरसँ बहराइत झमकौआ गीत दसो दिशाकेँ झनझना रहल छल ।मंचपर नर्तकी अंग प्रदर्शन करैत डाँर लचका रहल छल ।मंचक एक कोनमे गामक किछु कहबैका/नेताक द्वारा दारूक बोतल तोड़ल जा रहल छल ।किछु तँ दारूक नशा संग अश्लील इशारा करैत नर्तकीक संग नाचि रहल छल आ किछु पैसा उड़ा रहल छल ।मंचपर नर्तकीक संग नाचैत पति, बेटा आ बापकेँ दर्शक दिर्घामे बैसल ओकर पत्नी, माए आ बेटा-बेटी देख रहल छल ।दोसर दिन पक्किया खबरि उड़लै जे मंचासिन दू कहबैकाक बेटी-बेटा ककरो संग अश्लील काज करैत पकड़ाएल ।

अमित मिश्र

Sunday, November 17, 2013

अजीब प्रश्न

168. अजीब प्रश्न

"की अहाँ हमरासँ प्रेम करैत छी ?" बड अजीब प्रश्न पूछल गेल छल । आइ बारह वर्षक बाद अजयकेँ हुनक पूर्व प्रेमिका भेंटि रहल छली । एहन अवसरपर प्रेमिका द्वारा पूछल गेल प्रश्नक इच्छा तँ अजयकेँ नहिंये टा छल ।अपनाकेँ सम्हारैत अजय बाजल "इहो कोनो पूछैक बात छै ! अहाँ तँ हमर जीवनक निर्देशक छी ।अहीं तँ हमर साधना छी ।हमर प्रेमक डोरि तँ सदिखन अहाँसँ जुड़ल अछि ।" कहुना कऽ अपन बात पूरा करैत-करैत घामसँ नहा गेल छल अजय । अजयक स्वीकारोक्ति सूनि प्रेमिका बजली " तखन हमर एकटा काज कऽ अपन प्रेमक परीक्षा दिअ । अहाँ हमरा एकटा सन्तान दऽ दिअ ... आब गारि-मारि सहन नै होइत अछि ... बस एक राति लेल संग... ।" बात पूरा नै भऽ सकल ।आँखि नोरा गेल छलै आ कण्ठसँ सिसकारी फूटऽ लागल छलै जाहिमे आगूक शब्द दबि गेल छलै ।अजयक मोनमे भयंकर चक्रबात उठि गेल छल ।जबाब की देल जाए ? किछु फुराइते नै छलै ।बेर-बेर एतबे सोचैत छल, पैघ नाक बाला ई समाज कतेक प्रतारित करैत अछि जे कोनो वियाहल नारी एतेक नीच काज करबाक लेल मजबूर भऽ जाइत अछि !

अमित मिश्र

Wednesday, November 13, 2013

उलाएल

167. उलाएल

दू टा दोस्त गामक स्थितिपर चर्चा कऽ रहल छल ।पहिल दोस्त दोसरकेँ कहलक "चुन्नू बाबूकेँ देखलहीं ।राजासँ रंक बनल जा रहल छथिन ।कते दुर्गति भऽ रहल छन्हि !ऊपर मुँहें जाइ वला विजनेस नीचाँ मुँहे किए जाए लागलै ?"
दोसर दोस्त किछु क्षण सोचलक आ फेर कहलक "हुनकर हाल उलाएल धान जकाँ भेल छै ।उलाएल बीया कखनो नै जन्मै छै ।चुन्नू बाबूकेँ टाकाक घमण्ड भऽ गेल छलनि ।घमण्डक धाहमे हुनक लूरि-बुधि सब उला गेलै, तेँ ओ विजनेसमे नूतनता नै आनलनि आ रंग बनि गेलनि ।असलमे घमण्डे सबकेँ नीचाँ मुँहें लऽ जाइ छै ।बुझलें ।"

