मैथिली विहनि कथाक कथ्य आ
शब्दावलीमे बड्ड रास गुणात्मक परिवर्तन आएल अछि। ओइ दृष्टिकोणसँ जँ विहनि कथा सभकेँ देखी तँ ज्योति सुनीत चौधरीक “नबका पीढ़ी” आ “घर दिसका रस्ता” विषयवस्तुक दृष्टिसँ २१म शताब्दीक विहनि कथा थिक। नबका पीढ़ीक बच्चा सभ वृद्ध दम्पतिक मोन खराप भेलापर चिन्तित होइ छथि तँ बाहर रहि रहल बेटा, बेटा जकाँ नै डॉक्टर जेकाँ गप करऽ लगैए। “घर दिसका रस्ता”मे बिसलेरी पानिसँ एयरपोर्ट होइत, माटिक ढिमकाकेँ काटि बनल विद्यालय आ समाजक विकृतिकेँ उज्जर मटमैल रंगमे टंगने विधवा युवती धरिक चर्च भेटि जाएत। हिनकर “पानिमे खेती” विज्ञान विषयक मैथिलीक पहिल विहनि कथा अछि।
दुर्गानन्द मण्डल जीक “किसना मुट्ठी” विहनि कथा लेल खाँटी शब्दावलीक बेगरता देखबैत अछि। अंग्रेजी शब्द भण्डारक दक्षतापूर्ण प्रयोग जेना आर. के. नारायण करै छथि तहिना दुर्गानन्द मण्डल मैथिली शब्दावलीक दक्षतापूर्ण प्रयोग करै छथि। रामप्रवेश मण्डल अही तरहक शब्दावलीक प्रयोगसँ साधारणो विहनि कथाकेँ असाधारण बना दै छथि। राजदेव मण्डल जेहने कविता लिखै छथि, तेहने उपन्यास आ तेहने विहनि कथा, सभ तरा-उपरी। कथ्य आ
शिल्पक संतुलन लेल ओ
ओहिना प्रसिद्ध नै छथि। बेचन ठाकुर अंधविश्वासक सामाजिक उपादेयतापर विहनि कथा लिखि जाइ छथि (फुसिक फल)।उमेश मण्डलक रुपैयाक ढेरी नारी सशक्तिकरणपर मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ विहनि कथा अछि। जगदीश प्रसाद मण्डल, परमेश्वर कापड़ि, कौशल कुमार, भवनाथ झा, शम्भु कुमार सिंह, जगदानन्द झा “मनु”, लक्ष्मी दास आ रामलोचन ठाकुरक विहनि कथामे जेम्स जॉयसक एपीफेनी स्पष्ट रूपसँ दृष्टिगोचर होइत अछि जे आन मैथिली विहनि कथाकारमे ओत्ते स्पष्ट रूपमे नै देखबामे अबैत अछि। आशीष अनचिन्हार, अमित मिश्र आ चन्दन कुमार झा नवका पीढ़ीक विषय परिवर्तन आ
प्रयोगक साक्षी छथि। ओमप्रकाश झा क “स्पेशल परमिट” आ मिहिर झा क “१०० टाका” कथ्यक नूतनता आ भिन्नताक कारण मैथिली विहनि कथाक इतिहासमे खास स्थान राखत। सन्दीप कुमार साफीक “अन्ध विश्वास” बेचन ठाकुर जीक “फुसिक फल”क उल्टा अछि, आ ई
दुनू विहनि कथा अपन प्रभावसँ देखबैत अछि जे कोना अन्धविश्वासक पक्षमे आ विपक्षमे रहि कऽ दुनु गोटे कोना अपन-अपन विहनि कथाकेँ सोद्देश्यता प्राप्त करबैत छथि। कपिलेश्वर राउतक “छूआ-छूत”
ऐ विषयपर मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ विहनि कथा अछि। शम्भु मंडलकेँ दुर्गापूजामे भगवतीकेँ
लड्डू छुएवाकक लेल जाइसँ पण्डितजी रोकै छथिन्ह, जँ कथा एतहि खतम भऽ जइतए तँ ओ सामान्य
कथा बनि सकितए मुदा कपिलेश्वर जी ओइ कथाकेँ शम्भु मण्डलक चाहक दोकान धरि लऽ गेला, जतऽ
ओ अपनासँ छोट जातिकेँ बेंचपर बैसबासँ रोकलनि आ से एकरा ऐ विषयपर मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ
विहनि कथा बनेलक। मुन्नाजीक “रेवाज” विहनि कथा लिअ। गाम घरमे मसोमातकेँ लोक डाइन कहै छै मुदा मुइलाक बाद घराड़ी लेल ओकरा आगि देबा लेल उपरौंझ होइ छै। एतऽ मुदा विहनि लेल जे बीआ छीटल गेल छै से कने उच्च स्तरक छै। एतऽ मृतककेँ बेटा नै छै मुदा पत्नी आ बेटी छै। से जखन मृतकक भाइ कोहा उठबऽ चाहैए तँ विधवा ओकरा रोकै छै आ बेटीकेँ कोहा उठबैले कहै छै। आ संग के देत ऐ नव रेवाजमे, जे आइयेसँ प्रारम्भ भेल अछि। तखन उत्तरो भेटैए- निपुतराहा सभ। जवाहर लाल कश्यपक “हम्मर माय तोहर माय” आ
“भगवानक भाग्य” अद्भुत रूपेँ कथ्यकेँ प्रस्तुत करैत अछि।
मैथिली विहनि कथा संसारक संख्यात्मक आ गुणात्मक अभिवृद्धि हर्खित करैबला अछि।
Showing posts with label गजेन्द्र ठाकुर. Show all posts
Showing posts with label गजेन्द्र ठाकुर. Show all posts
Saturday, August 4, 2012
मैथिलीक किछु श्रेष्ठ विहनि कथा
Friday, April 6, 2012
माए-बेटाक मनोविज्ञान
बेटा,
गाम आबैक मोन नै होइए। पुतोहुसँ आब झगड़ा नै होइए।
महीस दूध दऽ रहल अछि...
