Monday, November 21, 2016

कनमन

कनमन

साढ़े चारि‍ बजैत। हाइ स्‍कूलसँ अबि‍ते सुधीरक नजैर दरबज्‍जापर बैसल बाबा–श्‍याम सुन्‍दर–पर पड़लैन‍। बाबाक खसल मन देख दरबज्‍जा-अँगनाक बीच मोड़पर सुधीर तेकठी जकाँ ठाढ़ भेल। केमहर डेग बढ़ौत से फरि‍छेबे ने करइ। पहिने बाबाकेँ पुछिऐन जे किए मन खसल अछि‍, आकि‍ कि‍ताब रखि‍ कपड़ा बदैल आबी। रस्‍तेसँ भूखो-पि‍यास लगल अछि‍। नबे बजेक खेलहा छी...।
तेकठीक तीनू खुट्टाक बीच अपनाकेँ सुधीर पौलक जे दूटाक कनाइत तेकठी नाओं धरबैए‍ जखन कि‍ तेसरक नाओं गोड़ी भऽ जाइ छै, जेकरा ऊपर लाद लादि‍ लदाना दइ छइ। बाबाक बात बुझब सभसँ जरूरी अछि‍, मुदा बरदाएल हाथे कइए की सकबैन..?
कपड़ा बदलब ओते महत नै रखैए‍ तँए एना करी जे बाबाकेँ कहिऐन‍- हमहूँ आबि‍ गेलौं जइसँ जाबे ओ अपन बात बजता-बजता ताबे पोथी रखि आएब। कनी डेगेमे झाड़ आनए पड़त...।
सहए करैत बाजल-
बाबा, किए मन खसल अछि‍?”
कहि‍ पोथी रखए आँगन गेल। पोथी रखि श्‍याम सुन्‍दरक लग आबि‍ सुधीर बाजल-
बाबा, मन खसैक कारण की अछि‍?”
आस-नि‍आसक बीच श्‍याम सुन्‍दर ओझड़ाएल छला, तँए नजैर खसल छेलैन‍। पोताक प्रश्‍न भारी पबै छला। चालीस बर्खक संगी हेरा-फेरीमे जहल चलि‍ गेल छेलैन‍‍, तेकरे सोग रहैन। मुदा बाल-बोध लग बाजी वा नै बाजी? छि‍पाएब झूठ हएत नै छि‍पाएब सेहो तँ नीक नहि‍येँ हएत। नीकक चर्च हेबाक चाही, अधलाक तँ फलो अधले हएत...।
सोचैत-विचारैत श्‍याम सुन्‍दरक मनमे उठलैन- एहनो तँ भऽ सकैए जे छि‍पबैत-छि‍पबैत छि‍नारक छिनरपनीए छीप जाए! मुदा एहनो तँ भऽ सकैए जे एक-दोसराक अधला छि‍पबैत-छि‍पबैत छिपारेक समाज बनि‍ जाए! ..तत्-मत् करैत श्‍याम सुन्‍दर बजला-
बौआ, अखने सुनलौं जे रूपलाल जहल चलि‍ गेल। मि‍रचाइक झाँझ जकाँ वएह मनकेँ मलीन केने अछि‍।
श्‍याम सुन्‍दर जे कहि‍ अपनाकेँ हटबए चाहैथ‍ से लगले नइ हटलैन‍। कारण भेल जे जहलक नाओं सुनि‍ सुधीर दोहरा देलकैन‍-
किए रूपलाल बाबा जहल गेला?”
सुधीरक प्रश्‍न श्‍याम सुन्‍दरकेँ ज्‍वर आनि‍ देलकैन‍ मुदा ज्‍वार नै बनि‍ तुरछैत ज्‍वारि‍ तँ आबि‍ए गेल रहैन‍। बुझबैत कहलखिन-
एते पुरान रहि‍तो रूपलाल समैकेँ ठेकानबे ने केलक। पुरना चालि‍सँ आब काज चलैबला छै! बुझथुन जे केहेन दादासँ पल्‍ला पड़ल। m
शब्‍द संख्‍या- 323

आने जकाँ

आने जकाँ

हलसल-फूलसल पत्नी बजली-
आइ धरि‍ अहाँ कहि‍यो मोनसँ नै चाहलौं। सभ दि‍न बि‍गड़ले रहै छी!”
पत्नीक बात सुनि‍ क्षुब्‍ध भऽ गेलौं जे एहेन बात किए कहलैन‍? निच्‍चाँ-ऊपर देख‍ पुछलयैन-
अहाँ केते चाहै छी?”
कहलैन‍-
जहि‍ना सभकेँ देखै छि‍ऐ।
कहलयैन‍-  
आने जकाँ हमहूँ भऽ जाइ तखन ने?”m