अमित मिश्र

Tuesday, November 12, 2013

सेनूर

166. सेनूर

रातिक बारह बाजैत छल ।गुज-गुज अन्हिया आ डेराउन चुप्पी चारू दिस विराजमान छल ।एकाएक मनोजक नीन टूटि गेलै ।चेहा कऽ उठल तँ बगलमे पत्नीकेँ नै देखलक ।मोने मोन शंका ग्रस्त हुअ लागल ।घरसँ बाहर आएत तँ आँगनमे दू गोटाक खुसुर-पुसुर सुनाइ देलकै ।एकटा पुरूष स्वर आ एकटा नारी स्वर आबैत छल ।पुरूष बाजल "देख, आब तूँ प्लान अन्तीम भाग पूरा कर ।मनोज लऽग बड सम्पति छै ।ओकरा मारि कऽ ओकर मलकाइन तूँ बनि जो ।फेर दुनू गोटा वियाह कऽ लेब ।"
नारी स्वर तीव्र गतिसँ बहराएल "नै, ई हमरा बुते नै हेतौ ।"
पुरूष फेर बुझाबऽ लागल "सप्पत नै तोड़ ।दुनू गोटाक प्रेम एकरा मरलाक बादे सफल हेतै ।"
तामसमे डूबल नारी स्वर फूटल "प्रेम प्रेम प्रेम बड भेलौ ।आब अपन प्रेम मरि गेलौ ।हम तोहर संग देलियै किए तँ तखन कर्ज मुक्त छलियै, मुदा... आब हमरापर सेनूरक कर्ज अछि ।मनोज हमरा अनमोल सेनूर देलनि ।हम अपन प्राणो दऽ कऽ एकर कर्ज नै चुका सकै छीयै, ओकर प्राण लेनाइ दूर कए बात छै ।"

अमित मिश्र

Sunday, November 3, 2013

दिवाली

164. दिवाली

दूइये दिन बाद दिवाली छै ।गाम-घरमे सफाइ अभियान चरमपर छै, मुदा लक्ष्मी देवीक घर झोल लागले छै ।घरसँ सिलाइ मशीनक खट-खट स्वर बहरा रहल अछि ।ई देख लक्ष्मीक पड़ोसी आ प्रिय सहेली गौड़ी लक्ष्मी लऽग एली ।कपड़ा सीबैत देख बाजली "यै लक्ष्मी बहिन, अहाँ एखन धरि एतबेमे बाझल छी ।यै दिवालीक तैयारी नै करबै की ?"
गौड़ीक बात सूनि लक्ष्मी सीनाइ छोड़ि कऽ बाजल "हम कथिक तैयारी करब !अहाँकें तँ बुझले अछि ने जे हमर दिवाली इएह थिक ।हम तँ घऽर-तऽर साफ कऽ, दीप-तीप बारि कऽ तहिये दिवाली मनेबै जहिया हमरा बेटा सुधरि जाएत । "
"मुदा, ओकरा तँ दारू-गाजा-जुआक लत कहियो नै छुटऽ बाला अछि ।"ई कहि गौड़ी जेना घाउपर नोन छीट देने होइ, लक्ष्म छिलमिला उठल फेर सम्हरैत बाजल "तखन अहीं कहू कोना दिवाली मनाबियै ?कपड़ा सीब कऽ अपन पेट भरिते नै अछि, दीपक पेट तेलसँ कोना भरियै ?यै बहिन हमरा विश्वास अछि जे हमरो बेटा सुधरत, कमाएत आ हमरो घर दिवाली मनाएल जेतै..." बाजिते-बाजिते लक्ष्मीक आँखिसँ दू ठोप नोर खसि पड़ल ।

*दिवालीक हार्दिक शुभकामनाक संग हम
अमित मिश्र *

Saturday, November 2, 2013

दीप

163. दीप

एकटा बूढ़ कुम्हार शहरक अतिव्यस्त बाटपर ठाढ़ छल ।माँथपर छीट्टा छलै जाहिमे नीक नीक कलाकृतिसँ सजल दीप राखल छलै ।छीट्टाक बोझसँ वा उमरक प्रभावसँ ओकर डाँर झूकि गेल छलै ।गाड़ीकेँ रुकैत देख ओ झट दऽ ओकरा लऽग पहुँचि जाइ "सरकार, दिवाली लेल सुन्दर-सुन्दर दीप अछि ।मात्र दूइये टाका...एक्को टा कीन लिअ...भोरसँ एक्को टा नै बिकाएल ...भुखले छी...छूट देब...एगो कीन लिअ... ।"
सब बेर ओ एते बाजै आ सब बेर गाड़ी बला ओकरा फटकारि दै "रै बुड़बक ।आज के युग में दीप-बीप नहीं चलता है ।अब तो एक-से-एक मरकरी आ गया है ।जाओ रश्ता नापो ।समय खोटी मत करो ।" एते कहि गाड़ी बला फट दऽ गेट बन्द कऽ लै ।साँझमे चोकीदार अपन हिस्सा लेबाक लेल आबि गेलै ।ओकरा देख कुम्हार बाजल "बाबू जी ।आइ नै दऽ सकब ।पिछला चारि दिनसँ किछु आमदनी नै भेल ।कने किछु खुआ दिअ हमरा । पता नै अहाँकेँ अझुका हफ्दा दऽ सकब की नै, कारण जे हमरो जीवन तँ बिनु तेलक दीपे सन अछि ।जानि नै कते दिन धरि जरि सकत ।"

