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Tuesday, April 24, 2012

ठकबुद्धि


विलट राम पहिल बेर दूनू प्राणी गाम आयल अछि.संग मे दूनू बच्चा सभ सेहो अयलहि अछि.गंगाधर पण्डित कार सँ उतरैत विलट, ओकर कनिञा आ' बच्चा सभके देखने रहथि.अनमन विदेशी लगैछै. गोर धप-धप बच्चा सभ. कनिञा सेहो बड्ड सुन्नरि छैक.विलट त' पहिनहि जँका अछि.गहुँमक रंग सन मुदा मूँहक चमक बढ़ि गेलैक अछि.किएक नहि बढतै कलक्टरक पोस्ट कोनो मामूली पोस्ट नहि होइ छै.जिलाक राजा होइत अछि कलक्टर.तखन राजसी ठाठ-बाठक चमक त' एबे करतै.कनिञा बिभा कुमार सेहो एस.डी.ओ.छैक.दू बरखक जुनियर छै कनिञा विलट सँ.दिल्लीए मे दुनू प्रेम विवाह केने रहए.बेचनी, विलटक माय दियामान सँ फाटल जा रहल छै.पाँच बरखक पोता राकेश आ' दू बरखक पोती रश्मि के देख ओकर खुशीक कोनो ठेकान नहि छै.बेर-बेर दुनू के करेजा सँ सटाबैत अछि.राकेशक मुँह सँ "दादी" शब्द सुनतहि ओकर आँखि नोरा जाइत छै.आँचरक खूट सँ बेर-बेर अपन आँखि पोछि लैत अछि बेचनी.

भरि गामक लोक करमान लागल छै विलटक दलान पर. गंगाधर पण्डित जी, दयाकांत मास्टर साहेब,किरतु मुखिया,...गामक मुँहपुरूख बच्चा बाबू सेहो कुरसी लगा बैसल छथिन्ह.एतबे मे रश्मि के कोरा मे नेने विलट सेहो आँगन सँ दलान पर अबैत अछि.विलटक अबिते ओहिठाम कुरसी पर बैसल सभ लोक ठाढ़ भऽ जाइत अछि.विलट,बच्चा बाबू,पण्डितजी,मास्टर साहेब,सभ के पएर छूबि गोर लगैत अछि.मास्टर साहेब विलट के भरि पाँज पकरि छाती सँ सटा लैत छथिन्ह.हुनका मूँह पर गर्वक भाव स्पष्ट देखार भऽ रहल छैन्ह जे हुनकर विद्यार्थी आइ कलक्टर बनि गेल.विलट सभ के विनम्र भावे बैसबाक आग्रह करैत अछि.सभ बैसथि अछि.

भरि गौँआ के आइ गर्व भऽ रहल छैक जे ओकरा गाम मे एकटा कलक्टर सेहो छैक-बच्चा बाबू विलट दिस तकैत बजलाह........एक्केटा नहि दू टा बच्चा बाबू -पण्डित जी बिचहि मे बच्चा बाबूक बात कटैत कहलखिन्ह.कनिञा सेहो अगिला साल धरि कलक्टर बनिए जेतीह ने...पण्डित जी आँगा बजलाह.विलट किछु नहि बाजल.खाली मुस्कियाएल रहए कने.

आँगन सँ गोपीया, विलटक पितियौत एकटा छिपली मे पाँच-छह कप चाह नेने आयल.सभ गोटे चाह पिबै लगलाह.एतबे मे बुद्धिनाथ सेहो विलटक दलानक आँगा बाटे कोम्हरो जाइत रहथि....कतौ जाइत नहि रहथि..ओ त' विलटे सँ भेँट करय आयल रहथि मुदा विलट ल'ग बच्चा बाबू के देखि दोसर बाट पकड़ि लेलथि.सात पुरूखा सँ दुनूक परिवार मे एक-दोसराके निच्चा देखेबाक होर मचल छन्हि.पुस्तैनी दुश्मनी चलैत छन्हि."देखहक बच्चा बाबू केहन निर्लज्ज भऽ गेल, बेचनीक दुआरि पर बैसि आब चाह पिबैत अछि....चमारक दुआरि पर..राम-राम." -ई बात कंटीर सँ कहैत काल बुद्धिनाथक स्वर मे अपन दुश्मन सँ पाँछा भऽ जेबाक खौँझी स्पष्ट प्रतीत भऽ रहल छलैन्हि.