मुदा टोलबैय्या सभ एहि लेल जड़ि रहल अछि।
...
...
अहाँक माए।
“अएँ यै , अहाँक दूध होइये तँ टोलबैय्या सभ किएक जड़त? आ अहाँ से बुझै कोना छिऐक?” से बूढ़ीसँ पुछलकन्हि लिखिया।
तँ कहलन्हि बूढ़ी- “जे ओ सभ मोने-मोने जड़ैए, से हम सभटा बुझै छिऐ।”
चिट्ठी बेटा लग पहुँचि गेलन्हि।
मुदा बेटाकेँ देखू- “अएँ यौ- हमरा दूध होइये तँ लोक सभ किएक जड़ैए? माए लिखलक अछि।”
पढ़ुआ बजलाह- “टोलबैय्या सभ किएक जड़त? आ अहाँ से बुझै कोना छिऐक, माए ने लिखलन्हि अछि?”
तँ कहलन्हि बेटा- “जे मोने-मोने जड़ैए, से हम सभटा बुझै छिऐ।”
हजार कोस दूर रहि रहल निरक्षर दुनू माए-बेटाक बीचक विचार-तंतुक सादृश्यता!
माएपर कतेक विश्वास छै? माएकेँ बेटापर आ बेटाकेँ माएपर विश्वास छै, दोसरकेँ विश्वास नै हौ तकर कोनो चिन्ता नै।
माए-बेटाक मनोविज्ञान !
एकटा पत्र
शुभाशीष।
हम एतय कुशल छी। अहाँ सबहक कुशलक हेतु सतत् भगवानसँ प्रार्थी रहैत छी।
आगाँ समाचार ई जे अहाँ सभ हमर खोज खबरि लेनाइ बिल्कुले बिसरि गेल छी। फोनो तँ छोड़ू, चिट्ठीयोसँ गप्प केना महिनो बीति जाइत अछि। कमसँ कम सप्ताहमे नहि तँ महिनोमे एको बेर तँ मायक लेल गप्प करबाक समय निकालू।
एतेक मोटका-मोटका किताब अहाँ लिखैत छी किन्तु मायसँ गप्प करबाक फुर्सति नहि अछि। अहाँक किताबक खिस्सा आ कविता सभ दीदी सुनेलक अछि। बहुत मार्मिक लगैत अछि। परन्तु अपन माँक प्रति कोनो जिज्ञासा नहि होइत अछि, जे कतय रहैत अछि आ कोना अछि।
भाएसँ अहाँ अपने समय-समयपर गप्प करू जे हम कतऽ कतेक दिन रहब। गाममे आब हमरा नहि रहल होएत कारण एतए कोनो व्यवस्था नहि अछि आ कियो पुरुख नहि रहैत छथिन्ह। अहाँ सभ भाए-बहिनमे छोट छी किन्तु घरमे अहींकेँ घरक व्यवस्था आ इन्तजामक भार शुरुहेसँ अछि। किन्तु एम्हर अहाँ ध्यान नहि दैत छिऐक। फोनपर अहाँसँ गप्प करबाक बड्ड मोन होइत रहैत अछि। बच्चा सभसँ सेहो गप करबाक मोन होइत रहैत अछि। बच्चा सभकेँ दू-तीन दिनपर बासँ गप करबा लेल कहबै।
जमाएकेँ देखैत रहै छियन्हि जे सभ दू-तीन दिनपर अपन माँसँ गप करैत रहैत छथिन्ह, से हमरो सौख लगैत रहैत अछि जे हमर बेटा सभ केहन अछि जे कहियो माँसँ गप्प करबाक मोन नहि होइत छैक।
सभ कहैत अछि जे अहाँकेँ कोन चीजक कमी अछि, से हमरो चीजक कमी तँ नहि अछि मुदा धिया- पुताक हम प्रेमक भूखल छी।
पुतोहु, अहाँकेँ एखन घरक सभटा काज करए पड़ैत होएत। बड्ड मेहनति होइय होएत, मुदा तैयो हमरोपर ध्यान राखब। हम बड्ड घबराएल रहै छी तेँ जे फुराएल से हम चिट्ठीमे लिखा देलहुँ।
अहाँ सभक प्रेमक भूखल-
अहींक माँ।
शारदानगर
दुर्गा पूजाक नाटकक दू दृश्यक बीच नर्तकीक नाच।
“शारदानगरक ढोढ़ाँइ दस टाका तहे-तहे दिलसँ दै छथि”- नर्तकी रुखसाना बजै छथि।
“बनारसक छै रौ।”
“धुर, मुजफ्फरपुरसँ लऽ अनै छै आ झुट्ठो बनारसक..”।
“हौ मुदा ई शारदानगर कोन गाम छै”।
