Wednesday, April 23, 2014

नेनाक छवि


दिनानाथ बाबूक बहरीया बेटा पुतहु अपन १२ बरखक पोती संगे बहुत बरखक बाद कोनो विशेष अबसरपर  गाम एलाह दलानपर, अपन पारम्परिक पोषाकमे  दिनानाथजी हुनक बेटा जीन्स पेंट टीशर्ट पहीर बैशल। ताबतेमे  एकटा बयोवृद्ध, गामक सम्बन्धमे दिनानाथ जीक काकाक आगमन भेलनि हुनका बैसक उचित स्थान देला बाद दिनानाथ जीक पुत्र हुनक पएर छूबैत,  "गोर लगै छी बाबा।"
" खूब नीके रहू।"
"कतए रहै छी?"
"दिल्लीमे "
"हमरा तँ अहाँ सभकेँ देखलो कतेको बरख भए गेल।" कनीक काल चूप रहला बाद, "ब्याह  भए गेल की ?"
प्रश्न बाबा हुनक वस्त्र कि  हुनक नहि बुझाइत बएसकेँ कारण पुछलखिन। अपन चॉकलेटी शरीर ड्रेससँ एखनो २५ बरखसँ बेसीक नहि बुझाई छला।
"सृष्टी, सृष्टी……" बाबाक प्रश्न सुनिते, कोनो उत्तर देबैक  जगह   सृष्टी, सृष्टी केर अबाज दिनानाथजी देलनि। अबाज सुनि आँगनसँ हुनक १२ बरखक चंचल पोती 'सृष्टीदौरते आएल।
दिनानाथजी   सृष्टीसँ बाबा दिस इसरा कए, "बाबाकेँ  गोर लगियौन्ह।"
सृष्टी चट्टे झुकि, बाबाकेँ गोर लागि आशीर्वाद लेलनि। दिनानाथजी, बाबासँ, " हिनक बेटी भेलखीन।"
बाबा, सभ गाममे रहथि तहन ने, हमर नजरिमे तँ एखनो ओहे १८-२० बर्ख पहिने देखल नेनाक छवि बसल अछि। केखन समयक संग जबान भेल, ब्याह भेलै, बेटी सेहो एतेकटा भए गेलै। मुदा हमर सबहक आँखिक छवि……"

कहैत बाबा मौन भ’ गेला।  
*****
जगदानन्द झा 'मनु'

गाछो सभ गाम जाइ छै

लगभग ८०-८५ किमीकेँ  गतिसँ चलैत ट्रेनकेँ बॉगीमे बैसल एकटा पूर्ण परिवार।   ओहिमे सँ एकटा तीन बरखक नेना जेकी शाइद पहिल बेर अपन ज्ञानमे ट्रेनक  यात्रा कए रहल छल   खिड़कीसँ बाहर देखते देरी खुशीसँ चहैक बाजल, "पापा यौ पापा, देखियौ गाछो सभ गाम जाइ छै "    

