Showing posts with label रघुनाथ मुखिया. Show all posts
Showing posts with label रघुनाथ मुखिया. Show all posts

Thursday, April 5, 2012

रघुनाथ मुखिया- विहनि कथा- ग्रीन हाउसमे कुकूर

ग्रीन हाउसमे कुकूर 

दिसम्बरक अन्त। आइ ४८ डिग्री तापमान होएबाक सम्भावना अछि। कृपया अपन माथपर बरफ लपेटि लेल जाउ। किएक तँ भुस्सामे शीघ्रहि आगि पकड़बाक सम्भावना रहैत छैक। जेना माटिकेँ माटि खाइत अछि, लोहाकेँ लोहा कटैत अछि। माहुरकेँ माहुर, हीराकेँ हीरा आ सोनाकेँ सोना कटैत अछि। तेँ अहाँकेँ कुकूर कटैत अछि।

(साभार विदेह विहनि कथा विशेषांक अंक ६७- www.videha.co.in)

रघुनाथ मुखिया- विहनि कथा- मुँहलगुआ

मुँहलगुआ 

अँय रौ गणेश! ई हड्डी भरि राति चौबट्टीपर एहिना राखल रहि गेलै। नढ़ियो-कुकुर नै छुलकै। ई कोना भेलै रौ। लागैए जे ई हड्डी कोनो शेरक ठमाएल छै। डरे नढ़िया-कुकूर नै छुलकै, नै?

  गणेश मौन भंग करैत बाजल- नै, नै। शेरक ऐंठाएल हड्डी-गुड्डी तँ सभ दिनेसँ नढ़िया-कुकूर चोभैत अइलैए, भाइ साहेब। हमरा बुझने इहो हड्डी कोनो ने कोनो नढ़ियेक राखल छिऐ। तेँ एखन धरि डरे किओ सुंघबो धरि नै केलकैए। कारण जे आब तँ साहेबसँ बेसी मुँहलगुएक डर होइ छै नै।

(साभार विदेह विहनि कथा विशेषांक अंक ६७- www.videha.co.in)

रघुनाथ मुखिया- विहनि कथा- नियति

नियति

कॉमरेड गनेसर कामति भोरे-भोर बलहा बाजारपर एलाह। हुनका संगमे सिंहजी रहनि। दुनू गोटऽ बनारसी पासीक घर धरिक कएक फेरी लगेलक। फेर मन्दिरक आगाँमे ठाढ़ भेल।

  आब एकटा करिया चश्माबला भीमकाय कायाधारी मिसरजीकेँ इशारा करैत बाजए लागल- घरो तोरे, पिनसिलो तोरे, लौनो तोरे, बीपैलो तोरे। बढ़मोत्तर तोरे, शिवोत्तर तोरे। आएल-गेल सेहो सभटा तोरे। तब अहीं कहियौ ने। हम गरिबाहा सभ की लेबै- “बापक हुरिया”।

  मिसरजी अपन जीहकेँ दाँतसँ कुचैत मुसकिएलाह। अपन डाँड़सँ एकटा कागचक पुड़िया आ आंगुर भरिकऽ चीलम निकालि कॉमरेडक हाथमे थम्हा देलक।
(साभार विदेह विहनि कथा विशेषांक अंक ६७- www.videha.co.in)

रघुनाथ मुखिया- विहनि कथा- जुलुम

जुलुम 

लोकसभा चुनावक प्रचार-प्रसार शुरू भऽ गेल रहै। स्पीकरक गर्दमिशान करैत अबाज “छौंड़ीकेँ देलकौ धक्का मारि”क अबाज सुनिते काजक सूरि टुटि गेलै। गेनमा आ चुल्हाय सदाक कोदारि रुकि गेलै।

गेनमा आड़िपर जा कऽ डाँर सीधा करऽ लागल। चुल्हाय गमछासँ पसेना पोछि तमाकू चुनबैत पुछलकै- अँय रौ गेनमा! जीतै लऽ जौं एक्के थारीमे गाए आ सुगरक मासु खाए पड़ि जाए तँ ओ के सभ खेतै रौ?

गेनमा तमाकूक लेल हाथ पसारैत बाजल- हौ कका! एत्तेटाक दुनियाँमे एहेन एक्केटा जाति होइ छै- “नेताजी।” आ ताहिमे जँ हिसाब करबहक जे ई नेता खेतै की ओ नेता, से तँ जुलुमे ने करबहक।


(साभार विदेह विहनि कथा विशेषांक अंक ६७- www.videha.co.in)

रघुनाथ मुखिया- विहनि कथा- इण्डियन

इण्डियन

ई अछि नेपालक जनकपुरधाम। विवाह मंडपक फुलवाड़ीमे युक्लिप्टसक गाछ देखि ऋषि वशिष्ठ बजलाह- ई तेजपातक गाछ अछि की? हम नजरि पड़िते चिन्ह गेलौं आ बजलहुँ- नै-नै भाय, ई तेजपात नै, युक्लिप्टस अछि। एकर पातकेँ मीरकेँ सुंघलासँ विक्स जकाँ गमकैत अछि। वशिष्ठजी पात तोड़बाक लेल अपन डेग उठौलनि कि नजरि पड़ि गेलनि विष्ठाक चोतपर आ बजलाह- “लगैए एत्तौ इण्डियन आबै छै। नै? ”


(साभार विदेह विहनि कथा विशेषांक अंक ६७- www.videha.co.in)