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Friday, April 6, 2012

बेचन ठाकुरक वि‍हनि‍ कथा

फुसि‍ केर फल

संत कवि‍र दासक पाँति‍ आछि‍- “साँच बरावर तप नही, झुट बरावर पाप जाके हृदय साँच है, ताके हृदय आप।‍”
तातपर्य अछि‍- “सत्‍यमेव जयते।‍”
एक गोट फुसि‍केँ बचाबए हेतू सहस्‍त्र फुसि‍ बाजए पड़ैत अछि‍। मुदा ओ स्‍थायी रूपसँ नै‍ पचि‍ सकैत अछि‍ कने देरे सही, फुसि‍ फुसि‍ए प्रमाणि‍त होइत अछि‍। गीतामे कृष्‍ण कहने छथि‍न- “जेसा कर्म करैगा वैसा फल देगा भगवान।‍”

मोहनक छोट भाए सोहन मैट्रीकक बोड परीक्षा दऽ कऽ मधुबनीसँ घर आबि‍ रहल छलै। दुनू भाँइ संगे छल। रस्‍तामे बि‍ना टि‍कट रेलगाड़ीसँ कि‍छु दूरी तँइ केलक मुदा कि‍छु दूरी तँइ करए हेतु ट्रेकर-मैक्‍सी पकड़वाक खगता भेलै आ दुनू भाँइ मैक्‍सीपर चढ़ि‍ गेलै। सोहनक अभि‍भावक मोहन लग भाड़ाक पाइ नै छलै। ओ सोचलक- “जँ हम साँच बाजि‍ दै छी तँ कन्‍टेक्‍टर मैक्‍सीसँ उतारि‍ देत। हम घर कोना जा सकव। जँ झुट जोरसँ बाजि‍ दैत छी तँ ओकरा हमरा लऽ जेनाइ मजबुरी भऽ जेतै।”
  कन्‍डक्‍टर भाड़ा ओसलैत-ओसलैत मोहन लग आबि‍ कहलनि‍- “श्री मान् कतऽ जाएब।‍”
  मोहन जबाव देलक- “झंझारपुर।‍”
  कन्‍डक्‍टर- “भाड़ा दि‍औ।‍”
  झट मोहन बाजि‍ उठल- “भाड़ा देलौं से?‍”
  कन्‍डक्‍टर- “अहाँ भाड़ा नै देलि‍ऐ, मन पारू।”
  मोहन- “मने-मन अछि‍।‍ मन िक पारू। भाड़ा हम अहाँकेँ दऽ देलौं।”
  कन्‍डक्‍टर सोचलनि‍ भऽ सकै छै, एकरा लग पाइयक मजबुरी होय। मुदा एकरा फुसि‍ नै बजबाक चाही।‍ बजलाह- “जौ अहाँ लग भाड़ा नै अछि‍ तँ बाजू हम ओहि‍ना लऽ जाएब। मुदा बेकूफ नै बनाऊ।‍”
  मोहन- “ऐ‍मे बेकूफक कोन गप्‍प? हम अहाँकेँ भाड़ा देलौं, अहाँ मन पारू।‍”
  कन्‍डक्‍टर खि‍सि‍आ कऽ पुछि‍ बैठलाह- “बाजू बेटा मरि‍ जाए, हम भाड़ा दऽ देलौं।‍”
  मोहन- “बेटा मरि‍ जाए, हम भाड़ा दऽ देलौं।‍”
  कन्‍डक्‍टर कहलनि‍- “बेस चलु, आब भाड़ा नै‍ मांगब।‍”
  सोहन अपन भैयाक फुसि‍ गप्‍पपर बड्ड आश्‍चर्यमे पड़ल छल। मुदा बाजत तँ बाजत की‍।
      गाम आबि‍ मोहन कि‍छुए दि‍नक बाद बोकारो गेलाह। कनि‍याक बड्ड जि‍द्द केलाक बाद हुनको संग लए गेलाह। संगमे दुगो बेटो छलनि‍। परि‍वारक संग पहि‍ले खेपि‍ बाहर गेल छलाह। ओना ओ बोकारो पॉंच साल पूर्वहि‍सँ रहैत छलाह। तीन महि‍नाक अंदर मोहनक छोटका बेटा रमन बेमार पड़ल। बोकारोमे बड्ड इलाज भेल मुदा ओ चंगा नै‍ भेल। फेर ओ सपरि‍वार गाम आबि‍ गेलाह। गामोमे बड्ड इलाज भेल मुदा ओ बचि‍ नै‍ सकल, मृत्‍युक प्राप्‍त भेल। परि‍स्‍थि‍ति‍ वस सोहनकेँ ओकरा आगि‍ दि‍अए पड़लै। आओर मोहनकेँ ओकर उचि‍त कर्मो करए पड़लैक।
      एगो कहबी छै- “गज भरि‍ नै हारी, थान भरि‍ फारी।‍”