Tuesday, April 8, 2014

कथोप-कथन

जगदीश प्रसाद मण्‍डल जीक चारि‍ गोट लघु कथाक कथोप-कथन

भोँटक गहमी
मास्‍सैव, ओना पछि‍ला भोँट नीक जकाँ मनो ने अछि‍, मुदा ऐबेर तँ बहुत गहमा-गहमी देखै छि‍ऐ, से की?”
मास्‍सैव, अपन देश जनतंत्र छि‍ऐ, तखनि‍ कि‍ए प्रधानमंत्री के बनत से पहि‍ने लोक गर्द करै लगैए?”
बौआ, अखनि‍ सवाल अबैक समए अछि‍, तँए तोहर सवाल कागतपर लि‍खि‍ कऽ रखि‍ लेलि‍अ। पछाति‍ बुझा देबह।
मास्‍सैव, लाउडस्‍पीकरपर प्रति‍बंध लगि‍ गेल अछि‍, मुदा गाड़ीक-गाड़ी बाजा बाजि‍ रहल अछि‍ से एना कि‍ए अछि‍?”
कि‍ए अछि‍ कि‍ए नै रहत, ई वि‍चारणीय प्रश्न छी। हमर संसद तँ यएह भेल, तोहीं सभ ने काल्हि‍ पटना-दि‍ल्‍ली संसदोमे बैसबहक, कानूनो बनेबहक। आ कानून बना लागुओ करबहक।
आइ भरि‍ प्रश्न रखैक छह, काल्हि‍ सबहक बीच वाद-वि‍वाद करेबह, जँ समए बँचत तँ काल्हि‍ये नै तँ परसू, छुटल-बढ़ल सभ सवालक रस्‍ता बुझा देबह। अखनि‍ एतबे बूझि‍ लैह जे साम्राज्‍यवादी जालमे फँसल जा रहल छी।
भँसैत नाह
यात्री भाय, समधान भऽ जाउ, भऽ सकैए बीचमे कहीं भकमोड़ ने लऽ लि‍अए। अपन-अपन भार अपना-अपना ऊपर रहल। हमर केकरो ने।
जखनि‍ नाहमे सवार भेलौं तखनि‍ ओइ पार गेने बि‍ना नै छोड़ब।
कि‍यो करए आपले माएले ने बापले।
पान पराग
जगरनाथ, पान-पराग सठि‍ गेल अछि‍, दोकानसँ नेने आबह।
अखनि‍ दोकान खुजल हएत कि‍ नै?”
चाहवाली तँ अहूसँ पहि‍ने उठि‍ कऽ दोकान खोलि‍ दइ छै।
दोकानमे पराग कीनि‍, सैति‍ कऽ जीबीमे रखि‍ लीहऽ आ घुमती काल मि‍स्‍त्री सभकेँ देखने अबि‍हऽ जे उठल कि‍ नै।
सभटा झूठ-फूस बजनाहार सभ छी।
भाय, काज तँ सभ करबे करैए कि‍यो मूडसँ करैए कि‍यो भाँज पुड़बैए।
हौ, केकरो सीमा-नांगरि‍ नै छै। ने डाक्‍टरक कहने हएत आ ने नै हएत, होइ छै अपना कि‍रतबे। जँ ओकरा केने हाइतै तँ अपने कि‍ए सि‍गरेट पीब कऽ छाति‍ए जरा लइए?”
बौआ, तूँ नोकर छहक, जा कऽ डाक्‍टर साहैबकेँ कहि‍हनु जे छहटा पान-पराग खर्च अछि‍, से अपन रोजमे सँ लगैए।
मि‍स्‍त्री सभ उठल कि‍ नै?”
बाबा, मि‍स्‍त्री सभ उपराग दइए?”
अहाँ सबहक चाह सेरा कऽ पानि‍ भऽ गेल आ अहाँ सभ ओछाइनो ने छोड़लौं हेन?”
ऐ कोढ़ि‍याकेँ देखै छि‍ऐ, एहेन खेबैया अछि‍ तँ राति‍एमे ओरि‍या कऽ कि‍ए ने रखि‍ लइए?”
कथी‍ रखि‍ लइत?”
अहीले ओछाइन नै छोड़ैए।
डाक्‍टर साहैब, भरि‍ दि‍नमे छहटा पुरि‍या खाइ छी।
केते दि‍नसँ खाइ छह?”
से कि‍ कोनो दि‍न-महि‍नाक लि‍खा-पढ़ी करै छी, भरि‍ दि‍नक कमाइसँ भरि‍ दि‍न जीब लेलौं, तँ ऐसँ बेसीक आशा अनेरे कि‍ए करब। पहि‍ने शि‍खर खाइ छेलौं, रेडि‍यो-अखबार थोड़े पढ़ै छी जे आन ठीनक बात बुझबै, मुदा जइ दि‍न गामेमे एक गोरे शि‍‍खर खाइत-खाइत मरि‍ गेल तइ दि‍नसँ हमहूँ छोड़ि‍ देलि‍ऐ।
देखि‍यौ, जहि‍ना तमाकुलक रंग-रंगक वस्‍तु बना ओकर शक्‍ति‍केँ कम-बेसी कऽ लोककेँ पोलहा-पोलहा खेबाक चहटि‍ लगबैए तहि‍ना तँ चाहो अछि‍ए, तहूमे जँ कौफी फेँटि‍ देलि‍ऐ तँ आरो बेसी रंग चढ़ा दइ छै। तेतबे कि‍ए, एकटा संगी छथि‍ ओ चाहेमे अफीम फेँटि‍ दइ छथि‍। खैर छोड़ू ऐ बातकेँ?”
डाक्‍टर साहैब, अखने कनी पहि‍ने तमाकुलक खि‍धांस रेडि‍योमे सुनलौं...?”
अहाँ तँ रेडि‍योक समाचार कहै छी, सत् बजैए कि‍ फूसि‍ तइ पाछू अनेरे कि‍ए बौआएब। डाक्‍टर बाबा पढ़बै काल तीन दि‍न कहलथि‍ हेन।