शब्‍द संख्‍या- 46

उड़हैड़

उड़हैड़
एक तँ ओहि‍ना जुड़शीतलक भोर, चारि‍ए बजेसँ इनार चन्‍द्रकूप बनि‍ अकास-पताल एक केने, सि‍रसि‍राइत वसन्‍त सि‍र सजबै पाछू बेहाल, जे जेतइ से तेतइसँ पीह-पाह करैत, तैपर तीन दि‍नसँ एकटा नवका गप सेहो गाममे सेहो उपैक‍ गेल अछि। ओ ई जे कपरचनमा उड़हैड़‍ गेल! कपरचना उड़हैड़ गेल..!
ओना ऊपरका जहाज जकाँ स्‍त्रीगणक बीच गप हवाइ भेल मुदा पुरुखक बीच कोनो सुनि‍-गुनि‍ नहि। तँए कपरचनमाक पि‍ता–रघुनाथले धैनसन। माए कुड़बुड़ाइत रहइ, मुदा सासुक डरे मुँह नै खोलैत। ओना, परगामी भेने माइयो आ पत्नियोँक मन ओते घबाह नइ होइत। होइत तँ ओतए अछि जेतए सीमानक आड़ि‍ धारक बाढ़ि‍मे भँसिया जाइए। कपरचनमाक दादी–कुसुमा दादी–क मनमे मि‍सियो भरि‍ हलचल नहि। कोनो कि‍ बेटी जाति‍ छी जे अबलट लागत। बेटा धन छी जेतए रहत ओतए खुट्टा गाड़ि‍ कऽ रहत। कि‍यो बजैए तँ अपन मुँह दुइर करैए।
जुड़शीतल पाबैन‍, अपने हाथे कुसमा दादी इनारसँ पानि‍ भरि असीरवाद बँटबे करती। तहूमे तेहेन गप परि‍वारक उड़ल छैन‍‍ जे बाँटबो‍ जरूरीए छैन। ओना दादी अन्‍हरगरे उठली‍, मुदा पहरक ठेकान नै रहलैन‍। जखन गाममे पीह-पाह शुरू भेल तखनए फुरफुरा कऽ उठि‍ लोटा-डोल नेने इनार दि‍स बढ़ली। मनमे ईहो रहैन‍‍ जे इनार परहक असीरवाद अँगनाक अपेक्षा बेसी नीक होइ छइ। तँए सभसँ पहि‍ने इनारपर पहुँचब जरूरी बुझलैन‍। आब कि‍ कुशक जौर आकि घट थोड़े रहल, मुदा तैयो...।
इनारसँ डोल ऊपरो ने भेल छेलैन‍ कि‍ नवनगरवाली अबि‍ते देखलैन‍ जे दादी असगरे छैथ तँए अवसरक लाभ उठा ली, नइ तँ पचताइये कऽ की हएत...। उपरागी जकाँ नवनगरवाली पुछलखिन-
उढ़ड़ा एलैन‍ कि नहि?”
नवनगरवालीक बोल कुसमा दादीकेँ मि‍सियो भरि‍ नै कबकबौलकैन‍। मनमे नचैत रहैन‍‍ जे एके पीढ़ी ऊपरक लोकक ने संकोच करैए, हम तँ दू पीढ़ी छि‍ऐ। बाल-बोधक उकठपनो गपक जवाब उकठपने जकाँ दिऐ से केहेन हएत! नवनगरवालीक आँखि‍मे आँखि‍ चढ़बैत दादी बजली-
कनि‍याँ, अहाँ कहुना भेलौं तँ पोते-पोती भेलौं। कि‍छु छी कपरचना तँ बेटा धन छी। जँ केकरो लैयो कऽ चलि‍ गेल हेतै तँ सोचि‍ नेने हेतै जे ठाठसँ जि‍नगी केना बि‍ताएब। जेतए रहत जगरनथिया खन्‍ती गाड़ि देत।
भादवक बर्खा जकाँ कुसुमा दादीक मुँह बरिसैत रहैन‍। इनारक कि‍नछैड़मे कनबाहि‍ भेल दुलारपुरवाली सेहो दादीक सभ बात सुनि‍ नेने रहैथ‍। मन भि‍न-भि‍ना गेल रहैन‍। तैपर जुड़शीतलक उखमजक जे टटका-बसियाक भि‍रंत छि‍हे। टटका नीक आकि‍ बसिया? बसिया नीक आकि‍ तेबसिया? तेबसिया नीक आकि‍ अमवसिया? मुदा टटके नवनगरवालीक पक्ष लैत दुलारपुरवाली दादीक सोझ आबि बजली-
सभटा कएल हि‍नके छिऐन। दुनि‍याँमे नाओंक अकाल पड़ि‍ गेल छेलै जे कपरचनमा नाओं रखलखि‍न?”
सतैहिया बर्खाकेँ छुटैक आशामे थोड़े छोड़ल जा सकैए। बीचोमे जोगारक जरूरत ऐछे। जँ से नइ तँ बि‍ल-बाल होइत केमहर-केमहर बहि‍‍ जाएत से थोड़े बुझि‍ पेबइ। कुसमा दादी दुलारपुरवालीकेँ कहए लगलखि‍न-
तों सभ फुलक नाओंकेँ बेसी पसि‍न करै छहक, मुदा तोंही कहह जे जेते अपना गाममे फूल अछि‍ ओकर मूल्‍य कि‍ हेबाक चाही। मुदा देखै कि‍ छहक। पोताक नाओं कोनो अधला रखने छी जेहेन चालि‍-ढालि‍ देखलि‍ऐ तेहेन नाउओं रखि‍ देलि‍ऐ।
दादीक उतारा सुनि‍ नवनगरवाली मुँह चमकबैत बजली‍-
दादी, अबेर भेल जाइ छइ। एक चुरूक असीरवाद देती तँ दोथु नइ तँ अपन राखथु।
अगुआएल काजकेँ पछुआइत देख‍ दादी डोल नेनहि‍ नवनगरवालीकेँ कहलखि‍न-
मन तँ होइए जे सौंसे डोल उझैल‍ दि‍अ मुदा अखन काजक बेर अछि‍, जा तोहूँ घर-अँगना देखहक।m
शब्‍द संख्‍या- 504