राकेश हाथ मे एकटा गेन नेने दलान पर आयल आ' विलट के अपना सँग खेलबाक लेल जिद्द करय लागल. बच्चा बाबू ओकरा अपना कोरा मे बैसा लेलखिन्ह आ' गाल पर चुम्मा लऽ लऽ दुलारऽ लगलखिन्ह.बच्चा बाबूक कोरा मे  अपन पोता के बैसल देखि बेचनी के करीब तीस बरख पहिलुका बात मोन परि गेलइ.छहे मासक रहैक विलटु..हाँ विलट..भरि गौँआ आ' बेचनी सभ तऽ विलटुए कहैत छलै विलट के.बेचनी लेल तऽ विलट एखनहु विलटुए अछि.

ओहि दिन बेचनी एसगरे रहए घर मे.सासु नैहर गेल रहए.ससुर सासु के पहुँचाब गेल रहथिन्ह.विलटक पिता सेहो कोनो आन गाम गेल रहय रसनचौकी बजबै लेल.नवहथ बाली गिरहतनी माने बच्चा बाबू गिरहतक घरबालीके बच्चा होनहारी रहए.प्रसवपीड़ा उठि गेल रहए.बच्चा बाबू गिरहत के हुनकर बाबू माने बड़का गिरहत पठेने रहथिन्ह माय के बजा अनय लेल.असमंजस मे परि गेल रहए बेचनी......घर मे पुरूष-पात नहि छै.ओकरा एखन सालो नहि पुरलैए सासुर बसना. कोना जेतइ घर से बाहर...? छह मासक बच्चा के कत' रखतइ...?.'तऽ आई धरि कहियो, ककरो परसौती करेबो नहि केलकइ....मुदा, नहि जेतइ त' पसारी छियैक गिरहत छुटि जेतइ....बोनि मरि जेतइ....मालिक की कहतइ....तहू मे बड़का गिरहत.....सौसे गाम हुनकर धाक करै छै....बड़का कलेवर बला लोक छथि...अन्ततः बेचनी अपन पितीया सौस के संग कऽ गेल रहए.विलटु के सेहो संगे नेने गेल रहए. छए मासक बच्चा के कत' रखितइ.

सूरेश बाबू जनमल रहथिन्ह.बड़का गिरहत, बच्चा गिरहत सभ गिरहतनि,सभ केयो बड्ड हरखित रहथिन्ह.बेचनी सेहो मोने मोन निचेन भेल रहए जे गिरहत नहि छुटलै.बेटा जनमलैन्ह तै बोइनो बेशी कऽ के भेटतइ.घोघ तनने, विलटुके कोरा मे उठेने विदाह भेल रहए कि तखने पएर मे किछु अभरल रहए.घोघ त'र से नहि देखायल रहए ओकरा. अरे बाप रे ..जुलूम भऽ गेलै..मैँयाक पितरिया लोटा छुआ गेलै...कोनो बच्चा चिकरि उठल  रहए.बेचनी के देह जेना पथरा गेल रहै ई बात सुनितहि देरी...बु......दी,ख...राही..,असर्ध-असर्ध गारि पढ़ैत बच्चा बाबू बेचनी दिस मारय लेल हुरकल रहै..ओ'तऽ बेचनी के पितिया सौस पएर पर खसि परल रहै बच्चा बाबू आ' बड़का गिरहत के तँइ जान बचलै.एकएक टा बात,एकएक टा गारि बेचनी के एखनहु ओहिना मोन छै.एखन धरि नहि बिसरल भेलैए ओहि अपमान के...विलटुआ के बाप जखन गाम अयलहि तऽ सभटा बात बेचनी कहि देलकै आ' दुनू परानि ओही दिन सप्पत खैने रहै जे आब ओ ककरो पसारी बनि के नहि रहत.छुटि गेलै गिरहत..छुटलै कि छोड़ि देलकै...फेर विलटुआक बाप रसनचौकी बजाके आ' बेचनी खेत मे बोइन कऽ के विलटु के पढेलकै.......कलक्टर बनेलकै.परूका साल विलटु के बाप चलि गेलै बेचनी के असगरे छोड़ि के.नहि...नहि ओ एसगर कहाँ अछि......भरल-पुरल परिवार छै.एहन परिवार जकरा देख ककरा ने सेहन्ता लगैत छै.बेचनी के आँखि फेर नोरा गेल रहै.ओ फेर आँचर सँ आँखि पोछि लेलक.एतेक दिन बेचनी के एकटा प्रश्न बेर-बेर मोन मे उठैत छलै जे बच्चा बाबूक पुतोहु डाक्टरनी छै.ओहो तऽ परसौती करबै छै लेकिन ओकर छूअल किछो किएक नहि छुआएत छैक...?..मुदा आई अपना दलान पर बच्चा बाबू के चाह पिबैत देख बेचनी के एहि प्रश्नक उत्तर सेहो भेट गेलै.