अमित मिश्र

Wednesday, October 30, 2013

जीउलाह

162. जीउलाह

कम्पनीमे छुट्टी भेलाक बाद वरिय कलर्क राघो बाबू अपन केबिनसँ बहरेलनि ।बाहर आबिते सहकर्मी सब संग भऽ गेलनि ।जुनियर कलर्क बिसो बाबू कहलनि "चलू राखो बाबू आइ पार्टी भऽ जाए ।"
"कतऽ जेबै आ कथीक पार्टी ?" राघो बाबू कथा बुझबाक प्रयास करैत कहलनि ।
बिसो बाबू फरिछाबैत कहलनि "अरे बेसी चाट-पकौड़ी, दू-चारि पीठ मिठाई आ चाह ।सुनलियै हें जे नाकापर बला दोकानमे बड नीक बनबै छै ।"
राघो बाबूक मुँह लटकि गेलनि ।लागै जे किओ बनल-बनाएल काजपर पानि ढारि देने होइ । नकारात्मक उत्तर सूनि बिसो बाबू पोल्हबैत कहलनि "एना किए मना करैत छी ?एँ यौ नेनपनमे तँ अहाँ एकर प्रेमी छलियै ।नीक चीज तँ खोजिते रहैत छलियै ।अहाँ एहन जीउलाह आदमी चाट-पकोड़ीकेँ कोना मना कऽ सकै छै !"
"यौ भाइ, पहिने हम एसगर रहियै तँ जीउलाह बननाइ भारी नै छलै मुदा आब . . .आब तँ जिम्मेदारी माँथपर छै । अपने नीक-नीकुत खेबै की बेटा-बाटीकेँ खुएबै ?" ई कहि डेरा दिस चलि देलनि ।

अमित मिश्र

Tuesday, October 22, 2013

जिम्मेदारी

161. जिम्मेदारी

"हे कने बाँहिमे तँ आउ ।"
"दुर जाउ ।अहाँकेँ केहनो लागैत नै अछि जे जखने-तखने शुरू भऽ जाइ छी..."
"... आ अहाँक पड़ाइत रहै छी ।हे यै अहाँ हमर कनियाँ छी, मुदा देखियौ तँ हमरे कुकुर, हमरेपर झाँउ-झाँउ !"
"और नै तँ की !अहाँकेँ किछु लागैत अछि ?आब बौआक जिम्मेदारी माँथपर छै ।अहाँपर धियान देलासँ वर्तमान सुधरत मुदा बौआपर धियान देलासँ अपना दुनू प्राणीक भविष्य सुधरत ।"
"हँ, से तँ अछि ।ठीक छै जाउ, बौआकेँ देखियौ गऽ ।"

अमित मिश्र

Monday, October 21, 2013

फाटल पन्ना

160. फाटल पन्ना

"हे अहाँक बारेमे बड सूनि रहल छी ।अपन जुआन पत्निकेँ छोड़ि दोसर संग...ई सब नीक नै भेल ।"सुनीता अपन पति सुकेशकेँ उपराग दैत कहलनि ।ई सुनिते सुकेश तामसे लह-लह करऽ लागल "हम कमाइ छी ।हम जे करी ओइसँ अहाँकेँ की ?" बात बिगड़ैत चलि गेल ।रिश्तामे खटास बढ़ैत-बढ़ैत तलाक धरि पहुँचि गेलै ।आब सुकेश अपन प्रेमिका संग रहऽ लागल ।
" यै मृगनैनी अहाँ एतेक टाका बेकारमे व्यर्थ करैत छी ।बुझू तँ काल्हिये हार किनलौं आ फेर आइये... "सुकेश अपन प्रेमिकाकेँ कने दबारैत कहलक ।ई सुनिते प्रेमिका सुकेशपर टूटि पड़ल "एना जुनि बाजल कर ।तूँ हमरा आनलें हम अपना मोने थोड़े एलियौ ।" झगड़ा बढ़ि गेल ।बाता-बातीक बीचमे एक-दू थप्पर सुकेशकेँ लागियो गेलै ।राति भरि सूति नै सकल ।सुकेशकेँ लागऽ लागलै जे सुनीताकेँ जिनगीसँ दूर भेलासँ ओकर जिनगीक सबसँ सुन्नर पन्ना फाटि गेल छै ।