सम्‍पर्क-
गाम, चनौरागंज
जि‍ला- मधुबनी

Thursday, April 5, 2012

बेचन ठाकुरक दूटा वि‍हनि‍ कथा


चल आइये

आश्चर्यचकि‍त भऽ राम बाजल-
“रहीम भाय, एक्को महि‍ना मुंबइ एना नै भेल आकि‍ फेर गाम जाइ छेँ। की कारण छै?”
रहीम हँसि‍ कऽ बजला-
“राम भाय, नाझलुहु। गाममे इलेक्‍शन हइ न। जोगी मुखि‍या गामपर खूद आबि‍ कहि‍ गेल ह, बाहरबलाकेँ भोँट खसाबै लऽ गाम एबाक लेल अबै-जाइक भाड़ा आ दारू फ्री।”

कनीकाल गुम्‍म भऽ आ कि‍छु सोचि‍ कऽ राम बाजल- “भाय, हमरा मुंबइ एना एक सप्‍ताह भेल। ई बात हमरा नै बुझल छल। जौं ई बात छै तँ चलह आइये।”


डाक डकोबलि‍

मुस्‍की दैत मुखि‍याजी- “की हौ फेकन भैया। काल्हि‍ नोमि‍नेशनमे चलबाक छै?”
ऐपर खीसि‍या कऽ फेकन बाजल- “कोन सपेत-के यौ?”
आश्चर्यमे पड़ि‍ मुखि‍याजी बाजला- “बि‍सरि‍ गेलहक। काल्हि‍ साँझमे जे पलोथि‍न लेल दूटा नमरी देने रहि‍अह।”
ऐपर मुस्‍का कऽ फेकन जबाक देलक- “से तँ मने अछि‍ मुदा लुटनबाबूकेँ केना बि‍सरि‍ जेबै जे आइ भोरे भोर नोमीनेशनमे जाइले आ खाइ-पीऐले पाँच सए टाका अपने दऽ गेला। हुनकामे मार्शलक बेवस्‍था सेहो छै।”