मंच सजल छैक.मंच पर विलट बैसल अछि.गामक गणमान्य लोक सभ सेहो बैसल छथि.विलटक सम्मान समारोह आयोजित कयल गेल अछि.सभटा खर्च बच्चा बाबू केलखिन्ह.माइक पर किरतु मुखिया भाषण दऽ रहल छथिन्ह.-"हमर गामक श्री विलट राम,कलक्टर बनि गेलाह. ई हमरा सभक लेल गौरव के बात अछि.हम सभ आइ हुनका समस्त ग्रामीणक तरफ सँ सम्मानित करब..." बच्चा बाबू विलट के पाग, माल आ' दोपटा पहिराय सम्मानित करैत छथिन्ह.विलटक मुँह पर एखनो बस मुस्की टा छै.ओकरा सभटा बुझल छैक.बच्चा बाबूक किरदानी...मायक ब्यथा...समाजक चापलूसी..सभ जनैत अछि विलट आ तइँ ओकरा माथक पाग कोनो ठकक द्वारा पहिराओल टोपी सँ बेशी नहि लगैत छैक.मुदा,आब विलट ठकाइ बला नहि अछि आर तइँ ओकरा बच्चा बाबूक ठकबुद्धि पर हँसी लगैत छैक.

लोहनावाली


भोरक करीब सात बजैत रहै. लोहनावाली भनसाघर मे चुल्हा पजारति रहय.सिमसल चेरा पजरैत नहि रहय खाली धुआँइत छलैक. धुआँ भरल भनसाघर. फुकैत-फुकैत अकच्छ मोन भेल छै. आँखि फुटि रहल छलैक ओहि
धुआँभरल भनसाघर मे. आँखि लाल बून्न भ' गेल रहय. आँखि सँ नोर बहय लागल रहय मुदा कनैत नहि रहय एखन लोहनावाली. ओ त' आँखि मे धुआँ लागि गेल रहय तइँ नोरा गेल रहय.कानल त' राति मे रहय ओ. भरि राति कानल रहय...भरि राति कि जीवन भरि त' कनिते रहल अछि. ...नहि..नहि..जीवन भरि नहि .....जहिया से एहि घर मे वियाहि के आयल अछि तहिया से..जा धरि वियाह नहि भेल रहै, नैहर मे रहैत रहय, कहियो कोनो दुख-दर्दक भान नहि भेलै.बेटी भऽ जनम नेने छल तइयो बड्ड प्रेम भेटैत छलै माय-बापक.तीन भाय-बहिन मे एसगर बहिन तहू मे सबसे छोट.सभक मुहलगुआ..मायक रधिया..बाबूक राधा बेटी,......लोहनावाली........चुल्हि फुकैत लोहनावाली.
राति मे फेर जुगेसरा पी के आयल रहय.बड़का पियक्कर निकलि गेलैए.रोज ताडी-दारू चाही.सभटा जथा-पात बेचि पीबि गेलै.बड्ड मना करैत छैक लोहनावाली मुदा के सुनैए ओकर गप्प. बेचारी के रोज गारि-फज्झति सुन' पड़ैत छै उनटे.की करतइ अबला नारी, सहि लैत छैक सभटा.मुदा आब ओकरो कखनो-काल बर्दाश्त सँ बाहर भऽ जाइत छैक.मोन होइछै जे मरि जाय.एहन जीवन से त' मुइनहि नीक.फेर, दूनू बच्चा के मुँह देखि शांत भऽ जाइत अछि.आठ बरखक सुधीर आ पाँच बरखक सरिता छैक.इसकुलक मास्टर कहैत छथिन्ह जे सुधीर पढ़ै मे बड्ड तेज छैक आ' तइँ एतेक मारि-गारि खेलाक बादो लोहनावालीक एकेटा मनोरथ जियौने छैक जे सुधीर पढ़ि लेतै त' सभटा कलेश दूर भऽजेतइ.सरिता त' बेटी छियैक.अनकर धन.बस कोनो नीक ठाम बियाह भऽ जेतइ तँ सभ चिन्ता दूर भऽ जेतइ लोहनावाली के....आँच एखनो नहि पजरलैए...बियनि तकैत लोहनावाली.