अमित मिश्र

Sunday, October 20, 2013

आगि

159. आगि

- "ब्रह्मदेव भाइ एकटा बात सुनलहो ?रमेशबा माए-बापकेँ छोड़ि कऽ पड़ा गेलै ।"
- "हँ हौ खेखन भाइ, बात तँ हमरो कान धरि आएल छलअ...सुनलियै जे कोनो छौड़ीकेँ संगे लऽ गेलैए ।"
- "बुझहो तऽ, जे छौड़ा मूड़ी गोंति कऽ चलै छलै से एहन काज केलकै ।"
- "अनर्थ कऽ देलकै छौड़ा ।बाभन भऽ कऽ चमाइनक संग पड़ेलै ! एँ हौ पिरथी भाइ...एते तागत कोना आबि गेलै रमेशबामे ?"
- "हे हौ खेखन तूँहूँ बुड़बके बला गप करै छहो ।छौड़ाक देहमे आगि लागल छलै...प्रेमक आगि...ई आगि जाति-पाति थोड़े देखै छै । ई आगि सबटा बन्हकेँ जड़ा दै छै... ई तँ खूनक सम्बन्धोकेँ सुड्डाह कऽ दैत छै ।बुझलहो ने...हँ ।"

अमित मिश्र

Saturday, October 19, 2013

चक्कर

158. चक्कर

"रौ छौड़ा देखै की छहीं अल्हुआ ?अरे मैगियाक नाक-कानमे जे चमकौआ सोना छै से झीक ले...अरे मरदाबाकेँ छोड़िहें नै...रासा लऽ कऽ बान्ह ।" पिपरक गाछ तरसँ पूर्वमुखिया जी शेर जकाँ चिकरैत बाजलनि ।चेला सब आदेशक पालन केलक ।महिलाक नाक-कान शोणित चुआबऽ लागल ।
"सार मरदाबा अपने विधवा भाउज संग चक्कर चलबैत अछि... आ थू" पूर्वसरपंचक मूँहसँ निकलल एक लोइया थूक घासपर पसरि गेल ।ओ ठोर टेढ़ करैत बाजलनि "रौ दुनूकेँ कहीं एकरा चाटै लेल...तखने प्रायश्चित हेतै ।" मरद कहैत रहल जे ओ हमर माए सन छथि मुदा... चेला सब आदेशक पालन करैत जबरदस्ती दुनूसँ थूक चटबेलक ।पंचायत समाप्त भेल ।पूर्व सरपंज आ मुखियाक जय जयकार हुअ लागल ।"आइ-काल्हि तँ चक्कर चलबै बलाकेँ मारि देल जाइ छै ।धन्य नेता जी जे जान बचा देलखिन ।"
मुदा...मुदा दुनू देउर-भाउजकेँ ई अपमान सहन नै भेलै ।दुनू रातिमे फसरी लगा लेलक ।लोकक शक विश्वासमे बदलि गेलै ।आब एकरा दुनूमे चक्कर छलै वा नै, मुदा अगिला चुनावमे दुनू नेताक चक्कर जरूर चलि गेलै ।