बाबा, अहाँक पएर छूबि‍ कहै छी जे आइ दि‍नसँ पान-पराग नै खाएब।
बौआ जगरनाथ, जखने जागी तखने परात। अखनि‍ धरि‍ जे तोहर नि‍श्छल निर्मल जि‍नगी रहलह, ओहने हमरो भेटए, तँए तोड़े सप्‍पत खा, आइसँ पान-पराग छोड़ि‍ देब।
बाबा, अहाँ जे एते कमेलि‍ऐ से अहीले तीनमहला छोड़ि‍ एकमहलमे बुढ़ाड़ी बि‍‍ताएब?”
तीनि‍येँटा कोठरीक मकानमे रहब नीक लागत?”
से ते मनमे हेबे करत, मुदा ओही मनकेँ रबाड़ि‍ पकड़ि‍ अपन जि‍नगीक संग रगड़बै। तहूमे दुइए परानी भेलौं आ तेसर जगरनाथ भेल। अनेरे कम्‍पाउण्‍डर-नर्स इत्‍यादि‍ रखैक कोन जरूरत अछि‍। जे रोगी औत ओकरा देखि‍-सुनि‍ लेबै। तइले बेसी घरक खगते कोन अछि‍। चारूकात छहर देबाल जोड़ि‍ घेरि‍ देबै, अपना रहैक, खाइ-पीबैक आ नहाइ-धोइक घर सहि‍टमे बनल रहत तइसँ कि‍ए आसकति‍ हएत। आसकति‍ तँ ओइठाम होइ छै जैठाम नि‍च्‍चाँ-ऊपर सीढ़ी टपए पड़ै छै।
जँ कहि‍यो बेटा-पुतोहु औता, तखनि‍ ओ सभ केतए रहता?”
ऊपरमे तँ खालीए रहत कि‍ने, अबैए काल वि‍चारि‍ लेता जे केते समए रहैक अछि‍ तइ हि‍साबसँ अपन ओरि‍यान केने औता।
मन-तन खराप हएत, तखनि‍ कि‍ करबै?”
अपनो ने डाक्‍टरो छी। आन रोगीक बात नहि‍योँ बुझबै कि‍एक तँ बहुत बात बहुत रोगी बाजि‍तो ने अछि‍, मुदा अपन देहक पीड़ाक अनुभव तँ अपने हएत। तइ हि‍साबसँ हि‍फाजत केने तँ काज चलि‍ सकैए। तखनि‍ तँ ई देहे काँच-माटि‍क बनल अछि‍, एकर केते बि‍सवास।
बाबा, अपने काजकेँ पछुअबै छि‍ऐ जेतेकाल गप-सप्‍प करबै तेते देरी हएत।
सि‍रमा
बाबा, पुरनाकेँ बदलि‍ दि‍यौ, सभ कि‍छु नवका अनलौं अछि‍।
बाउ मुरारि‍, अपना जनैत तँ नीके जानि‍ अनने छह, तँए बदलबे करब। मुदा...?”
बौआ, जे लूँगी फटि‍ जाइए ओकर सि‍रमो खोल बना लइ छी आ रूमालो बना लइ छी, तँए पाँच तह अछि‍। सालमे एकबेर जुड़शीतल दि‍न खीचि‍ कऽ खोलो सुखा लइ छी आ पेटमे जे देने छी तेकरो रौद लगा लइ छी।
बौआ, जइ दि‍न ई चद्दरि‍ कीनलौं, ओही दि‍न एकटा केसमे सजा भऽ गेल, दुनूक (अपनो आ चद्दरि‍ओक) बीच पहि‍ल भेँट जहलेमे भेल। अखनो मन अछि‍ जे नि‍रदोस चद्दरि‍ संगे जहल कटलक, केना बि‍सरि‍ जेबै?”
बाबा, प्रेम कहलि‍ऐ?”
हँ-हँ, जे सालमे गाहीक गाही कपड़ा कीनत ओ केकरासँ प्रेम करत, प्रेम तँ ओ भेल जे जि‍नगी भरि‍ प्रेमसँ संगे रहल। जीबैतमे जे रहल से तँ रहबे कएल, जे मुइला पछाति‍ओ सि‍रमेमे रखने छी।
बाबा, जखनि‍ चद्दरि‍क इति‍हास-बात कहि‍ए देलि‍ऐ तखनि‍ बँकि‍योहोक कहि‍ए दि‍यौ?”
बौआ, जहि‍एसँ धोती पहि‍रैमे नीक लागए लगल तहि‍एसँ फाटब शुरू भेल। मुदा बात दोसर दि‍स बहकि‍ जाएत।
ईहो कीनने छि‍ऐ?”
नै, ई धोती जहलेमे देने रहए।
बौआ, जि‍ला भरि‍क लोक कोसी नहरि‍ आ पनि‍बि‍जली डैमक संग मैथि‍ली भाषाक मांग करैत जहल गेेलौं। पनरह दि‍न रखलक। सोलहम दि‍न एक-एकटा धोती दऽ वि‍दा केलक, वएह धोती छी।
बाबा, जखनि‍ चद्दरि‍-धोतीक बात कहि‍ए देलि‍ऐ तखनि‍ लूँगीओ-गमछाक कहि‍ दि‍यौ।
बौआ, ईहो जहलेक छी। अपन कीनल लूँगीक सि‍रमाक खोल छी आ जहलक लूँगीकेँ पेटभर देने छि‍ऐ।
बाबा, नवका सि‍रमा नै लेबै?”
हँ हौ, कि‍ए ने लेब मुदा चारूक एक-एकटा कोन काटि‍ नवकाक पेटमे भरि‍ दहक, जाबे जीबैत रहब ताबे माथ टेकने रहब।