रामावतार, लोहनावालीक जेठ भाय. बड्ड स्नेह करै छै लोहनावाली से रामावतार. कोनो एहन मास नहि होइछै जे ओ' नैहर से लोहनावाली ले सनेस नहि अनैत हो...सनेस की आब त' लोहनावालीक गुजरो नैहरेक बल पर होइ छै. हरदम पाइ-कौड़ी नैहर से अबैत रहैत छै.पन्द्रहो दिन नहि भेलैए दू गारी आमक चेरा पठा देने रहै रामावतार.एखनो सौसे दरबज्जा पसरल छै. पानि मरैले रौद मे देने रहए.ओही चेरा मे से एकटा घीचि के जुगेसरा राति मे मारने रहै लोहना बाली के. पाँजर मे एखनो कारी-सियाह चेन्ह भेल छै. ई चेन्ह त' तइयो मेटा जेतइ मुदा करेजा मे जे अपमान आ' दुत्कारक चेन्ह लागल छै से त' मुइनहि मेटैते....आँचर सँ नोर पोछैत लोहनावाली.

परसू रामावतार आयल रहै. जाइत काल गोरलगाइ मे एक सय टाका दैत गेल रहै लोहनावाली के. एकमास से सुधीर किताब कीनि दै ले हल्ला मचौने छेलइ.पचास टाका किताबे किनइ मे खर्च भऽ गेल रहय.बीस टाका गामबाली काकी से पैँच लेने छल.सरिताक दबाइक खातिर. ओहो सधा देलकै. तीस टाका बचल छेलै.ओहे तीस टाका काल्हि साँझ मे जुगेसरा के देने रहै लोहनावाली आ' बेर-बेर बुझा के कहने रहय जे घर मे सिधहा खतम भऽ गेल छै से ई पाय कत्तौ अनतऽ नहि खर्च करबा लेल.....अनतऽ की......एहि पाय के पीबै लेल नहि.मुदा हेहर भऽ गेल छै जुगेसरा.कोनो मतलब नहि छै ओकरा जेना बहु बच्चा से. दारू भेट जाउ बस आर किछ नहि चाही.भरि दिन टहलानी मारैत रहै छै.कोने-कोन गाजा तकैत रहैत छै.महा निशाँबाज भऽ गेल छै...पीबि गेलै ओहो तीस टाकाक दारू.साँझखन छूछै हाथ डोलबैत अबैत देख लोहनावाली के तामश चढ़ि गेल रहए.तामश एहि दुआरे नहि चढ़ल रहए जे ओ की खायत,लेकिन धिया-पुता के कोना भूखले सूत' देतइ.साँझे सँ बाट तकैत छल चुल्हि लग बैसलि.एकोरत्ती मोन मे विचार नहि अछि? कोना के पी गेलियै?...एतबे बाजल रहै लोहनावाली कि धेले चेरा मारि देलकै जुगेसरा.लोक-लाजक डर की बाजत.चुप्पे रहि गेल लोहनावाली.ओहन झाँट-बिहाड़ि एलै किछु नहि बुझलकै ओ.सून्न भऽ गेल रहैक ओकर दिमाग जेना.सभटा चेरा भीजि गेलइ.सुधीर आ' सरिता मायक कोरा मे मूड़ी नुकौने निन्न पड़ि गेलै.भुखले सूति रहलै...आ टक-टक तकैत रहि गेल लोहनावाली....भरि राति कनैत रहल लोहनावाली.