“बुझलही नहि। पट्टी टोलक जे पाइबला सभ रहै, से सड़कक ओहिपार टोल बना लेलकै आ लक्ष्मीपुर नाम राखि लेलकै- जे पट्टी टोलक हम सभ नहि छी। लक्ष्मी आ सरस्वतीक झगड़ा बुझल नहि छौह। से भगवानक झगड़ाकेँ सोझाँ अनने अछि। पट्टी टोल गाम गरिबहा सभक अछि, सभटा अछि महिसबार सभ। मुदा भगवानक झगड़ामे गामक नाम सरस्वतीक नामपर शारदानगर राखि लै गेल अछि।”
“ चल नर्तकीकेँ तँ अही बहन्ने पाइ दै जाइ छै”।
बाल गुरु
ओम नाम रहै ओहि बच्चाक।
मंशा नाम रहै ओहि बुच्चीक।
दिल्लीक कोनो आवासीय परिसरमे दुनु गोटेक परिवार रहै छलै।
बच्चा रहए मिथिलाक आ बुच्ची रहए पंजाबक। बच्चाक माए गृहणी आ पिता नोकरिहारा। बुच्चीक माए आ पिता दुनू नोकरिहारा।
एह, ओकर पिताक मुरेठा देखैबला रहै छल। मंशाक माए अपन पतिकेँ सरदारजी कहै छलि। मंशाक घरमे ओड़ीसाक एकटा बचिया नोकरी करै छलि, महुआ। वैह मंशाक देख-रेख करै छलि। आवासीय परिसरक घासक पार्कमे मंशाकेँ महुआ आनै छलि।
ओम ओहि पार्कमे अपन माएक संग अबै छल। मंशा आ ओम ओही पार्कमे खेलाइ-धुपाइ छल।
ओमक जन्मदिनमे मंशा अबिते छली। माए ओकरा लेल उपहार कीनि कऽ राखि दैत छलीह। महुआ मंशाकेँ लऽ कऽ समएसँ ओमक जन्मदिनमे पहुँचि जाइ छलीह। ओम आ मंशा दुनूक चारिम बरख पूरल छलन्हि आ पाँचम चढ़ल छलन्हि।
मुदा ओहि आवासीय परिसरमे एकटा बदमाश बच्चा आबि गेल। ओ सभ बच्चाकेँ तंग करए लागल। ओकर नाम रहै सुसेन।
“गै मंशा, दुजुट्टी किए बन्हने छेँ?”
“तोरा की?”
“गै मंशा, मुँह किए फुलेने छेँ?”
“मुँह किए फुलेने रहब?”
“मंशा गै, तोहर दोस ओम किए एहन गन्दा छौ?”
आब तँ मंशाकेँ ततेक तामस भेलै जकर कहब नहि। ओ जोर-जोरसँ बजए लागलि-
“ओम हमर दोस छी। जे एकरा गन्दा कहैए से अपने गन्दा अछि।”
मंशा ओमक हाथ पकड़ने आगाँ बढ़ि गेलि आ सभ गप ओमक माएकेँ कहलकै।
“हम सुसेनपर तमसाइ छलहुँ आ ई चुपचाप ठाढ़ छल।” मंशा ओमक माएकेँ कहलक।
“किए ओम। अहाँकेँ सुसेन गन्दा कहलक आ अहाँ चुपचाप ठाढ़ रहि गेलहुँ।”- ओमसँ ओकर माए पुछलखिन्ह।
“माए, ओ हमरा नै चिन्हैए। नव आएल अछि। तेँ हमरा गन्दा कहलक। जखन ओ हमरा चीन्हि जाएत तँ थोड़बेक गन्दा कहत।”
माए आँखिमे नोर आबि गेलन्हि।
हुनको पहिने तामस आबि गेल छलन्हि जे हमर बेटा किए चुप रहि गेल। ओ सुसेनकेँ किछु कहलक किए नै। मुदा तखने हुनका मंशा देखाइ पड़लन्हि। देखियौ कतेक निश्छल अछि। आ दुनू बच्चाकेँ ओ चुम्मा लेमए लगलीह।
नव-सामन्त
संगीक छोट भाए गाममे रहथि। गाममे मारि-पीट करैत छलाह से हुनका दिल्ली बजाओल गेल । एतहु गप-गप पर झगड़ा करए लागथि।
हमरा सोझेँमे एक गोटेकेँ धमकी दऽ रहल छलाह-
“दस मिनटमे पहुँचि जाह नै तँ गोली मारि देबह। बीस किलोमीटर दूरमे छह आकि चालीस किलोमीटर दूर हमरा ओहिसँ कोनो मतलब नै अछि”।
हम हुनका विषयमे सुनिते रही मुदा आइ देखलहुँ ।
हमर संगी बुझबए लगलखिन्ह- “ठीक छैक, हम नै कहैत छी जे नै मारियौक। मुदा एकटा गप कहू जे दिल्लीमे बीस किलोमीटर दूरसँ आबएमे तीन मिनट प्रति किलोमीटरक हिसाबसँ साठि मिनट लगतैक से ओ दस मिनटमे कोना आओत”?