विहनि कथा- आत्म हत्या


एहि‍ संसारमे इर्ष्याल-द्वेषक भावना अति‍ व्या,प्तर। सद्भावनाक डि‍वि‍यामे तेल सधल जकाँ अछि‍। लोक अपन दुखसँ ओतेक दुखी नहि‍ अछि‍ जतेक अनकर सुखसँ। कर्तव्य  अपन गाम छोड़ि‍ आनठाम बौआए रहल अछि‍। बेचाराकेँ कतौ जगह नै भेटै छै।
     बारह बर्खक बेटी पूनम आर नअ बर्खक बेटा सुमन बड्ड नीक ढंगसँ भाए-बहि‍नक भूमि‍का अदाए कए रहल अछि‍। पूनमक बाप मंगल अपन ताड़ीक धंधामे व्‍यस्तढ अछि‍। भि‍नसरसँ साँझ धरि‍ तार वा खजूरसँ ताड़ी उतारैमे लागल रहैत अछि‍। कहि‍यो-कहि‍यो खैनाइयो पर आफत। वि‍सराम तँ दि‍न भरि‍ दि‍ल्लीँ दूर। मुदा पूनमक माए हीरा ताड़ी बेचि‍ फुटानीमे ओतैक मस्ति अछि‍ जे सामाजमे केकरो सोहाए नहि‍ रहलि‍ अछि‍। कारण ओ अपन पति‍ आ संतानक पि‍यारकेँ बि‍सरि‍ अपन पसीनक सुखक लेल टि‍ंकुक संग रहि‍ रहलि‍ अछि‍। मुदा पापक घैला एक ने एक दि‍न अवश्यक फुटै छै। एक दि‍न दि‍नहि‍मे मंगल हीराकेँ टि‍ंकुक संग रंगल हाथ पकड़ि‍ लेलनि‍। बेचारे सोचलनि‍- “‍हम एहि‍ दुनि‍यामे बेकार लए छी। जखन हमरा कोनो मोजरे ने दैए।”
  क्रोधि‍त भऽ ओ बाजि‍ उठला- “सभसे बड़ो समाज।‍ समाज हमरा जे जेना फैसला देथि‍।”
     साँझहि‍ पंचैती भेल। पंचक फैसला भेल- “टि‍ंकुकेँ एक हजार एक टाका जुर्माना लगतै आ आइदा ओ एहेन गलती नइ करतै, जँ केलकै तँ भरल सभामे ओकरा दू खण्डि काटि‍, गाड़ि‍ देल जेतै‍।”
  फेर पंच हीराकेँ बजा सेहो पुछलनि‍- “अहाँ हीरा, एना कि‍एक केलि‍ऐ, इज्ज”त प्रति‍ष्ठाद कोठि‍क कन्हापपर राखि‍ देलि‍ऐ कि‍?‍”
  हीरा बाजलि‍- “इज्ज‍त-प्रति‍ष्ठाए हम की कोठी कन्हाापर राखब, हमर बापे राखि‍ देलनि‍। हम मुरूख आ कुरूप छी तेँ कि‍ हमरा तँ स्माइर्ट घरबला चाही ने।‍”
     पंचक मुड़ी नि‍च्चॉं् खसि‍ पड़ल। फेर सामाजि‍क बंधनक खि‍यालसँ ओ सभ चुप नहि‍ रहि‍ सकल- “अहाँक बाप गलती केलनि‍ तेकर फल मांगलाकेँ हेते, हमर समाज ि‍धनाए‍, अहाँ आइसँ चेत जाउ। नहि‍ तँ समाजसँ पैध क्योल नहि‍ अछि‍।”
     कहबी छै- “चालि‍, प्रकृति‍, बेमाए तीनू मुइनेहि‍ जाए।‍”
  हीरा पि‍ंकु अपन कुकर्म नहि‍ छोड़लक। अपि‍तु सहचेती बर्तलक मुदा छुपल कहाँ रहल। दुनू बेटा-बेटी पकड़ि‍ये लेलक। हल्लाु केलक तँ दुनू दुनूसँ मारि‍ओ खेलक। मुदा समाज एहि‍बेर मामलाकेँ गमभि‍र्ता पूर्वक लेबाक नि‍र्णए केलक। टि‍ंकु कहुनाकेँ गाम छोड़ि‍ पड़ा गेल। पंच सोचलनि‍- “सजाएक भागी दुनू अछि‍। मुदा टि‍ंकु पराएल अछि‍। तेँ अइ जनानीकेँ तारन देल जाए।‍”
  बि‍चार कल्हि‍ साँझक भेलै तै बीच दि‍नेमे ओ फसरी लगा आत्मचहत्याम कऽ लेलक। पुलि‍श खबड़ि‍ पाबि‍ घटना स्थबलपर पहुँचल। बेचारीकेँ पोस्टकमार्टम भऽ धौजन-धौजन भए गेल मामला भरि‍आ गेलै। नि‍र्दोष परोसी वि‍जय ओहि‍ समए बाबा धाममे रहि‍तहुँ केसमे चि‍क्कनसँ लटपटा गेल और पति‍ मंगलकेँ तीस सालक जहलक सजाए भेटल। दुनू भाए-बहि‍न टौआ-बौआ रहल अछि‍। आगू नाथ ने पाछु पगहा छै ओकरा सभकेँ।