Sunday, April 6, 2014

रमण- दरिहरे- बिहारी नाम्ना तिथि चोर


रमण, बिहारी आ दरिहरेक कथा गोष्ठीक तिथि ८२ म सगर राति दीप जरयक तिथि ३१ म इ २०१४ घोषित भेलाक बाद भेल। मुदा ऐ तीनू लग मौलिकताक सर्वथा अभाव अछि। कोनो नव चीज ई लोकनि सोचि नै सकै छथि, हँ प्रतिक्रियावादी, धुरफंदी चीज करबामे ई लोकनि सभसँ आगाँ छथि। से रमण ७९ म कथा गोष्ठी ओरहामे विदेह साहित्य आन्दोलनक खिलाफ गोलैसी करबाक प्रयास केलन्हि, गोष्ठी प्रारम्भ हेबासँ पहिने सायास अही काज लेल पहुँचला, आ बजैतफिरला जे विदेह साहित्य आन्दोलन- तान्दोलन नै छिऐ, खाली गजेन्द्र ठाकुर आ जगदीश प्रसाद मण्डल अपन नाम कर' चाहै छथि, जे उत्तर भेटलन्हि तकर बाद ओ परदाक पाछाँ चलि गेला, जातिवादी बयान देलन्हि, हीरेन्द्र झाक उसकेलासँ अशोक मेहता सेहो ओइ गोष्ठीक बहिष्कार केलन्हि, इच्छा तँ रमणोक रहन्हि बहिष्कार करबाक मुदा हुनकर गाड़ी ड्राइवर समधियौर ल' क' चलि गेलन्हि, से कारण ओ मुन्नाजीकेँ कहलखिन्ह।
शंकरदेव झा बहुत पहिने सूचित केने रहथि जे जे रमण प्रबोध नारायण सिंहकेँ प्रबोध नारायण सिंह एण्ड कम्पनी कहै छला आ सएह आब नचिकेताक बडीगार्ड बनल छथि। ई अवसरवादिता रमणक चरित्रमे छन्हि से जखन ओ दरिहरे आ बिहारीक संग अपन साहित्य अकादेमीक मैथिली विभाग आ ओकरा द्वारा मान्यता प्राप्त फ़र्ज़ी संस्था द्वारा संपोषित कथा गोष्ठीक घोषणा केलन्हि तँ ओ सभ ३१ म इ २०१४ क तिथिये सोचि सकला, तकर दू टा कारण छलै हुनका सभमे मौलिकताक अभाव जे हिनकर सभक रचनामे सेहो दृष्टिगोचर होइत अछि, दोसर घृणित अवसरवादिता आ जातिवादी सोच। दरिहरे कहै छथि जे सगर राति हुनकर दलान अछि, ओइमे सर्वहाराक प्रवेश हुनका लेल कष्टकर छन्हि, बिहारीक कष्ट अही बात ल' क' छन्हि जे पहिने एक दू टा कम्पटीटर छल तँ अस्तित्व जोड़ तोड़सँ बनबैत छला, आब तँ मामले खत्म, रमण कतेक छल-प्रपंचसँ मोहन भारद्वाजकेँ सगर रातिसँ बाहर केलन्हि, मुदा आब नव समीक्षक सभ आबि गेला। से यात्री दिससँ अमर-सुमनकेँ गारि पढ़' बला आ अमर- सुमन दिससँ यात्रीकेँ गारि पढ़ैबला, ई दुनू ब्राहम्णवादी ग्रुप मैथिली साहित्यक विदेह साहित्य आन्दोलनक विरुद्ध मैथिली साहित्यमे जातिवादितापर ऐ घोर संकटक कालमे एक होथि, ई इच्छा राखैत "रमण- बिहारी- दरिहरे" कथा गोष्ठीक घोषणा केलन्हि, मुदा गजेन्द्र ठाकुर, विदेह आदि हुनका डरब' लगलन्हि से ओ एकटा चोरि केलन्हि, तिथिक चोरि, से किछु गोटे तँ कम हेतै जे सगर रातिमे ३१ मइ २०१४ केँ "रमण- दरिहरे- बिहारी" द्वारा घृणा कएल जाएबला गजेन्द्र ठाकुरक गाममे ओइ राति नै जा सकता। बड़ा आएल छथि आन्दोलनी, ब्राह्मणवादी घुरछीमे तेनाने फँसेबनि जे रमण- बिहारी- दरिहरेकेँ मोन रखता। हौ बाबू यएह छी असली विलेन, एकरा ख़त्म करू, विदेह आन्दोलन खतम आ मैथिली साहित्यपरसँ ब्राह्मणवादक पकड़ खतम हेबाक ख़तरा खतम, मैथिली जिबियेकेँ की फ़ायदा जँ अपना सभक वर्चस्व रहबे नै करए,, अखन यात्री ग्रुप, अमर- सुमन ग्रुप नै करू, सभ ऐ संकटमे मिलि जाउ, बादमे झगड़ा करब, नै तँ गजेन्द्र ठाकुर खोप सहित कबूतराय नम: क' देत।
मुदा की गजेन्द्र ठाकुरकेँ खतम केने मैथिली साहित्य आन्दोलन खतम भ' जाएत, की परिवर्तनक धारा जे भयंकर रूपेँ विदेह द्वारा छोड़ि देल गेल छै ओकर अस्तित्व गजेन्द्र ठाकुरसँ अलग नै भ' गेल छै, गजेन्द्र ठाकुरकेँ खतम केलासँ की ओकरा रोकलजा सकत? साहित्य अकादेमीसँ फ़ोन आएल जे ओकर मैथिली विभागमे जे गड़बड़ी भ' रहल छै ओइले साहित्य अकादेमी कोना ज़िम्मेवार अछि? किछु गोटेक फ़ोन आएल जे ओ सभ सगर रातिक अतिरिक्त रमण- दरिहरे- बिहारीक साहित्य अकादेमी संपोषित गोष्ठीमे सेहो जाए चाहै छथि कारण ओ पब्लिक फंडसँ आयोजित होइ छै, आ जँ सगर रातिक तिथि हम बदलि दी रमण- दरिहरे- बिहारी नाम्ना तिथि चोर की करता? आरती कुमारी संग कएल टॅार्चरक बाद रमण- बिहारी- दरिहरेक मोन जे बहसल से किए नै बूझि सकल ऐ परिवर्तनकेँ? मेडियोक्रिटी नै जानि कत' ल' जेतनि तीनूकेँ।