जखन लाल बहादुर शास्त्री देशक प्रधानमंत्री बनल रहथि तखन देशमे अन्न-संकट छल आ' ओहि समय मे गाम-घर मे एकटा प्रथा जनमल जे गृहणी लोकनि जखन सिधहा लगाबय लागथि तखन ओहि मे सँ एकमूठ्ठी चाउर निकालि के अलग राखि लैत छलीह आ' एकरा मुठिया चाउर कहल जाइत छल.एहि जोगाओल चाउरक उपयोग ओ' विपरीत काल मे घर चलैबाक लेल किनइ-बेसाहइ मे करैत छलीह.लोहनावाली सेहो माय के देखने रहै मुठिया चाउर जोगबैत आ' तइँ ओहो जोगा के रखइत छल मुठिया चाउर.

पैर नहि उठैछै भनसाघर दिस जाइक लेल.की करतइ ? भरि राति धीया-पुता भूखले छै.जल्दी-जल्दी चुल्हा लग आयल जे किछ बना के देतइ बच्चा सभ के. सुधीर के बजेलक आ एकटा तौला मे राखल मुठिया चाउर के पोटरी बान्हि दालि किनबा ले दोकान पठा देलकै.ओही तौला मे सँ सिधहा सेहो निकाललक.आँच धधकि गेलै.कतेक दिन तक ओ चलेतै घर एहि मुठिया चाउरक बलेँ...सोचैत अछि लोहनावाली..अधहन चढ़बैत लोहनावाली...सुधीरक बाट तकैत लोहनावाली.आब तऽ एकटा सुधीरे सँ आशा छैक जकरा बलै दिन काटत लोहनावाली.