अमित मिश्र

Saturday, October 12, 2013

छागर

157. छागर

एकटा गाय आ एकटा पाठी एक्कै खुट्टापर बान्हल छलै ।पाठीकेँ नहाएल जा रहल छलै ।ई देखि गाय पुछलकै "भाइ ई की भऽ रहल छै ?"
पाठी कहलकै "हमर दीर्घ यात्राक ओरियान भऽ रहल छै ।"
"अच्छए भाइ एक बात बता, एते दिन लोक तोरा खस्सी आ पाठी कहै छलौ मुदा आइ तोहर नव नाम सूनि रहल छियौ 'छागर'...से किए ?"
"नै बुझलहीं बहिन, एते दिन धरि मनुखक नामे कटि कऽ मनुखक पेट भरै छलियै आ आइ मनुख देवताक बहन्ना बना कऽ काटत तेँ ई विशेष नाम देल गेल छै...बहिन,एक टा बात बड सतबै छै ...भगवतीक चरणमे मरनाइ तँ पुण्येक गप भेलै मुदा हमरा अपन भोजन बनबै लेल देवी कहाँ आबै छथिन्ह...हमरा तँ सब दिन जकाँ मनुखे खाइत छै तखन एते ताम-झामक कोन प्रयोजन ?"छागरक दुनू नैनसँ गंगा-यमुना बहऽ लागल छलै ।ओ अपनाकेँ सम्हारैत आगू बाजल "बहिन, राक्षस तँ पापी छल तेँ ओकर संहार कऽ भक्षण कएल गेल...मुदा हम ककरा कोन कष्ट देलियै जे हमरा राक्षसे जकाँ काटल जाइत अछि ।बहित एकटा बात सन्तोष दैत अछि जे देवीक नजरिमे सब बराबर छै ।आइ जे हमर प्राण लेत काल्हि ओकरा देवी नै छोड़थिन... ।"छागर बाजिते छल तखने ओकर मालीक ओकर डोरी पकड़ि बलि-वेदी दिस चलि देलक ।

अमित मिश्र

Thursday, October 10, 2013

जनी जाति

156. जनी-जाति

"अहाँ जे एना मूँह फुलेने छी से नीक बात नै ।जनी-जातिकेँ एतेक गुमान नीक नै लागैत छै ।"पति अपन रूसल पत्नीपर खौंझ कऽ कहलक ।
पत्नी चोट्टहि उत्तर देलक "एना जुनि बाजू ।नारी मने की ? खाली गारि-मारि सहैत रहू ।हमहूँ एहि समाजक छी ।हमरो सब किछुक करबाक अधिकार अछि ।हमर मरजी, हम रूसी वा कानी ।"
"आहि रे बा !समाजक चर्चो करैत छी आ समाजकेँ चिन्हितो नै छी ।एँ यै बूझल नै अछि जे ई समाज पुरूष प्रधान अछि नारी प्रधान नै ।"
"जाउ जाउ, हमरा बेसी समाजक परिभाषा नै सिखाउ ।जँ पुरूखे प्रधान छै तखन नारीक जरूरत किए पड़ै छै ?बच्चा जनमाबी हम, घर सम्हारी हम, गारि-मारि सही हम, आ प्रधान बनत पुरूक !हे आब ई सब चलै बला नै अछि ।"पत्नीक तमसाएल मुँह देख पति अपना आपकेँ डेराएल सन अनुभव केलनि ।"यौ आब मौगीए सब कामा कऽ पुरूखक पालन करै छै, पुरूखक संग डेग मिलबैत अछि ।यौ आब समाजमे जनी नामक कोनो जाति बचले नै अछि ।आब एक्कै जाति अछि, मनुखक जाति ।बुझलौं ने ?"
पत्नीक तर्क सूनि पति सन्ट भऽ गेलथि ।

अमित मिश्र

Tuesday, October 8, 2013

खैरातमे खून

155. खैरातमे खून

"हौ सुनलो...कल्याण भऽ गेलऽ सब गोटाकेँ ...जकर-जकर माल-जाल, घर-दुआरि भासि गेलै ओकरा सरकार 5 लाख टाका खैरातमे देतै...ओतेमे तँ हमर भागे सुधरि जेतै ।" राघो काका रोडियो हाथमे मचानसँ चिचिया रहल छलथि मुदा बाढ़िक पानिक गर्जन हुनक सुखाएल कण्डसँ निककल स्वरक मर्दन कऽ रहल छल ।बाढ़ि गेलै ।लोक सरकारी दफ्तरक चक्कर लगाबऽ लागल ।राघो काकाक पूरा परिवार भासि गेल छलै ।बेचारे एसगरे जिलामे जाथि ।सब ठाम अश्वासन तँ झोरा भरि-भरि भेटै मुदा टाकाक दरश नै भेटै ।राघो काका दफ्तरक आगू जमि गेलथि ।कोनो अफसर देखबो नै केलकै ।रसे-रसे कमजोरी बढ़ैत गेलै ।एक राति हुनक हिम्मत टूटि गेलै आ ओ अपन परिवारक लऽग चलि गेलथि ।भोरमे लोक देखलकै जे हुनक लहाशक चारू कात चारि-पाँच टा कुकुर टहलि रहल छल ।