Monday, March 31, 2014

सगर राति दीप जरयक इतिहास- कथाक कथा

सगर राति दीप जरयक इतिहास जे रमण द्वारा परसल जा रहल अछि, ओइमे एकर प्रारम्भ केना भेलसँ ल' ' अखन धरिक इतिहास मे बहुत रास विसंगति अछि । एकर प्रारम्भ केना भेलसँ ल' ' अखन धरिक इतिहासमे बहुत गोटेक योगदान बढ़ा क', बहुत गोटेक घंटा क', बहुत गोटेक परिवर्तित क' ' प्रस्तुत काल गेल तँ बहुत गोटे निपत्ता क' जेल गेला। कहल गेल जे ई स्वायत्त संस्था अछि मुदा चेतना समितिक दिससँ रमण आ अजित आजाद सम्मिलित होइत रहला आ जत' कियो माला नै उठेलक ओत' ई लोकनि चेतना समिति दिससँ माला उठेलन्हि आ संयोजकमे चेतना समितिक नाम नै आन नाम इतिहास बनबै लेल गेल गेल। चेतना समिति ( गौरीनाथक सूचनाक अनुसार) जखन गौरीनाथ, अग्निपुष्प आ प्रदीप बिहारी पर लिखित प्रतिबन्ध लगेलक तकरार बाद बिहारी द्वारा लिखित माफी ऐ मैरेज हॅाल ( चेतना समिति) सँ माँगल गेल, फेर हुनका रचना लेल नै, वरन ऐ कृत्य लेल अकादमी पुरस्कार देल गेल आ ओ सेहो ऐ मैरेज हॅालक प्रतिनिधि भ' गेला। फेर ई तिकड़ी श्याम देवघरे संग मिलि क' सगर रातिमे की सभ केलक से रमणक जातिवादी इतिहासमे नै भेटत।
की छल ओइ सगर रातिक रजिस्टरमे जकरा रमण कहि रहल छथि जे विभारानी हेरा देलन्हि। की ई रजिस्टर हेरा गेल बा हेरा जाइ देल गेल। मुदा किछु गप जे नै रमणकेँ बुझा छन्हि ने विभा । रानीकेँ से अछि जे आरती कुमारी अपन मृत्युसँ २-३ दिन पहिने ओकर फोटो स्टेट उमेश मण्डलकेँ पठा देलखिन्ह। ओ चाहितथि तँ कोने झारे झाकेँ सेहो पठा सकैत रहथि, मुदा हुनका झारेझा सभपर विश्वास नै छलन्हि, किए नै छलन्हि? कहल गेल छे जे शोनित अपन निशान छोड़ते अछि। शीघ्र सगर रातिक असली इतिहास।
दरभंगा बला गोष्ठी , जे ३१ म इ २०१४ केँ दरिहरे- रमण- बिहारी द्वारा साहित्य अकादेमी आ ऒकरा द्वारा मान्यता प्राप्त फर्जी मैथिली संस्था सभक संग रमण-दरिहरे-बिहारी सन - सन जातिवादी ब्राहमणवादी-कायस्थवादी तथाकथित साहित्यकार सभ द्वारा प्रायोजित रहत, आ अो एे तरहक (दिल्लीक बाद) दोसर गोष्ठी रहत जकरा रमण-दरिहरे-बिहारी ८३म गोष्ठी सेहो कहता। अोतए "राडक़ सुख बलाय " आदि कथाक वाचन हएत। मेहथ बला गोष्ठी मे रमण-दरिहरे-बिहारी सन जातिवादी ब्राहमणवादी-कायस्थवादी प्रतिबन्धित छथि।
कहल जाइ छै जे सगर राति दीप जरय नव कथाकारक लेल ट्रेनिंग सदृश अछि। नव कथाकार कलमाएल जाइ छथि! मुदा सत्य की अछि? की एंकर प्रवृत्ति साहित्य अकादेमीसँ भिन्न अछि? की ऐपर कब्जा लेल साहित्ये अकादमी सन छल प्रपंच नै होइ छल!
आ ७९म सगर रातिक हीरन्द्र झा आदि द्वारा बहिष्कार आ रमणक ओतै जातिवादी उद्घोष उमेश पासवानक नै, मैथिलीक विरोध छल, कब्जाक राजनीतिक प्रारम्भ ७९म सगर रातिसँ पहिनहियो छल। ७४म सगर राति -हज़ारीबागमे प्रदीप बिहारी माला उठेबाक प्रस्ताव केलन्हि आ से छल मात्र दोसराक प्रस्ताव खसेबा लेल। अपन ग्रुपक क़ब्जा लेल मात्र ई प्रस्ताव छल। ओ अपन प्रस्ताव अपन ग्रुपक पक्षमे आपिस ल' लेलन्हि। ओ ई नाटक ७५म सगर रातिमे सेहो केलन्हि। तँ की ऐ ब्लैकमेलिंगक धंधामे हुनकर उपयोग कएल जा रहल छन्हि आकि ओ ऐ ब्लैकमेलिंगक धंधाक मुख्य कलाकार छथि?हुनकर रचनामे जान नै छन्हि मुदा घृणित राजनीतिमे जान छन्हि। आ साहित्य अकादेमी पुरस्कार एहने गुणपर देल जाइ छै, से चेतना समितिसँ माफी मांगि पएर पकड़ि ओ निर्लज्जतापूर्वक लेलन्हि। से ओ ऐ ब्लैकमेलिंग धंधाक मुख्य कलाकार छथि जकरा बुझल छै जे नीक रचना लिखबापर ध्यान देनाइ मूर्खता छै, ओइसँ प्राइज नै भेटै छै, साहित्य अकादेमी लेल जोड़-तोड़ चाही आ ओइमे ओ मास्टर छथि, मैथिली गेल तेलहण्डामे।
आ ऐ परिस्थिति मे नव कथाकारक ट्रेनिंग नै भेलै, जतेक लोक सगर रातिसँ जुड़ला ओइसँ बेसी हतोत्साहित क' मैथिली साहित्यसँ दूर क' देल गेला, नेट रिजल्ट माइनसमे रहल!
बहिष्कारक राजनीतिसँ सुपौल, देवघर आ नरहनक गोष्ठी प्रभावित रहल तँ कब्जाक राजनीतिक अन्तर्गत काठमाण्डूक सगर रातिमे कोनो स्थानीय साहित्यकारकेँ धीरेन्द्र प्रेम र्षि हवा नै लाग' देलखिन्ह जे एहन कोनो गोष्ठी हुअएबला अछि, मनोज मुक्ति ई सूचित करै छथि।
अशोक अविचल, श्याम दरिहरे, रमण आदि देवघरक आयोजक ओमप्रकाश झापर साहित्य अकादेमीक गोष्ठी केँ सगर रातिक मान्यता देबा लेल ब्लैकमेलिंगक क' ई शर्त रखलन्हि जे तखने ओ संभ ऐमे सम्मिलित हेता आ नै तँ बहिष्कार करता।मुदा आरती कुमारीक हत्याक बाद ई पहिल मौका छल बलैकमेलर सभकेँ हरदा बजेबाक ; आ समीक्षा-प्रतिसमीक्षासँ बढ़ैत ई गोष्ठी अभूतपूर्व सफलता प्राप्त केलक, बलैकमेलर सभक बहिष्कार ओकरा आर सबल बनेलकै। दरिहरे आयोजककेँ कहलन्हि जे साहित्य अकादेमीक गोष्ठी केँ मान्यता सगर रातिक रूपये भेटए, तइ लेल मैथिली लेखक संघ,पटनाक बैसकीमे रमणक कहलासँ ओ ऐलेल फ़ोन केलखिन्ह। अविचल सेहो आयोजककेँ सएह कहलखिन्ह।