विद्यार्थी भीतर चलि गेलाह। हम संगीकेँ पुछलियन्हि-
“विद्यार्थी तँ कतहु गुड़गाँवमे नोकरी ने करैत रहथि” ?
“हँ एक ठाम दस हजारक नोकरी धरेने रहियन्हि मुदा छोड़ि देलन्हि। कहलन्हि जे हमर लेबलक पुरान सामन्त जोकर ई नोकरी नै। आब हिनकर लेबल कहैत छी- कताक प्रयास कएलहुँ जे मैट्रिक पास भए जाथि मुदा मध्यमोसँ पास नै कए सकलाह”।
बाढ़ि, भूख आ प्रवास
एहि बेरक बाढ़ि पछिला जेकाँ सन नै । सभटा सुड्डाह कऽ देलक आगियोसँ जल्दी। खेत पथारमे रेत आ बालुमे खाली अल्हुआक खेती। दुनू साँझ पप्पू भाइ अल्हुआ खाइत अकच्छ भऽ गेल छथि। वैदिक थिकाह, मुदा एहि कोसिकन्हामे ...
मुदा देखू भाग्य!
हरिद्वार सँ भातिजक चिठ्टी अबैत अछि- “आबि जाऊ काका, एतए वैदिक लोकनिक बड्ड पूछि अछि। भरि दिन हस्त-सन्चालन आ उदात्त, अनुदात्त आ स्वरित स्वरक मेलसँ वेदक पाठ करू आ साँझमे नीक – निकुइत मिष्टान्न, खीर-पूरी खाऊ”।
वैदिक जी ट्रेन धेलन्हि आ पहुँचि गेलाह हरिद्वार । ओतए पहुँचि स्नान-ध्यान कऽ भरि दिन कंठ फाड़ि आ हाथ घुमाए वैदिक मंत्रक पाठ केलन्हि । साँझमे मनसूबा बान्हि खेनाइपर बैसलाह जे आब बड्ड दिनुका बाद खीर-पूड़ी खएबाक अवसर भेटत।
मुदा एम्हर हिनका हरिद्वार पहुँचबासँ पहिनहि दोसर पंडित लोकनिमे विचार-विमर्श भेल कारण ओ लोकनि खीर- पूड़ी खाइत-खाइत अकच्छ भऽ गेल छलाह। से सर्वसम्मतिसँ विचार कएल गेल जे आइसँ किछु दिनक लेल खेनाइक मेन्यू बदलल जाए। विचार भेल जे आइसँ वेदपाठक बाद अल्हुआ आ दूध किछु दिन धरि देल जाए।
वैदिक जी खाइ लेल मनसूबा बन्हने बैसल छलाह जे आइ जे खेनाइ अएत तँ ओहि खेनाइकेँ हिस्सक छोड़ा देबैक।
मुदा तखने वज्रपात भेल, –सोझाँ अल्हुआ महाराज विद्यमान ।
वैदिक जी हाथ जोड़ैत अल्हुआ महराजसँ बजलाह-
“सरकार हम तँ ट्रेनसँ आएल छी मुदा अहाँ कोन सवारीसँ अएलहुँ जे हमरासँ पहिनहिसँ विराजमान छी ।“
मिथिलाक उद्योग-२
मिथिलाक बोनमे रहनिहार जीव-जन्तु सभ आपसमे विचार कएलक- –
“अपन क्षेत्रक दादा सभ उद्योगक विनाश कएने अछि, ओतुक्का भीरू लोक सभ उद्योग लगेबासँ परहेज करैत अछि”- गीदड़ बाजल।
“तखन अपनहि सभ किएक नै फैक्टरी खोलैत छी, कोन दादाक मजाल जे हमरा सभ लग आओत”।-बाघ कड़कल।
प्रस्ताव पास भेल जे आब जंगलमे फैक्ट्री खुजत आ नगर जा कए उद्योग विभागसँ एकर पंजीकरण करबाओल जएत। ओतए भीरू मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ सभक राज अछि, ओ सभ बड्ड ओस्ताज होइत अछि।
गीदड़, बानर, लोमड़ि, नीलगाय सभक संग गदहा सेहो पंजीकरण लेल अपन सेवा देबाक लेल अगू बढ़लाह। सभसँ पहिने लोमड़िकेँ मौका भेटल कारण ओ सेहो जंगलक ओस्ताज अछि।
किछु दुनुका बाद दौग-बरहा केलाक बाद ओ हारि मानि लेलक।
“यौ बाघ महाराज। बड्ड कोन-कोन तरहक दस्तावेज मँगैत अछि नै भऽ सकत हमरा बुते”।
फेर एक एक कए सभ जाइत गेलाह आ घुरि कए अबैत गेलाह ।
गदहा कहैत रहल जे एक मौका हमरो देल जाए ।
मुदा सभ सोचथि जे बुझू, एहेन पेंचीला सभ विफल भऽ आबि गेलाह मुदा फैक्टरीक पंजीकरण नै करबाए सकलाह आ ई गदहा जे मूर्खताक लेल आ बोझ बहबाक लेल प्रसिद्ध अछि, की कऽ सकत ?