Friday, April 6, 2012

अनकर दुर्गति



हाथ मे झोड़ा नेने, मोने मोन किछो गुनधुन मे पड़ल हम बजार दिस चलि जाइत रही. एतबे मे हमर लंगोटिया भजार भुटकून सोझाँ मे आबि गेलाह. ओ बम्बई सँ घर घुमल छलाह.दहिना हाथ मे अटैची रहैन्ह आ' बामा कान्ह पर बेश भरिगर बैग.नीक कमाइ छथि से सुनैत छलहुँ मुदा आइ हुनकर पहिरन-ओढ़न देख सबुत भेट गेल. लगीच अबितहि भरि पाँज पकडी लेलाह...की हाल-समाचार छौ रौ भजार..बाप रे कतेक दिनुका बाद भेँट भेल अछि..एह धन्य भए गेलहु..बजलाह. हमरो मोन हुनकर एहि मित्रता आ' हमरा प्रति स्नेह देखि गद-गद भ' गेल.पुछलियैन्ह ..की हाल छह..बहुत दिनुक बाद गाम मोन पड़लह. बिहुसैत बजलाह, काज-राज मे व्यस्त रहैत छी..समये नहि भेटैत अछि जे गाम आयब. ई त' आठम दिन बियाह छी तँइ आबय पडल. हम पुछलियैन्ह-ठीके ? ओ गंभीर होइत बजलाह-हाँ एहिठाम बगले मे रखबारी...फेर पुछलाह-मुदा तोँ एना किएक पुछलैह -"ठीक्के"?. हम कने अनमनस्क होइत बजलहुँ-नहि..नहि..अहिना..हमरा त' बिसबासे नहि भ' रहल अछि...ओना ई साल बड्ड शुभ छै देखहक ने बिदेसराक सेहो बियाह भ' गेलै. आब ओ' हम्मर बात बुझिगेल रहय.बिहुँसैत बाजल-ऐ रौ तु हमरा बुढ़ बुझैत छैह जे हमर गिनती ओहि  पैतालिस बरखक बिदेसरा से करैत छैँ. हम हसैँत कहलियन्हि-नहि...नहि ..अरे हमरा कहने हेतै त' हम त' तोरा एखनो एहू पैतिस बरखक अवस्था मे अठारह बरिखक छौडा कहबह मुदा ई त' गौआ सभ कहैत रहैत छह. भुटकुन हँसैत बाजल-हाँ...हाँ..ठीके कहबी छै ने जे अप्पन बियाह भ' गेल त' लगने खतम. हम कहलियैन्ह - नहि..नहि ई कहबी विल्कुल गलत अछि. हमरा बुझने कोनो विवाहित व्यक्ति ई नहि चाहैत होयत जे अनकर विवाह नहि हो. भुटकुन आश्चर्यचकित होइत बाजल-से कियेक ? दोसरक दुर्गति के नहि देखय चाहैत अछि ?-हम कहलियैन्ह.ओ भभा के हँसय लगलाह.

बिहनि कथा--"समय होत बलबान"




मालिक बाबा..माने श्री सुरुज ठाकुर..जमाना केँ जमींदार. एकटा समय छलै जखन बारह सौ बिगहा जोतैत रहथि. इनार,पोखरि,कलम-गाछी कथुक अभाव नहि.परोपट्टा मे नाम रहैन्ह. आँगा-पाँछा हरदम चारिटा लठैत रहैत छलन्हि.एही शान-रोआब दुआरे बड़का-छोटका सभ मालिक कहैत छलन्हि..एखनो कहैत छन्हि...कियो मालिक बाबा त' कियो मालिक काका. मुदा आब ओ समय नहि छन्हि.सुख-भोगक पाँछा निर्भूम भ' गेलाह.अपना खेतक लवाणो नहि होइत छन्हि.हँ घरारी एखनो पुरने छन्हि.बीच गामपर कम से कम पाँच बिगहा के. चारू कात जंगल जनमल रहैत छै आ' बिच मे पुरना हबेली छैन्ह.कतेको ठाम ढहल.मुदा रोआब एखनो पुरनके.चिनीया बिमारी छन्हि तइयो डाक्टर ल'ग जेबा सँ पहिने भरि पोख रसगुल्ला खा' लैत छथि. कहैत छथि -फेर सार डाक्टर मना करत. पहिने खा' लेब' दे. बात-बात मे गारि देब आदत बनल छैन्ह मुदा हुनकर गारि ककरो खराप नहि लगैत छैक.सभ असिरबादी बुझैत अछि.
परुका मलकाइन मरि गेलखिन्ह.बडड् प्रेम छलन्हि दुनू परानी मे.जहिया से मलकाइन मरलखिन्ह, मालिक बाबा बताह बनल रहैत छथि.एकदिन बारीक आमक गाछ पर कोइली बाजब सुनि अनेरे गरियाब' लगलाह.कोनो नेना ई घटना देखि लेलक. मालिक बाबा..कूउ..अनायास ओकर मुँह सँ बहरा गेलै. माइये-बहिन ओकरा गरिया देलखिन्ह.असर्ध गारि सभ. फेर की ई त' खिस्सा बनि गेल..मालिक बाबा ..कूउ..की बच्चा..की चेतन..सभ खौँझाबय लागल आ' असिरबादी सुनय लागल.
काल्हि मलिकाइन के बरखी छियैन्ह. एगारह टा ब्राह्मण के खुएथिन्ह तकरे इंतजाम मे लागल रहथि.घामे-पसेने तर.थाकि गेल रहथि. दरबज्जा पर बसि रहलाह.खरिहान मे एकटा बकरी चरैत रहय.बारी मे फेर कोइली बाजल..कूउ..तामस चढि गेल रहन्हि..मुदा गारि नहि बहरेलन्हि मुँह सँ..आँखि भीज गेलन्हि. गमछा लय मूह-आँखि पोछय लगलाह. बकरी मेमिया उठल..बुझेलन्हि जेना मलकाइन बौसि रहल हो. कहैत होइथिन्ह -"समय होत बलबान"

