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Friday, April 6, 2012

रामप्रवेश मंडल जीक वि‍हनि‍ कथा


मूल-मंत्र

तीन दि‍नसँ ऑफि‍सक चक्कर काटि‍ रहल छी मुदा, एखनो धरि‍ प्रमाण पत्र बनैक आशा नै‍ बुझना जाइत अछि‍। चाकरी नि‍मि‍त आवेदन करब समए बड़ कम अछि‍। ककरो पूछैत छी काज कोना होएत तँ कहैत अछि‍- “कखनो हाकि‍म नै‍ तँ कखनो कि‍रानी नै‍।‍” काज कोना होएत?
      तखन बीरू भाय आबि‍ पुछलक- “अहॉं कि‍एक उदास भऽ बैसल छी?‍”
  बीरू भायकेँ अपन व्‍यथा कथा कहि‍ सुनौलौं। हुनक गंजीपर लि‍खल रहए- ‘होएवाक चाही ई मूलमंत्र भ्रष्‍टाचारक हुअए अंत‘
      बीरू भाय बाजल- “हँ!‍ काज भए जाएत मुदा, चाह-पानक खचर लगत? हाकीम नै‍ अछि‍ तँ कोनो बात नै‍। अहॉंक काज भऽ जाएत।”
      चाह-पानक खरच कतेक पॉंच नै‍ दस टका आओर की सोचेत हम बजलौं- “काज करा दि‍अ। समए बड़ कम अछि‍।‍”
      बीरू भाय सभटा कागज लऽ कऽ ऑफि‍स जाइत बजलाह- “चाह-पान कऽ कि‍छु कालक बाद अहॉं आपस आबि‍ प्रमाण पत्र लऽ जाउ।‍”
  कि‍छु खानक बाद पहुँचलौं। बीरू भाय प्रमाण पत्र दैत बाजल- “लावह चाह पानक खर्चा?‍”
      एकटा दस टकही सि‍क्‍का नि‍काली बीरू भाय दि‍स‍ बढ़ेलौं। बीरू भाइक क्रोध आसमान पड़ चढ़ि‍ गेल ओ बाजल- “एक सए चाहक, एक सए पानक दूइ सए टाका नि‍कालह नै‍ तँ ऐ‍ कागजकेँ खण्‍ड-खण्‍ड कऽ फेंक देबह।‍”
      कोनो उपाए नै‍ देखैत लाचार भऽ बीरू भायकेँ दुइ सए टाका दि‍अ पड़ल आ तखन हमरा समझमे आएल की होइत अछि‍ ऐ‍ मूलमंत्रक मतलब!

सम्पर्क-
गाम, पोस्‍ट, रतनसारा
भाया- बेलही
जि‍ला- मधुबनी

Wednesday, April 4, 2012

राम प्रवेश मंडलक विहनि कथा- बुरबक



बुरबक

रेलगाड़ीसँ दि‍ल्ली‍क यात्रा करैत रही। संध्यारक सात बजैत छल। स्टे शनपर गाड़ी ठाढ़ भेल। एकटा युवक आबि‍ हमरा सबहक बीच बैठला। हमरा हुनका देखतहि‍ शंका भऽ गेल। ओ अपन झोरासँ वि‍भि‍न्न प्रकारक पोथी नि‍कालि‍ सबहक दि‍स बढ़ौबैत बाजल- “पढ़े जाउ नीक पोथी अछि‍।‍”
  कि‍छु खानक बाद झोरासँ देवी मैयाक प्रसाद नि‍कालैत बाजल- “चारि‍ चकाक ड्राइवरी लाइसेंस नि‍कलल। मनोकामना पूर्ण भेल। ओहि‍ लेल प्रसाद चढ़ेलहुँ। अहुँ सभ लि‍अ।‍”
  सभ केओ प्रसाद लेलक मुदा हम नहि‍ लेलहुँ। तखन सबहक सोझामे नीकसँ बुरबक बनलहुँ। गाड़ी चलैत रहल। राति‍ होएवाक कारणें बुरबक बनलहुँ। गाड़ी चलैत रहल। राति‍ होएवाक नि‍ंदि‍यादेवी अपन मायाकेँ पसारलक। सभ केयो सुति‍ रहला।
     कि‍छु लोककेँ नीन खुजलाक वाद हल्ला। भेलैक- हमर समान नहि‍ अछि‍। हमरो समान नहि‍ अछि‍। प्रसाद वॉटैबला युवक बीचसँ पहि‍ले नि‍कलि‍ गेल रहए। प्रसादमे नशा देल रहैक। सभ कि‍यो उदास भऽ गेल। हम पुछलहुँ- “‍आव कहु हम बुरवक कि‍ अहाँ सभ बुरबक?‍”


(साभार विदेह विहनि कथा अंक www.videha.co.in )