अमित मिश्र

नवतुरिया

154. नवतुरिया

एक बेर फूल आ फूलक गाछमे बकझक भऽ गेलै ।फूल आन्दोलन ठाढ़ कऽ देलक "नै...आब जुलुम नै सहबौ ।आब हम नै मौलेबौ ।"
गाछ शान्त करैत बाजल "एना किए बाजै छें ।तोरा कोन दिक्कत होइ छौ ?तूँ तँ हमर अंग छें ।तोरा तँ प्रेमसँ मौलेबाक चाही ।"
"अरे वाह रे वाह !हम हिनक अंग छी! हमरे सुगंधक कारण लोक तोरा पूछै छौ आ तूँ हमरे मौलाइ लेल कहैत छें ।" फूल आक्रोशित होइत बाजल ।
गाछ ओकरा बुझबैत बाजल "देख दुनियाँ परिवर्तनक पर्याय छैक । जा धरि तूँ नै मौलेबें ता धरि नव फूलक जनम नै हेतै ।"
फूल क्रोधे थरथराए लागल "तैसँ हमरा कोनो मतलब नै ।नवतुरियाकेँ हम कोनो रोकने छियै, आबौ ने...मुदा हम रहबे करबै ।"
"एतेक जिद जुनि कर ।समाजमे देखै नै छहीं बुढ़बा-बुढ़ियाकेँ कतेक गंजन होइत छैक ।पुरनका सब सबटा अधिकार अपने लऽग राखऽ चाहै छै आ नवतुरिया अपना लऽग चाहै छें ।बूढ़-पुरानकेँ किछु बरदाश्त नै होइ छैक आ नवकाक खूनक गरमी लऽग हारि कऽ मारि खाइ छैक । ऐसँ बढ़ियाँ जे अपन इज्जत बचा कऽ नवतुरिया लेल स्थान खाली कऽ दी ।"
गाछक बात सूनि फूल सब बात समझि गेल आ दोसरे दिन मौला कऽ गाछसँ खसि पड़ल ।

अमित मिश्र

Friday, October 4, 2013

सुइया भोंकि रहल

153. सुइया भोंकि रहल

"हे...हे...सुनलियै यौ...जुलुम भऽ गेलै...छोपि देलकै...बाप रे बाप...रमचनराक घेंटि छोपि देलकै ..."
"एँ यौ कतऽ, के घेंटि काटि देलकै ?"
"सरबनमा बढ़मोतरमे मसोमात बला खेतक आरिपर रमचनराक घेंटि काटि देलकै ।" जंगलक आगि जकाँ कानोकान भरि गाममे ई घटना पसरि गेल ।लोकक हुजुम बढ़मोतर दिस दौड़ पड़ल ।एक्कै आरिमे रामचन्द्र आ सरबनक आरि छलै ।बाप रे बाप !बड विभत्स दृश्य छल ।रामचन्द्रक खेतमे रामचन्द्रक धर पड़ल छल आ सरबनक खेतमे जीउ आ आँखि निकालने सिर पड़ल छलै ।आरिपर पड़ल कटल गर्दनसँ शोणितक गंगा-यमुना बहैत छल ।बगलेमे खूनसँ नहाएल कोदारि पड़ल छलै ।किछु लोक सरबनकेँ कसि कऽ पड़ने छल ।ओ चिचिया रहल छल "एक्कै आरिक खेतमे एते जुलुम भेलै यै ! सार रमचन्द्रक खेतमे मोनक मोन धान आ हमरामे खाली खखरी...साला अपन खेतसँ माँटि कटबा कऽ खत्ता कऽ लेलकै ।हमर खेतक पानि ओकरा खेतमे जतै ! ले ने सारकेँ उठाइये देलियै ।हमर बापे बैमान छलै जे नीक खेत ओकरा देलकै ।ओकर खेतक हरियरी हमरा सुइया भोंकि रहल छल । आब लैत रहौ मोनक-मोन धान ।"
सब सोचि रहल छल जे अपन दोष देखने बिना लोकक अरारि एतेक पैघ घटना घटा सकै छै ।