सद्गति




अनहेर भ गेलै......कोना के आब कटतै ओकर परिवारक दिन......? कंठ लागल बेटी छै घर मे...... दू टा संतान मे बेटीए जेठ छै......कोना हेतइ ओकर बियाह? किशन..असेसरक बेटा ...चौदहे बरखक छै.......कोना के सम्हारतै घर.? कोना करतै बहिनक बियाह......?बेशी जथो-पात नहि छै जे बेच लेत. पाँचे कट्ठा खेत छैक. ओकरो यदि बेच लेत तखन खेतै कथी.? अनेको प्रश्न..अनेको मुँह...सगरो संवेदना...सगरो गाम एकहि टा' बात..जुलुम भ' गेलै........भरल जुआनी मरि गेल असेसर......चालीसे बरखक अबस्था मे...नहि जानि कोन बेमारी धेलकै..ओह ....कन्नारोहट...नहि देखल जाइछ किशुनमा मायक कानब..हे भगवान...ई की भइ गेलै.....?
हाक-डाक छै......के जेतै कठियारी......एगारह गोटे हिम्मत क के विदा भेल. आगाँ-आगाँ किशन हाथ मे आगिक कोहा नेने विदाह भेल...मुखाग्नि देलकै..धधकि उठल अछिया..कक्का .....हबोढकार भ' कानय लागल किशुनमा हमरा कान्ह पर मूड़ी रखने...संतोष बान्ह.....नहि भेल एहि सँ आगाँ किछु कहल हमरो..कंठ बाझि गेल जेना.
तीन दिन बीतल..बैसार छै आइ..कोना हेतै काज..गंगे कात मे बढ़िया हेतै-कहलियै हम."नहि-नहि, ई ठीक नइ हेतइ"- चट द' कहलखिन्ह पढुआ कका. चुप भ' गेल रही हम."कनिञा, अहाँ कोनो तरहक चिन्ता नहि करू..हमरा लेल जेहने हमर अप्पन बेटा-पुतोहु अछि तहिना अहूँ छी. हम करबइ असेसरक श्राद्ध. ओकर श्राद्ध गामे मे हेतइ. अहाँक जतेक खर्च करबाक हो से करू. अहाँक जे केने संतोष भेटै से करू. कोनो तरहक बिथुति नहि रहतैक." -असेसरक कनिञा के कहलखिन्ह पढुआ कका. केबारक अढ़ मे बैसलि किशुनमा माय आ' दरबज्जा पर बैसल किशन, किछु नहि बाजल रहय. "हाँ-हाँ, नीक जेकाँ श्राद्ध त' हेबाके चाही जाहि सँ मृतक के सद्गति प्राप्त हो"- बजलथि पण्डित कका.
पंचदान श्राद्ध आ दुनू साँझ सौजनिया होयब निश्चित भेल.एकादशा......द्वादशा...बड़..बड़ी..पचमेर..बड्ड नीक काज भेलइ. जेहने पवित्र असेसरक मोन रहैक तेहने पवित्र काज भेलै.सभ सामग्री एक पर एक..... जस दैत नोतहारी....सौँसे गाम.
माछ-मौसक प्रात, आगाँ-आगाँ किशुन आ' पाछाँ ओकर माय के चौक दिस सँ अबैत देख मोन मे शंका भेल.लग अबितहि पुछलियै-कत' सँ अबैत छह.? "झंझारपुर सँ"-कहलक किशुन.मोनक शंका आओर बढ़ि गेल. तखनहि पाछाँ सँ पढ़ुआ कका के अबैत देख सभ शंका दूर भ' गेल छल.रजिस्ट्री आफिस सँ?...मुँह सँ बहरा गेल हमरा..मूड़ी झुका लेलक किशुन..किशुनक हाथ मे झुलैत रसगुल्ला भरल पन्नी देख अनायास मुँह सँ बहरा गेल-"सद्गति भेट गेल असेसर के".