“ठीक छैक”- अन्तमे हारि कए बाघ कहलन्हि- –
“जाउ अहूँ देखि आउ एक बेर”।
मुदा ई की ? साँझ होइत देरी गदहा महाराज जे छलाह से फैक्ट्रीक पंजीकरण प्रमाणपत्र लऽ सोझाँ हाजिर भऽ गेलाह।
बाघ पुछलन्हि- –“औ जी गदहा महाराज ! एतेक कलामी जन्तु सभ जतए विफल भऽ गेलथि ओतए अहाँक सफलताक मंत्र की”?
गदहा महाराज उत्तर देलन्हि-
“महाराज एकर मंत्र अछि जातिवाद आ भाइ-भतीजावाद। उद्योग विभागमे हमर सभ सरे-सम्बन्धी लोकनि छथि ने”!
मिथिलाक उद्योग
गाममे चौधरीजीक बड्ड रूतबा, डरे सभ सर्द रहैत छल । ककर दीन अछि जे हुनकर गम्हरायल धान काटि लेत आकि ... ।
ओ एकटा बस खोललन्हि-
“दरभंगासँ गाम धरि चलत । सेकेंड हैंडमे भेटल अछि । पुरनका मालिकक लाइसेंस काज देत। संगमे बसक पुरनका मालिक तीन मासक लेल अपन ड्राइवर आ खलासी सेहो देलक अछि, तकर बाद अपन ताकि लेब”।
चौधरीजी मन्दिरपर बसक पूजा करैत काल गौआँ सभ़सँ बजलाह ।
“सुनैत छिऐक बस-स्टैण्डमे बड़ बदमस्ती करैत जाइत छैक”- एक गोटे गौआँ बजलाह
“धुर, चौधरीजीक बस आ आदमीकेँ के छुबाक साहस करत”? दोसर गोटे प्रसाद लैत बजलाह।
बसक रूट आकि रस्ता यात्रीगणक लेल सुभितगर रहैक से ओहि गाड़ीमे पैसेन्जर भरि जाइत रहए। दोसर बसबला सभ दबंग सभ।
शाहीजी आ मिश्राजीक स्टाफ सभ बड़ सञ्जत! से चौधरीजीक स्टाफकेँ गरगोटिया दऽ बस स्टैण्ड सँ बाहर निकालि देलकन्हि।
पोखरिक महारपरसँ चौधरीजीक बस खुजए लागल तँ ओतहु यात्री पहुँचए लगलाह।
आब तँ बस-स्टैण्डक दादा सभकेँ बड्ड तामस उठलन्हि ।
दुनु ड्राइवर आ खलासीकेँ पुष्ट पीटल गेल आ ईहो कहल गेल जे फेर एहि रूटपर चलताह तँ बसक एक्सीडेन्ट करबा देल जएतन्हि। शाही आ मिश्रा जीक तँ पचासो टा गाड़ी छन्हि एकटा थानामे एक्सीडेन्टक बाद पड़ले रहत तँ की ?
गामक रोआब –दाब बला कौधरीजी बस-स्टेण्डक दादा सभक सोझाँ जेना बकड़ी बनि गेलाह।
गाममे मन्दिरपर गाड़ी ठाढ़ छन्हि, ओहि पर कदीमाक लत्ती चढ़ि गेल अछि पैघ-पैघ कदीमासँ बस झपा गेल अछि। खूब फड़ल छैक।
गौआँसभ हँसीमे कहि रहल छथि-
“चौधरीजीक बसक पाइ तँ एहि बेर कदीमा बेचिये कऽ उप्पर भऽ जएतन्हि”।
“दरभंगाक इन्डस्ट्रीयल स्टेटमे सेहो फैक्ट्री सभ एहिना बन्द अछि आ ओकर देबाल सभपर एहिना तर-तीमनक लत्ती सभ भरल छैक”- दोसर गौआँ बाजल।
नूतन मीडिआ
नगरमे डकैतीक घटना भेल ।
नूतन मीडिया अपन-अपन चैनलमे -सर्वप्रथम ओकरे चैनलपर एकर सूचना देल जा रहल अछि- ई ब्यौरा दैत, दू-दिनमे एकोटा गिरफतारी नै होएबाक आ ताहि द्वारे पुलिसक अक्षमताक चर्च करैत गेल।
पुलिस हेडक्वार्टरमे बैठकी भेल । सभ टी.वी. चैनल कहि रहल छल जे चारि गोटे मिलि कए डकैती केलन्हि मुदा एखन धरि एको गोटेक गिरफतारी नै भेल अछि। एनकाउन्टर स्पेशलिस्ट बजाओल गेलाह। जेना सभ बेर होइत रहए एहि बेर सेहो ओ एक गोटेँ पकड़ि कए अनलन्हि। चारि डाँग पड़बाक देरी छल आकि ओ अपन डकैत होएबाक गप स्वीकार कए लेलक। फेर एनकाउन्टर स्पेशलिस्टक संग ऑफिसर लोकनि कैमराक सोझाँ फोटो खिचबेलन्हि। ओ डकैत अपन डकैत होएबाक गप सेहो स्वीकार कएलक।
चारि दिन आर बीतल। सभ दिन तरह-तरह सँ ओहि कथित डकैतकेँ पीटल जाइत रहल,
-“बता अपन तीन संगीक नाम जकरा संगे डकैती कएने छलह”।
-“सरकार चारिए डाँगमे अपन डकैत होएबाक गप स्वीकार कए लेलहुँ, हम डकैत रहितहुँ तँ ई करितहुँ ? मुदा आर तीनटा संगीक नाम कतए सँ आनू आ ककरा फुसियाहींकेँ फँसाबी”।
सप्ताह भरिक बाद मीडिया एकटा बम विस्फोटक अन्वेषणमे बाँझि गेल । मुख्य डकैत तँ पकड़ाइये ने गेल से आब डकैतीक कॉवरेज दर्शक नै ने देखए चाहैत छथि!
पब्लिक डिमान्ड नै छैक से ओहि डकैतकेँ बेल भेटलैक आकि नै से कोनो समाचार नै आएल।
अनुकम्पाक नोकरी
“बड्ड दर्द भऽ रहल अछि बाबू, आब बर्दास्त नै भऽ रहल अछि” ।
पता नै कोन घाव रहैक । पुकार कुहरि रहल छथि । पिता स्वतंत्रता सेनानी रहथि, जखन डाक्टर आ कम्पाउन्डर मना कऽ देलक घाव छुबएसँ तँ अपने हाथे सेवा कऽ रहल छथि । उजरा पाउडरकेँ नारिकेरक तेलमे मिला कऽ घावक खपलौइया हटा कऽ ओहिमे लगाबथि। पीजकेँ पोछथि। बाप आ छोट भाए दुनू सेवामे लागल रहथि ।
परूकाँ प्रथम श्रेणीमे उत्तीर्ण भेल छलखिन्ह पैघ बेटा, सत्यनारायण भगवानक पूजा भेल रहए।
बूढ़ बापक पैघ आश रहथि बड़का बेटा।
छोटका बेटा कोनो तेहन तेजगर नै रहथिन।
मुदा रोग एहन रहए जे एक दिन बड़का बेटाक प्राण लए लेलक।
अंग्रेजसँ लड़ैत खुशी-खुशी जेल गेल रहथि मुदा तखन युवा रहथि। बुढ़ारीमे ई शोक हुनका तोड़ि देलकन्हि । गुमशुम आ अपनेमे मगन रहए लगलाह । स्वतत्रता सेनानी पेंशनसँ घर चलाबथि । हँ छोटका बेटा पैघ भाएक सटिर्फिकेट लऽ कलकता गेलाह आ ओहि सटिर्फिकेटक आधारपर हुनका एकटा प्राइवेट कम्पनीमे नीक नोकरी भेटि गेलन्हि। माने मात्र नाम बदलि गेलन्हि।
लोककेँ बाप मरलापर नोकरी भेटैत छैक, हुनका भाएक मरलापर भेटलन्हि ।
जाति-पाति
हैदराबाद पुलिस एकेडमीमे दारूक पार्टी चलि रहल छल ।
“क्यो किछु नै बाजत, बस हमही टा बाजब”।
छाती पिटैत- “राजपूतक छाती छी ई, क्यो किछु नै बाज “।
“:भाइ यैह तँ अंतर छैक, दुनू गोटे आइ.पी.एस. छी, दुनू गोटे पीने छी। मुदा की हम ई कहि सकैत छी छाती पीटि कए- जे हम डोम छी, क्यो किछु नै बाज”!:
प्रतिभा
मसूरीमे आइ.ए.एस. आ आइ. पी. एस. प्रोबेशनर सभक दारु पार्टी चलि रहल छल ।
“हम सभ एतेक तेज छी एक सय प्रश्नक सेट बना कऽ तैयारी कएलहुँ तखन जा कए सफल भेलहुँ । के अछि हमरासँ बेशी तेज?”।
“रौ दिनेसबा । सतमामे तूँ पास नै भेलँह, अठमामे सेहो एक बेरे पास नै भेलँह । दसमामे द्वितीय श्रेणी भेलापर तोरा स्कूलसँ निकालि देलकऊ। प्रश्नक पैटर्नक हम आ तूँ प्रैक्टिस केलहुँ आ सफल भेलहुँ तँ एहिमे तेजी केर कोन बात आएल”।
बिआह आ गोरलगाइ
जमाय पएर छूबि कए प्रणाम कएलन्हि तँ ससुर सए टका निकालि एक टाकाक नोटक सिक्काक लेल कनियाँकेँ सोर केलन्हि।
खूब खर्च-बर्च कएने छलाह बेटीक बियाहमे पाइ अलग गनने छलाह आ नगरक चारि कठ्टा जमीन सेहो बेटीक नामे लिखि देने छलाह।
“नञि बाबूजी। ई गोर-लगाइक कोन जरूरी छैक”?