देवघर गोष्ठी ट्रेनिंग स्कूल सिद्ध भेल, रमण, दरिहरे आ बिहारी अबितथि तँ सिखितथि जे केना रचनामे ओ क्वालिटी आनि सकै छथि, मुदा ओ सभ प्रैकटिकल छथि, बुझल छन्हि प्राइज़ टा लेल लिखल जाइ छै आ से जोड़-तोड़सँ भेटै छै, क्वालिटीसँ नै, अविचल मे प्रतिभा लेशो मात्र नै छन्हि, हुनका कोनो ट्रेनिंग किछु नै द' सकतन्हि, से ओ नै आबि अपन टाइम बचेलथि आ से नीके केलथि।
सगर राति दीप जरयमे कव्ालिटी आबि जाएत तँ बिहारी-दरिहरे-रमण सन मेडियोकरकेँ के पूछत, से ओ सभ राड़केँ सुख बलायक लेखकक संग दोसर साहित्य अकादेमी गोष्ठी करता जत' ब्राह्मण युवा सभकेँ राड़केँ सुख बलाय सन् नीक कथा केना लिखल जाए तकर ट्रेनिंग रमण-बिहारी-दरिहरे द्वारा देल जाएत। नीके अछि, मूर्ख सभक प्रवेश सगर रातिमे थम्हत। आ परोक्ष रूपेँ ऐ लेल मैथिली साहित्य रमण-बिहारी-दरिहरेक आभारी रहत।
दरिहरे-बिहारी-रमणक बहिष्कारक रणनीति द्वारा सगर रातिपर कब्जाक राजनीति आरती कुमारीक संग भागलपुरमे चलि सकल मुदा वएह राजनीति २ सालक बाद देवघरमे तेनाकेँ फ़ेल भेल जे ओ सभ पहिने सगर रातिसँ पलायन केलन्हि आ फेर निकालि देल गेला। ब्राहम्णवादी भाषाक रूपमे विश्वमे ख्यात ऐ साहित्यमे कोन प्रक्रिया चलि रहल अछि जे ई संभव केलक? सगर राति दीप जरयक ब्राहम्णवादी अनुष्ठानकेँ एकर स्वयंभू पुरोहित सभ द्वारा आरती कुमारीक बलि देल जा चुकल छल। भयक ऐ वातावरणमे ई परिवर्तन केना भेल जे रमण-बिहारी-दरिहरे नै बूझि सकला?
मैथिली भाषाक ब्राह्मणवादी चरित्रमे भाषाक संग ख़ूब खेल खेलाएल गेल छै। राड़क मतलब एत' छै (ब्राहम्णक नजरिमे) भुमिहार,राजपूत, कायस्थ सहित सभ आन जाति। अपन बच्चाकेँ यौ आ राड़क बुढ़बाकेँ हौ! कहबी मे सेहो बेइमानी, जेना- दस ब्राहम्ण दस पेट, दस राड़ एक पेट! मुदा हमर माँ कहै छथि जे ई कहबी मात्र ब्राहम्णमे छै, आन सभ कहै छथि- दस राड़ दस पेट, दस ब्राह्मण एक पेट। मुदा बिहारी सन मेडियोकर साहित्यकारकेँ ई सभ गप नै बुझल छन्हि- ओ बुझै छथि जे राड़केँ सुख बलाय तँ जगदीश प्रसाद मण्डलपर रमण-बिहारी-दरिहरे लिखबेने छथि। रमण आ दरिहरे तँ ठीक सोचै छथि मुदा बिहारी तँ कायस्थ छथि आ दरिहरे-रमणक परिभाषा अनुसार राड़केँ सुख बलाय जगदीश प्रसाद मण्डलक अतिरिक्त हुनके टा पर नै वरण समस्त मिथिलाक गएर ब्राहम्णकेँ देल गारि अछि।
विदेह घरे-घरे घुसि चुकल अछि, से ३१ मइ२०१४ केँ रमण-दरिहरे-बिहारीक "राड़केँ सुख बलाय"कथा गोष्ठीमे शामिल सभ ब्राहम्ण छद्म कथाकारक लिस्ट हमरा ०१ जून २०१४ क भोरमे चाही।
२. आब आउ सगर रातिकेँ खतम करबाक साहित्य अकादेमीक मैथिली शाखा आ ओकरा द्वारा मान्यताप्राप्त फ़र्ज़ी संस्था सभक पर।
३ रम ण साहित्य अकादेमीक मैथिली शाखासँ लाखक लाख असाइनमेण्ट क़ताक सालसँ ल'रहल छथि, से हुनका ई भार देल गेलन्हि जे सगर रातिपर विदेहक प्रभावकेँ ओ ओहिना ख़त्म करथु जेना आरती कुमारीकेँ ओ बिहारी-दरिहरे संग मिलि क' ख़त्म केने रहथि। मुदा हुनकर एस्टीमेट ऐबेर गड़बड़ा गेलन्हि, मैथिली लग आब पाठक छलै, शक्ति छलै, स्तर छलै, से मेडियोकर रमण-बिहारी-दरिहरे नै बुझि सकला। ख़ून रंग आनै छै, चेन्हासी छोड़ै छै ़़़़........ख़ून खूनीकेँ ताकि लै छै़़़.
मिथिलामे दुर्गापूजामे मोटामोटी चन्दा ओसूलि क' पूजा होइ छै। बस रोकि क' चन्दा ओसूली सरस्वती पूजा लेल आब शुरू भ' गेल छै, पहिने नै होइ छलै, कारण ई पर्व व्यक्तिगत निष्ठासँ सम्बन्धित छल। ओ निष्ठा यज्ञोपवीत करबा क' मूर्खतापूर्वक मोछैल आ क्लीन शेव ( संगे प ाग पहिरने!) विद्यापतिक कोनो तत्कालीन वेशभूषाक अध्ययनसँ रहित जातिवादी कलाकार द्वारा बनाओल फोटोपर माल्यार्पणक विद्यापति पर्वमे सेहो नै भेटत। ई विद्यापति पर्व सभ , जातिवादी रंगमंच , साहित्य अकादेमीक मैथिली शाखा, प्रज्ञा संस्थान, साझा प्रकाशन आ सगर राति दीप जरय मैथिलीमे कट्टरता बढ़ेलक आकि घटेलक?
२. विश्वकर्मा पूजा, दुर्गापूजा आदि ई दाबा नै करैए जे ओ सभ मैथिली लेल काज करै छथि। मुदा ई सभ समाजमे मिलि काज केना करी से सिखबैए। एकर विपरीत विद्यापतिकेँ यज्ञोपवीत करबाकेँ जे सांस्कृतिक संस्थापर कब्जाक राजनीति सिखाओल गेल से जातिवादी रंगमंचमे पैसल, कोलकाताक कु र्मी-क्षत्रिय समाज मैथिलीसँ अलग क' देल गेल। छिट्टाक छिट्टा पोथी आ सम्मान मैथिल ब्राहम्ण आ कर्ण कायस्थ लेल रिज़र्व भ' गेल। दोसर जँ हिम्मत केलक तँ बुढ़ा सभ लफुआ युवाकेँ साहित्यकार बना क' हुलकाब' लगला। "राड़कँ सुख बलाय"क लेखक केँ श्याम दरिहरे, प्रदीप बिहारी आ रमानन्द झा रमण द्वारा हुलकाएब ऐ प्रक्रियाक टटका उदाहरण अछि। मुदा ई प्रक्रिया जे ५० सालसँ मैथिलीमे ब्राह्मणवाद आ कायस्थवादक संजीवनी बूटी छल कोना धराशायी भ' गेल। मैथिली साहित्यमे एहन की भ' रहल अछि, कोन ऐतिहासिक क्रिया- प्रतिक्रिया चलि रहल अछि जे ई संभव केलक, आ जे रमण-बिहारी- दरिहरे आ हुनकर सभक आका साहित्य अकादेमीक मैथिली विभाग आ जातिवादी रंगमंच नै बूझि सकल?