Wednesday, April 4, 2012

बिहनि कथा-बुच्चू भइया


बिहनि कथा-बुच्चू भइया

करमान लागल लोक..अनघोल भेल सौंसे गाम..जकरे देखू तकरे आँखि मे नोर..सगरो संताप पसरल..नहि रहलथि बुच्चू भैया आब एहि दुनिया मे.पचासी बरखक अवस्था भ गेल रहन्हि तइयो सभ बुच्चू भइये कहैत छलन्हि. नेना-भुटका, जर-जवान, बुढ-पुरान,स्त्री-पुरूख..सभक भैया..बुच्चू भैया छलाह. अनकर कोन कथा अपनो बेटा-पोता सभ त' बुच्चू भइये कहैत छलन्हि.कोनो बेशी पढल-लिखल नहि छलाह मुदा बेबहारिक गेयान सँ परिपूर्ण.समाज मे घुलल-मिलल लोक.ककरो-कहियो कोनोटा खराप नहि सोचलखिन्ह जीवन भरि.सभके हरदम नीके रस्ता देखबैत रहलाह.भरि गाम मे ककरो ओहिठाम कोनो तरहक दसगरदा काज मे बिन-बजौनहु पहुँचि जाइत रहैत.कोनो तरहक राग-द्वेश नहि.एकदम शुद्ध-मना.एही गुण सभ दुआरे तऽ एतेक सम्मान भेटै छलन्हि सभठाँ.अनकर कोन कथा बड़का पण्डिजी सेहो हिनकर मान करै छलखिन्ह.उमेर मे नमहर रहितौ ओहो बुच्चुए भइया कहैत छलखिन्ह.
दलान पर कुरसी लगा बैसल बुच्चू भइया...अबैत जाइत लोक..के छोट..के पैघ..सब बइस रहैत छल हुनका सँ दू आखर सुनबा लय..... जिनगीक उँच-नीच गुनबा लय.....खिस्सा-पिहानी सुनबा लय.कल्ला तर पान..ठहक्का मारैत बुच्चू भइया नजरि के सोझाँ ओहिना नाचि रहल छथि.आँखि हमरो नोरा गेल.
माँझ अँगना उत्तर मूँहे सूतल छथि बुच्चू भइया.मूँह पर एखनो हँसी पसरल..दिव्य ललाट. गौदान-वैतरनी भ' गेल...बाँसक रथ सवार बुच्चू भइया विदाह भेल छथि अंतिम यात्रा पर...कन्नारोहट उठल सगरो..शांत बुच्चू भइया ..आइ नहि पोछलखिन्ह ककरो नोर.सिरहौना-पोछौना..आमक लकड़ी बोझल गेल..सभ काठी चढौलक श्रद्धांजलि-सवरूप.मुखाग्नि पड़ल..सरर..धुमन..गमकथि बुच्चू भइया.चर्चा-परिचर्चा..केयो बजलइ-"एकबेर बुच्चू भइया के कोनो बात लेल तामश उठि गेलनि.बौसति कियो कहलकन्हि -अहूँ के बड्ड तामश उठैत अछि. हमरा त़ऽ हरदम तामश उठले रहैत अछि, चट्ट दऽ कहने रहथिन्ह बुच्चू भइया"-सभ हँसऽ लागल...धधरा जोर भऽ गेलइ..हँसैत बुच्चू भइया.