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Monday, September 1, 2014

गंगाजलक धोल (लक्ष्‍मी दास)

 गंगाजलक धोल

सहदेव काकाकेँ गामे कि‍छु गोरे सहदेवकाका कहै छन्‍हि‍ तँ कि‍छु गोरे फटहाकाका सेहो कहै छन्‍हि‍। कि‍छु गोरे सहदेव भैया कहै छन्‍हि‍ तँ कि‍छु गोरे फटहाभैया सेहो कहै छन्‍हि‍। मुदा हमर ने कि‍छु कहि‍यो बि‍गाड़लनि‍ आ ने नीके केलनि‍ तँए हम सहदेव कके कहै छि‍यनि‍।
अहाँ कहब जे लोकक एकहरी नाओं होइ छै हुनकर कि‍ए दोहरी छन्‍हि‍? दोहरीक कारण अछि‍ जे जे घटि‍या काज सहदेव काका अपने करै छथि‍ ओही काजले दोसरकेँ रेड़बो करै छथि‍न आ आँखि‍क पानि‍योँ उतारि‍ दइ छथि‍न। ओना केते गोरे एहनो छथि‍ जे अपनो सहदेव कक्काक केलहा काज लोके लग उगलि‍ दुसबो करै छन्‍हि‍ आ फटहो कहै छन्‍हि‍। मुदा जहि‍ना गर्दखोर अपन गरदा झाड़ि‍ फ्रेश भऽ जाइए तहि‍ना अपन गरदा झाड़ि‍ सहदेवो काका फ्रेश भऽ जाइ छथि‍।
आइ सहदेव काका केकर मुँह देखि‍ ओछाइन छोड़ने छला केकर नै, भोरे-भोर दुनू परानीमे झगड़ा बझि‍ गेलनि‍। खि‍सि‍या कऽ अलोधनी काकी आगूमे थूक फेकि‍ कहलकनि‍-
“अहाँ पुरुख छी आकि‍ पुरुखक झड़ छी?”
पत्नीक समुचि‍त उत्तर दऽ सहदेव काका भरि‍ दि‍नका जतरा दुइर नै करए चाहै छला, मुदा झगड़ा बेर चुपो रहब हारि‍ मानब बूझि‍ बजला-
“अहाँ कहने जँ हम पुरुखक झड़ छी तँ अहूँ तँ झड़क झरनि‍येँ ने भेलौं।”
सहदेव कक्काक बात जेना अलोधनी काकीकेँ रब-रबा कऽ छूबि‍ लेलकनि‍। जहि‍ना कुकुर कटौजमे दाँतसँ पकड़ा-पकड़ी करैत घीचा-तीरी करए लगैए तहि‍ना काकी बजली-
“गामक लोक जे फटका कहैए, से कोनो झूठ कहैए। अहाँकेँ ने कोनो काजक ठेकान अछि‍ आ ने कोनो बातक ठेकान अछि‍।”
जेना लंकामे अग्‍नि‍वाणकेँ रोकल गेल, तहि‍ना सहदेव काका अलोधनी काकीक अगि‍याएल बोलकेँ रोकेत बजला-
“कथी ले अनेरे अपने मुहेँ दोखी बनै छी, एतबो ने बुझै छि‍ऐ जे हमरा फटहा कहैए ओ कि‍ अहाँकेँ फटही नै कहत।”
अपन हूसैत वाणकेँ देखि‍ काकी पाशा बदलि‍ बजली-
“लोक दुसैए, तेकर लाज नै होइए?”
जेना ठोरक बरी पकै छै तहि‍ना काका पकबैत बजला-
“जे दुसत से पहि‍ने अपन घरवालीकेँ पुइछ‍ लि‍अ जे अपने केते गंगाजलक धोल छी।”

Sunday, May 6, 2012

लक्ष्‍मी दास - अपन सन मुँह




नीन टूटि‍ गेल रहए, मुदा वि‍छानपर पड़ले रही आकि‍ मैझला बेटा उठबैत कहलक- “बाबू चि‍तकबरा काकाकेँ खस्‍सी चोरि‍ भऽ गेल।”
पुछलि‍ऐ- “तूँ केना बुझलि‍ही।”
कहलक- “एँह, सौंसे गामक सभ बुझलकै।”
सगरे यएह गप-सप्‍प होइ छै। घटनो आ जि‍गेसोक खि‍यालसँ बि‍दा भेलौं। चोर-मोट सभ सोझेमे।
घटना भेल कते गोटे केसमे फँसल।
शुरूमे जमानत-तमानत करा सभ नि‍चेन भऽ गेलौं।
बीस बर्ख बाद वारंटक संग चौकीदार पहुँच गेल।
बहुत दि‍न भेने केस फड़ि‍यबैक वि‍चार भेल। वि‍चार इहो भेल जे जेकर घटना छि‍ऐ ओ जँ अपन बूझि‍ खर्च करए तँ नीक बात।
अपना सबहक दौड़-बड़हा ओकर खर्च।
चि‍तकबड़ाकेँ पुछल गेल। ठोकल मुँहे बाजल- “हमहीं कहने रहि‍हह।”
अपन सन मुँह लेने चलि‍ एलौं।