तावत कनियाँ आबि गेल रहथिन्ह, एक टकाक सिक्का लऽ कए।
एक सए एक टाका जमायक हाथमे रखैत ससुर महराज बजलाह- –
“राखू-राखू । ई तँ पहिनहियो ने सोचितियैक”।
स्त्री-बेटी
“बाबूक संगे खाएब”।-बुचिया बाजलि ।
“हे आब तूँ छोट नै छेँ, एम्हर बैस”। माए कहलन्हि ।
फेर भाए सभ खेनाइ खेलक आ आब बुचिया आ बुचिया माएक बेर आएल ।
तरकारी सठि जेकाँ गेल रहए, दूध तँ बाबू आ भाएकेँ मात्र भेटलैक ।
माए बुचियाकेँ सठल जेकाँ तरकारी लोहियामे सँ छोलनीसँ जेना –तेना निकालि कए देलन्हि आ अपने भात आ नून –तेल लए बैसलीह। दूधक बर्तनसँ दाढ़ी खखोड़ि कए बादमे बुचिया खेलक।
- ई खिस्सा सुनबैत मनोहर बजलाह जे हमरा सभ आब ई कऽ सकैत छी की ?
पहिने खेनाइ-पिनाइसँ लऽ कऽ पढ़नाइ-लिखनाइ धरि बेटीक संग अन्याय होइत रहए। अपाला-गार्गी-मैत्रेयीक समय तँ आब जा कऽ फेरसँ आएल अछि ।
बहुपत्नी विवाह आ हिजड़ा
“मरि गेलि बेचारी “। गौआँ सभ फलना बाबूक तेसर कनिआँक मुइलापर कहलन्हि ।
“फलना बाबू तेसर कनियाँक गरदनि काटि लेलन्हि”। एक गोटे कहलान्हि।
“से ठीके कहैत छी । पहिल कनियाँमे बच्चा नै भेलैक तँ दोसर बियाह कएलक । मुदा जखन दोसरोमे बच्चा नै भेलैक तँ बुझबाक चाही छलए ने”।- दोसर गोटे कहलन्हि ।
“हँ आ उनटे तेसर कनियाँकेँ कहैत रहथि जे भातिज सभकेँ नै मानैत छिऐक तेँ भगवान बच्चा नै देलन्हि । बुझू”?-तेसर गोटे कहलन्हि ।
“हिजड़ा सार”।- चारिम गोटे सभा समाप्त करैत बाजल ।
मुदा चारि गोटेक ई महा-सम्मेलन एहि गपपर सहमति मे छल जे पहिल दू टा बियाह करब उचित रहए।
थेथर मनुक्ख
दू दिनसँ परबा असगरे बैसल रहए । ओकर कनियाँ उढ़रि कए कतहु चलि गैलैक । बच्चा सभ कतेको बेर ओकर खोपड़ीमे पानि आ दाना दऽ आएल रहए। मुदा आइ भोरे ओ खोपड़ी उजारि कतहु चलि गेल”।
“किए यै नानी । ओहो किएक नै दोसर बियाह कऽ लेलक । बेशी प्रेम करैत रहए कनियाँसँ”।
“अहाँ नेना छी । ई कोनो थेथर मनुक्ख थोड़े छी जे कनियाँ मरए, माय-बाप मरए, बेटा-पुतोहु मरए, सर-समाज मरए, चारि दिन मुँह लटकाएत आ पाँचम दिनसँ फेर थेथर मऽ जएत “।
जातिवादी मराठी
“ऐँ यौ ई की देखैत छी, ऑफिसमे अफसर सेहो मिथिलाक आ बिहारक
आ रिक्शाबला, खेनाइ बनबए बला सेहो सभ मिथिलाक आ बिहारक । से कोन गप भेल”।
पुणे मे सिंहजी केँ एक गोट मराठी सज्जन पुछलखिन्ह।
बात सेहो ठीक रहए मुदा बाहरी लोककेँ बुझबामे नै आबए ।
सिंह साहेब भारतीय पुलिस सेवा मे रहथि आ हुनकर सहोदर भिखना-पहाड़ीमे प्रिंटिंग प्रेसमे क-ट सभ जोड़ैत छलाह, से हुनका कनेको अनसोहाँत नै लागलन्हि। मैथिली साहित्यमे देखैत आएल छथि मात्र मैथिल ब्राहाण आ कर्ण कायस्थक लेखनीकेँ चमकैत।
रिक्शाबला तँ दरभंगाक होए आकि कटिहारक,
खेनाइ बनबएबला झौआ रहबे टा ने करैत अछि।
ई मराठी सभकेँ पता नै किएक अनसोहाँत लगैत छैक।
बड्ड जातिवादी सभ अछि ई मराठी सभ।
सर्वशिक्षा अभियान
“हे हम डोमाकेँ पढ़ा लिखा कए किछु बनबए चाहैत छी” । बुधन पासवान बाजल । चण्डीगढ़मे ओ रिक्शा चलबैत छथि । आब गाममे खेती बारीमे किछु नै बचलैक ।