विहनि कथा- फुसि‍क फल


संत कवि‍र दासक पाँति‍ आछि‍- “साँच बरावर तप नही, झुट बरावर पाप जाके हृदय साँच है, ताके हृदय आप।‍”
  तातपर्य अछि‍- “सत्यआमेव जयते।‍”
  एक गोट फुसि‍केँ बचाबए हेतू सहस्त्र  फुसि‍ बाजए पड़ैत अछि‍। मुदा ओ स्थादयी रूपसँ नहि‍ पचि‍ सकैत अछि‍ कने देरे सही, फुसि‍ फुसि‍ए प्रमाणि‍त होइत अछि‍। गीतामे कृष्णय कहने छथि‍न- “जेसा कर्म करैगा वैसा फल देगा भगवान।‍”
     मोहनक छोट भाए सोहन मैट्रीकक बोड परीक्षा दऽ कऽ मधुबनीसँ घर आबि‍ रहल छलै। दुनू भाँइ संगे छल। रस्तागमे बि‍ना टि‍कट रेलगाड़ीसँ कि‍छु दूरी तँइ केलक मुदा कि‍छु दूरी तँइ करए हेतु ट्रेकर-मैक्सीन पकड़वाक खगता भेलै आ दुनू भाँइ मैक्सीिपर चढ़ि‍ गेलै। सोहनक अभि‍भावक मोहन लग भाड़ाक पाइ नै छलै। ओ सोचलक- “जँ हम साँच बाजि‍ दै छी तँ कन्टेसक्टेर मैक्सी सँ उताड़ि‍ देत। हम घर कोना जा सकव। जँ झुट जोरसँ बाजि‍ दैत छी तँ ओकरा हमरा लऽ जेनाइ मजबुरी भऽ जेतै।”
  कन्डजक्ट“र भाड़ा ओसलैत-ओसलैत मोहन लग आबि‍ कहलनि‍- “श्री मान् कतऽ जाएव।‍”
  मोहन जबाव देलक- “झंझारपुर।‍”
  कन्ड क्ट“र- “भाड़ा दि‍औ।‍”
  झट मोहन बाजि‍ उठल- “भाड़ा देलौं से?‍”
  कन्डोक्ट‍र- “अहाँ भाड़ा नै देलि‍ऐ, मन पारू।”
  मोहन- “मने-मन अछि‍।‍ मन िक पारू। भाड़ा हम अहाँकेँ दऽ देलौं।”
  कन्डोक्ट“र सोचलनि‍ भऽ सकै छै, एकरा लग पाइयक मजबुरी होय। मुदा एकरा फुसि‍ नै बजबाक चाही।‍ बजलाह- “जौ अहाँ लग भाड़ा नै अछि‍ तँ बाजू हम ओहि‍ना लऽ जाएव। मुदा बेकूफ नै बनाऊ।‍”
  मोहन- “एहि‍मे बेकूफक कोन गप्प ? हम अहाँकेँ भाड़ा देलौं, अहाँ मन पारू।‍”
  कन्ड क्ट“र खि‍सि‍आ कऽ पुछि‍ बैठलाह- “बाजू बेटा मरि‍ जाए, हम भाड़ा दऽ देलौं।‍”
  मोहन- “बेटा मरि‍ जाए, हम भाड़ा दऽ देलौं।‍”
  कन्ड क्ट“र कहलनि‍- “बेस चलु, आब भाड़ा नहि‍ मांगब।‍”
  सोहन अपन भैयाक फुसि‍ गप्प‍पर बड्ड आश्चलर्यमे पड़ल छल। मुदा बाजत तँ बाजत कि‍।
     गाम आबि‍ मोहन कि‍छुए दि‍नक बाद बोकारो गेलाह। कनि‍याक बड्ड जि‍द्द केलाक वाद हुनको संग लए गेलाह। संगमे दुगो बेटो छलनि‍। परि‍वारक संग पहि‍ले खेपि‍ बाहर गेल छलाह। ओना ओ बोकारो पॉंच साल पूर्वहि‍सँ रहैत छलाह। तीन महि‍नाक अंदर मोहनक छोटका बेटा रमन बेमार पड़ल। बोकारोमे बड्ड इलाज भेल मुदा ओ चंगा नहि‍ भेल। फेर ओ सपरि‍वार गाम आबि‍ गेलाह। गामोमे बड्ड इलाज भेल मुदा ओ बचि‍ नहि‍ सकल, मृत्युेक प्राप्तह भेल। परि‍स्थिा‍ति‍ वस सोहनकेँ ओकरा आगि‍ दि‍अए पड़लै। आओर मोहनकेँ ओकर उचि‍त कर्मो करए पड़लैक।
     एगो कहबी छै- “गज भरि‍ नै हारी, थान भरि‍ फारी।‍”