अमित मिश्र

Tuesday, October 1, 2013

गंगाजल

152. गंगाजल

शोभन राम ट्युशन पढ़ेबाक काज करैत छलथि ।पंडित सीताराम झा शोभनक योग्यता देख अपन बेटा-बेटीकेँ पढ़बैक लेल शोभनकेँ बजेलनि ।हवेलीक बाहर बनल एकचारीमे पठन-पाठन शुरू भऽ गेल ।एक दिन कोनो बातसँ तमसा कऽ गुरू जी पंडित जीक बेटाकेँ एक थापर लगा देलनि ।थापर लागिते पंडित जीक बेटा शोभनपर चिकरैत बाजल "हौ तूँ हमरा छुअल नै करऽ , हमरा गंगा जलसँ नहाय पड़त ।एकटा बात और हमरापर हाथ नै उठाएल करऽ । एक मिनटमे जेल पठबा देबऽ ।तोरासँ बेसी मातबर छी हम ।बुझलहक ने ?"
छोट नेनाक बात सूनि शोभन सोचमे पड़ि गेल छल 'आखिर पाँच बरखक अवोध नेनाकेँ अमीरी-गरीबी, जाति-पातिक पाठ के पढ़लकै ?गंगामे तँ हमहूँ नहाइत छी तखन हम अछूत कोना ?' शोभन सोचिते छल तखने पंडिजीक बेटा गंगाजलक डिब्बा हाथमे लेने घरसँ बाहराएल ।

अमित मिश्र

Sunday, September 29, 2013

गारि

151. गारि

वातावरणमे शहनाईक मधुर स्वर कंपित भऽ रहल छल ।आँगनमे नव कनियाँकेँ ससुर द्वारा साड़ी, गहना देल जा रहल छल ।तखने लड़ाकक भाएकेँ निशाना बनबैत लड़कीक बहिन गारि युक्त गीत गेनाइ शुरू केलक "मुँहझौंसा भैंसूर एखनेसँ आँखि किए मारै छै
बहसल माएक बेटा बापेकेँ गरियाबै छै..."एकर आगूक पाँति तेहन छल जे सुननाइयो पाप बुझाएत ।एते सूनिते लड़काक जेठ भाइ पिनकि गेल "एँ यै अहाँक लाज-धाख नै अछि ।माए-बापक आगू बिख्खिन-बिख्खिन गारि पढ़ै छी. . .डोबरीमे डूबि नै जा होइये ?"
प्रश्न सूनि लड़कीयो पक्ष तावमे आबि गेल ।लड़कीक माए बाजली "यौ पाहुन एते पिनकै किए छी ?ई तँ परम्परा अछि ।एतुका अशीर्वादी बूझि लिअ ।"
सारि सब बाजल "ई बुझू जे खाली छोटका गारि पढ़ैलौं ।हमरा तँ बड़को आबैत अछि ।हे लिअ . . .चंडलबा भैंसूर बहिने संग सू . . ."
"चुप . . .एकदम चुप भऽ जो ।"लड़का वेदीसँ उठि गेल आ गेठी खोलैत तमासे थरथराइत बाजल"जकर छोट बहिन एते निर्लज्ज हेतै ओकर बड़कीयो तँ तेहने हेतै ।तूँ सब भाइ बहिनक पवित्र रिश्तापर करिखा पोति देलें ।हम वियाहसँ एखने मुक्त होबऽ चाहैत छी । . . .एहने बज्जर सन बोल चलते तोहर सभक इज्जत घटैत-घटैत एक दिन लुटा जाइ छौ ।परम्पराकेँ तूँ सब अधर्मक ठिकाना बना लेने छें ।मैथिलक गारि तखने धरि नीक लागैत छै जखन धरि ओ अश्लीलताक बान्ह नै तोड़ै छै . . .हम जाइ छी ...अपन बहिनक सींथ पखारि अपने हाथे सिनूरा दिहें ।"एते कहि लड़का गेठी खोलि आँगनसँ बाहर निकलि गेल ।घरबैया पाथरक मूर्ती जकाँ कींकर्तव्यविमूढ ठाढ़ रहि गेलाह ।

अमित मिश्र