छोटका भाए सभ जनमिते मरि जाइत रहए।
से बुधनक एकटा छोटका भाएकेँ माए-बाप जनमलाक बाद डोमक हाथसँ बेचलन्हि आ फेर पाइ दऽ कए किनलन्हि । ई सभटा काज ओना तँ सांकेतिक रूपेँ भेल मुदा एहिसँ ग्रह कटित भऽ गेलैक। आ छोटका भाए जे बुधन पासवानसँ १२ बरिख छोट रहन्हि बचि गेलाह ।
आ ताहि द्वारे ओकरा सभ डोमा कहि सोर करए लागल ।
बुधन अपन बाप-माएक संग हरवाही करथि मुदा भाएकेँ पढ़ेबाक बड्ड लालसा रहन्हि ।
“सुनैत छिअए जे हमरा सभमे कनिओ पढ़ि-लिखि लेलासँ नोकरी भेटि जाइत छैक। एकरा जरूर पढ़ाएब, चाहे ताहि लेल पेट काटए पड़ए आकि भीख माँगय पड़ए”।
भीख तँ नै माँगलन्हि मुदा चण्डीगढ़क रस्ता धेलन्हि बुधन।
भरि दिन रिक्सा चलाबथि आ साँझमे जखन दोसर संगी-साथी सभ देसी ठेकामे अपन ठेही दूर करबाक लेल जाथि तखन दस तरहक गप सुना कए बहन्ना बना कए बुधन अपन घर दिस घुमि जाथि।
“की रे मीता। बामा-दहिना करै छेँ, निन्द नै होइ छौ”।
“नञि रौ भाइ। भरि दिन तँ बाइ मे रिक्सा घिचैत रहैत छी मुदा साँझ होइते अंगक पोर-पोर दुखाए लगै-ए”।
“रौ भाइ। कहैत छियौक जे ठेकापर चल तँ दस बहन्ना बना कए घुरि जाइ छिहीँ। देख हमरा आउर केँ, पीबि कए फोँफ कटैत रहैत छी। एक्के निन्नमे भोर आ सभ ठेही खतम”।
कोरइलाक सभ गप सुनि कऽ गुमकी लाधि दैत छथि बुधन। मोनमे ईहो होइत छन्हि जे किंसाइत डोमा पढ़ए आकि नै पढ़ए।
तखन जे आइ सभ गप पेटसँ निकालि देतथि तँ यैह सभ संगी-साथी सभ काल्हि भेने अही गपकेँ लऽ कऽ हँसी करतन्हि। दू चारि-टा पाइ जे बचत तकरा गामपर पठाएब। आ ताहिसँ डोमा पढ़त।
मुदा गाममे जे स्कूल रहए ओतय किओ टा दलित आकि गरीबक बच्चा नै पढ़ैत रहथि।
सरकार एकटा योजना चलेलक, दलितक बच्चा सभकेँ बिना पाइ लेने किताब बाँटबाक । किताब लेबाक लेल घर-घर जा कए यादव जी मास्टर साहेब बच्चा सभकेँ स्कूल बजेलन्हि। नाम लिखलन्हि, बिना फीसक, मासूलक । सभ हफता-दस दिन अएबो कएल स्कूल। दुसधटोलीसँ, चमरटोलीसँ, धोबिया टोलीसँ सभ। डोमा सेहो। सभकेँ किताब भेटलैक आ सभ सप्ताह-दस दिनक बाद निपत्ता भऽ जाइ गेल । देखा –देखी कमरटोली आ हजामटोलीक बच्चा सभ सेहो अएलाह पढ़ए, किताब मँगनीमे भेटबाक लोभे । मुदा ओतए ई कहल गेल जे अहाँ सभ पैघ जातिक छी, मुफ्त किताब योजना अहाँ सन धनिकक लेल नै छैक ।
“बाबू ई काटए बला गप छैक की, छोट-छोटे होइत छैक आ पैघ-पैघे । स्टेटक आइ धरिक सभसँ नीक चीफ-मिनिस्टर कर्पूरी ठाकुर भेल छैक, की नञि छै हौ असीन झा” । जयराम ठाकुर अपन खोपड़ीक टूटल चारसँ हुलकैत सूर्यक प्रकाशक आसनीपर असीन जीक केश कटैत बजलाह।
“से तँ बाबू ठीके”। असीन बजलाह ।
से गाममे फेर ब्राहाण आ भूमिहारके छोड़ि आर क्यो स्कूलमे पढ़एवला नै बचल । अदहरमे सभटा किताब ई लोकनि किनैत गेलाह ।
“हे अदहरसँ बेसीमे नै देब, मानलहुँ किताब नव अछि, मुदा अहाँ सभकेँ तँ मँगनीयेमे ने भेटल अछि”।
आ दुसध टोली, चमरटोली आ धोबिया टोलीसँ सभटा किताब सहटि कऽ निकलि गेल ।
आ पता नै डोमा पढ़लक आकि नै।
Subscribe to:
Posts (Atom)