३. सगर राति दीप जरय द्वारा ब्राहम्ण युवामे जे कट्टरता ढुकाओल जा रहल छल से जखन तोड़ल गेल तँ बिहारी- रमण- दरिहरे आ आका सभ बूझि नै सकल जे की भ' रहल अछि आ अन्ततः ओ सभ अपन पेशेन्स खतम क' लेलन्हि। मुदा ऐबेर तँ दुनियेँ उनटल छल।
रहुआ संग्रामक कथा गोष्ठीमे रमणजी सहित सभ निर्णय लेलन्हि जे राति भरि कियो नै सुतता, मुदा भोजनसँ पहिने जखन सभ नामी(!!) कथाकारक पाठ क' सुति रहला तँ भोरहरबामे जे युवा सभ नामी कथाकार लोकनिक कथा सुनने रहथि, तिनकर नम्बर एलन्हि। आशीष अनचिन्हार जखन कथा पढ़ैले एला तँ संचालक ओंघा रहल छला आ मात्र अध्यक्ष शिवशंकर श्रीनिवास जागल रहथि, नै सुतबाक निर्णय लेनहार रमणजी फोंफ काटि रहल रहथि, जकर विरोधमे अध्यक्षक कहलाक उपरान्तो आशीष अनचिन्हार कथा पाठ करबा सँ मना क' देलन्हि; ओ पोस्ट माडर्न कथा बादमे "विदेह लघु कथा" मे छपल।
मुदा ब्राह्मणवादी सेंसर प्रक्रिया एतेक जब्बर छै जे ने आयोजक, ने रमण आ ने अध्यक्ष- संचालकक फर्जी सगर रातिक इतिहासमे एकर वर्णन भेटत। अरुचिकर गपकेँ झँापि देबाक ब्राह्मणवादी प्रवृत्ति एकर कारण अछि।
८१ टा सगर राति भेबो कएल आकि नै, लोक हमरासँ पुछै छथि। पहिने डाकसँ रचना आबै आ से नामी (!!) कथा सभ पढ़ल जाइ छलै, जे युवा सभ सदेह आबथि तिनकर नम्बर एबे नै करन्हि, एबो करन्हि तँ सुतलाहा बेरमे, मुन्नाजी जखन एकर विरोध केलन्हि तँ वएह कहल गेल, गप झाँपू, रजिस्टरमे ओइ नै एनिहार सभक सेहो उपस्थिति दर्ज भेल तेँ। बहुत कथा गोष्ठीमे दसो टा कथाकार नै एला, मुदा उपस्तिथि रजिस्टरमे बहुत रास उपस्थित भेटता, किछु एबे नै केला, किछु डाकसँ एला(!!) आ किछु हाजरी बना क' निपत्ता भ' गेला सेहो। जेना युद्धमे ३००० सँ कम मुइने ओकरा युद्ध नै कहल जाइए, तहिना दस टा सँ कम उपस्थितिकेँ सगर राति केना कहल जा सकत? ८१ क संख्या बड्ड कम भ' जाएत, ८१ बड्ड बेशी होइ छै, एतेमे तँ शान्त क्रान्ति भ' जइतए, से किए नै भेल तकर कारण ऊपर देल अछि।
ऐ समानान्तर आन्दोलनमे हमरा सहयोग चाही बा विरोध, धनाकर ठाकुर आ गंगेश गुंजनक "आइडियोजिकल न्यूट्रेलिटी"क मतलब सेहो एकेटा छै, आ से छै समानान्तर धाराक विरोध।
आ इतिहास हमरो मूल्याँकन करत आ हुनको ( विरोधी आ न्यूट्रल फिफ्थ कालमनिस्टक) ।
बहुत लोक ऐ तरहक कमेण्ट पछिला ६ सालसँ द' रहल छथि जे आब विदेह बदलि गेलै, ओकरा सभ सन भ' गेलै।विदेहक उद्देश्य ने बदलल छै आ ने बदलतै। कोन व्याख्या ककर तुष्टीकरण छै से स्पष्ट बिन केने ऐ तरहक कमेण्ट कएल जाएत अछि। हुनकर आशा जँ ई रहैए जे मैथिली साहित्य केँ युवाक उत्साह विदेहक माध्यमसँ नव दिशा प्राप्त करत आ से आब लागि रहल अछि जे से आब व्यक्तिगत कुण्ठाक मंचक रूपमे दुरुपयोगी भ' गेल अछि तँ ऐ सम्बन्ध में हमर यएह कहब अछि जे सत्यक कियो उपयोग क' सकैए आ कियो दुरुपयोग , जे हुनका दुरुपयोग आ व्यक्तिगत कुण्ठाक तुष्टीकरण आब लागि रहल छन्हि से बहुत गोटेकेँ ६ साल पहिनहिये सँ लागि रहल छन्हि, आ तकर व्याख्या हमरा लग यएह अछि जे ओ सभ मात्र विदेहसँ सिम्बोलिक विरोधक आशा करैत रहथि, असली परिवर्तन नै चाहनहारकेँ यैह असली ब्राह्मणवाद बुझेतन्हि, कारण बदलल पात्र सँ ब्राहम्णवादी मानसिकता उद्वेलित भ' गेल छै, ओ गेल तँ हम अबितौं मुदा ई सभ के आबि गेल। अहाँकेँ बुझबाक चाही जे मैथिली आगाँ एलै, जकरा जतेक प्रतिभा छलै ओ विदेहक माध्यमसँ ततेक सिखलकै आ ततेक आगां बढ़लै आ बढ़तै। किछु लोक जँ स्वार्थक लेल विदेहसँ जुड़ला मुदा आनुवंशिक जाति श्रेष्ठता हुनकासँ विदेहक निश्छल प्रयासोक बावजूद नै गेलन्हि, आ जइ विदेहकेँ ओ साहित्य आन्दोलन बुझै छला ( हृदयसँ नै) आ विदेहकेँ इमोशनल ब्लैकमेल, धमकी , हमरा आ हमरा परिवारकेँ ईमेल- फोनसँ गारि, छोड़ि क' जेबाक धमकी ( छोड़ि क' जेबाक धमकी देनिहारमे संयोगसँ अखन धरि मात्र ब्राहमणे छथि जिनका लगै छन्हि जे सिमबोलिक प्रोटेस्ट धरि मात्र विदेह सीमित रहितए), जे आब अहँू वएह (!!), बुझलौं प्राइज़ लेल, फलनाकेँ दिआबए चाहै छिऐ, व्यक्तिगत राजनीति , विदेहक भला नै हएत, ई सभ ६ सालसँ सुनि- सुनि हमर कान पाकि गेल अछि। रामदेव झा आ अमर पहिनेँ कहैत रहथि, हम अपन कनियाँकेँ पुरस्कार दिआब' चाहै छिऐ, सभ हँसि देलकन्हि जे साहित्य अकादेमीक मैथिली विभाग निर्वस्त्र अछि दोसराकेँ की सम्मानित करत तँ आब कहि रहल छथि जे उमेश मण्डल , राजदेव मण्डल, बेचन ठाकुरकेँ हम पुरस्कार दिआब' चाहै छिऐ। मोहन भारद्वाज देवशंकर नवीनक सोझाँ कहै छथि जे गजेन्द्र ठाकुर पागले ने छै जेना लखन झा छलै। दरिहरे सेहो लाल बुझक्कर छथि, हुनका आब बुझबामे आबि गेलन्हि जे हमरा साहित्य अकादमी सँ झगड़ा अछि तेँ, व्यक्तिगत राजनीति तेँ। बिहारी मुन्नाजीकेँ फ़ोन करै छथि आ कहै छथि मात्र जगदीशे मण्डलकेँ किए आगाँ बढ़ाओल जा रहल अछि (!!) ब्राहम्णवादी मानसिकता ई छिऐ, जे जगदीश मण्डल मेरिटसँ नै , बढ़ेलासँ आगाँ बढंल छथि जेना मैथिली साहित्यमे पहिने होइ छलै। प्रदीप बिहारी मुन्नाजीकेँ कहै छथि जे विदेह किए जातिवादी रंगमंचक विरोध करैए, किए समानान्तर परम्परा भ' ' मूल परम्पराक गुणवत्ताक समीक्षा करैए, समानान्तर तँ मूलसँ मिलित्े नै छै तँ किए हमर सभक नाम लै छी , अलग रहू, यएह छिऐ असल ब्राहम्णवाद- कायस्थवाद। चर्चे नै कर, काने बात नै दे!! आ ईहो संयोगे अछि जे जइ २-४ टा लोककेँ दिक़्क़त छन्हि से ब्राहम्णवादी प्रवृत्तक छथि, अनका ई दिक़्क़त किए नै छन्हि। पछिला ६ सालसँ विदेह जहिना छल ओहने रहत, अगिला कमसँ कम ३० साल धरि मैथिली साहित्य आब अहिना चलत। विदेहमे जकरा जे मेरिट छै ओ ओतेक बढ़त, चाहे ओ कोनो जाति, धर्म, क्षेत्रक होथि। विदेह जिनका बदलल लागि रहल छन्हि ओ स्वयंकेँ देखथु जे ओ तँ नै बदलि गेल छथि?
आब फेर आउ सगर राति दीप जरय पर।
अलिखित संविधानक नामपर बहुत रास खेल भेलै। ई मुख्य रूपेँ कथावाचनक गोष्ठी छिऐ मुदा एत' आलोचनात्मक आलेख पढ़बाक सेहो अनुमति छै आ से जँ अहाँक नाम रमण अछि तखने टा, से जखन कबिलपुर गोष्ठीमे मुन्नाजी विहनि कथा पर आलेख पढ़बाक अनुमति मांगलन्हि तँ से अनुमति नै भेटलन्हि, आ एत' अलिखित संविधानक सोंगर लेल गेल, आ तकर दूटा कारण , एक तँ मुन्नाजीक नाम रमण नै छियन्हि, दोसर विहनि कथाक कनसेप्ट विदेह द्वारा आगाँ बढ़ाओल जा रहल अछि से तकर विरोध, किए नै ओ कनसेप्ट कतबो वैज्ञानिक होइ।
झंझारपुर गोष्ठी मे जे एला तिनकर कथाक पाठ नै भेलन्हि मुदा डाकसँ आएल कथाक पाठ भेल, आ जँ अहाँ अविनाश छी सुमन-अमरकेँ गारि लिखै छी यात्रीक नामपर , तँ अहूँ कथाकार, कवि सभ , नै रहितो , छी, देवघर गोष्ठीक संयोजकत्व सेहो बोनसमे अहाँकेँ भेटत। से घोंघरडीहा गोष्ठीमे जिनका सभकेँ कथा नै पढ़' देल गेलन्हि, ओ सभ युवा एकर विरोध केलन्हि, किछुकेँ कथा पढ़' देल गेलन्हि आ जिनका नै पढ़' देल गेलन्हि से अगिला कथा गोष्ठीसँ एनाइ बन्द क' देलन्हि।
जे सभ मैथिली फिल्म आ डोक्यूमेण्टरीक नामपर लोकसँ पाइ ठकलन्हि से रमण- दरिहरे- बिहारीक विदेहक विरोधमे संगी छथि, जे युवा प्राइज़ लेल मैथिलीयोमे लिखना्हि, जातिवादी सभसँ मिलि साहित्य अकादेमीक युवा पुरस्कार लेलन्हि ओ तँ स्वाभाविक रूँपे हुनकर संगी हेता।
विदेह उमेश मण्डल आ जगदीश प्रसाद मण्डलक कान्हपर बंदूक राखने अछि, यूज़ क' रहल अछि, आ जँ हुनकर सभक रचना नै छप' देल जाइत, "तिल बहब ने" छपबासँ पहिने , सकरबाबल जाइत, तखन सभ ठीक छल। ब्राहम्णवादी सभ जेकाँ विदेह कोनो काज कएलासँ पहिने "तिल बहब ने"क शर्त क़रार नै करबैए आ सएह कारण अछि , नव ब्राह्मणवादी ई नै बूझि सकला, धू, एहनो क़तौ भेलैए। बिनु जान- पहिचान, भेंट- घांटक मात्र मैथिलीक नामपर सभ एकत्रित भ' गेल से हुनका अजगुत लगलन्हि।
प्रदीप बिहारी मुन्नाजीकेँ कहै छथि आ ई विचार रामदेव झाक सेहो छन्हि जे जखन विदेह साहित्य अकादेमीक समानान्तर पुरस्कार शुरू कैए देलक तखन साहित्य अकादेमी लेल शोर किए? माने ओकरा बकसि देल जाए! अशोक अविचल शिवकुमार जीकेँ कहै छथि जे मायानाथ झा, आनन्द कुमार झा ( ऐमे गुणनाथ झा जोड़ि लिअ) आदि जिनका सभक चर्चा विदेह केलक सभकेँ साहित्य अकादेमी पुरस्कार भेटलै, तँ हुनका उत्तर भेटल छलन्हि, जँ हुनकर सभक नाममे झा नै मण्डल रहितन्हि तँ की ई संभव छल?
आ साहित्य अकादेमी कोनो मनुक्ख नै छिऐ जकरा संग भतबरी कएल जाएत आ ने ककरो पैतृक संपत्ति जकर उपयोग ब्राहम्ण कायस्थक तथाकथित साहित्यकारकेँ ख़ैरात बँटबा लेल आब कएल जा सकत।
आ हमरा विषयमे जखन सभकेँ बुझबामे आबि गेलन्हि जे नै रौ, ई अपना सभ सन नै अछि, विदेह अपना सभ सन नै छौ, तँ हुनका सभ केँ आर चिन्ता लागि गेलन्हि! रौ कहीं, ईं हो सभ हमरे सभ सन, कहीन, ई जे अपने प्राइज़ लेब' चाहैए बा दोसराकेँ दिआब' चाहैए....
ब्राह्मणवाद मैथिलीकेँ गीरि गेलै, आ सभकेँ बुझल छै जे दूटा सहोदरो एक रंग नै होइए, से पूरा जाति नीक बा अधला हेतै ई कनसेप्ट विदेहक नै छै, ओ तँ ब्राह्मणवादी कनसेप्ट छिऐ।
अतुलेश्वर झा छथि ओना तँ ब्राहम्णवाादक विरोधमे रहथि मुदा पाग आ विद्यापतिक हमर लेख क बाद अलग भ' गेला़, आ एहेन बहुत रास लोक छथि, प्रेम चन्द्र पंकज आ अभय दासकेँ कोनो ने कोनो बात ल' ' विदेहसँ घृणा भ' गेलन्हि, आ ई गप ओ सभ मुन्नाजीकेँ सूचित केलन्हि जे ओ लोकनि विदेह पढ़नाइ आब छोड़ि देलन्हि, प्राय: आब ओ सभ चोरा नुका क' विदेह पढ़ै छथि, कारण सभ गतिविधिक जानकारी हुनका सभकेँ रहै छन्हि।
आब सगर राति पर आउ, यात्री दिससँ सुमन- अमर केँ गारि देनहार आ अमर- सुमन दिससँ यात्रीकेँ गारि देनहार, मैथिली साहित्यमे ब्राहम्णवाद बचेबाक लेल विदेहक विरुद्ध दरिहरे- रमण- बिहारीक संग आबि गेल छथि अंतिम लड़ाइ लड़बा लेल।