मेकचो

मेकचो

पछुआ पकड़ैत मिथि‍लांचलक कि‍सानकेँ अपनो दोख ओतबे छैन‍‍ जेते सरकारक। कि‍एक तँ ओहो अपनाकेँ जनतंत्रक कि‍सान नइ बुझि‍ पेलैन‍।
पाँच बीघा जोतक कि‍सान चुल्हाइ। आठम दसकमे गहुमक खेतीक संग सरकारी खादक अनुदान आएल। बीघा भरि‍ गहुमक खेती चुल्हाइ करत। एक बोरा यूरि‍या आ एक बोरा ग्रोमर खादक पूजी लगबैक वि‍चार केलक। ओना समुचि‍त खादो आ पौष्‍टि‍क तत्वो खेतमे देब जुरब परहक फुरब भेल।
ब्‍लौकक माध्‍यमसँ खाद भेटै छइ। पाँच दि‍न बरदा चुल्हाइ भी.एल.डब्‍ल्‍यू.सँ फर्म भरौलक। तीन दि‍नक पछाइत‍‍ कर्मचारियो लि‍खि‍ देलखि‍न। दू दि‍नक पछाइत‍‍ बी.ओ. साहैबक लिखला पछाइत‍‍ फर्म ब्‍लौक-ऑफि‍स पहुँचत जे आठम दि‍न भेटतै।
फार्म जमा केला पछाइत‍‍ घरपर आबि‍ चुल्हाइ चपचपाइत‍ पत्नी लग बाजल-
ऐबेर अपन गहुमक खेती नीक हएत!”
पति‍क चपचपीमे चपचपा रूसनी चपि-चपि गैंचियाइत नजैर दैत बजली-
फगुआमे नवके पुड़ी खाएब।
तीस दि‍सम्‍बरकेँ चुल्हाइ गहुम बागु केलक। पच्‍चीस कि‍लो कट्ठा उपज भेल।  
टुटैत उपजासँ टुटल चुल्हाइक मन पत्नीकेँ कहलक-
ऐ बेरसँ नीक पौरुके भेल। चालीस कि‍लो कट्ठा भेल रहए।
रूसनी बजली-  
एना किए भेल?”
चुल्हाइ बाजल-
तेहेन चमरछोंछमे पड़ि‍ गेलौं जे मेकचो-पर-मेकचो लगैत गेल। जइसँ बागु करैमे डेढ़ मास पछुआ गेलौं! उपजा टुटि गेल!
पति‍क घाउपर मलहम लगबैत रूसनी बजली-
खेती जुआ छि‍ऐ। हारि‍-जीत चलि‍ते रहै छइ। तइले की हाथ-पएर मारि‍ बैस जाएब।
बि‍सवास भरल पत्नीक बात सुनि‍ संकल्‍पि‍त होइत चुल्हाइ बाजल-
आब एहेन फेरि‍मे नै पड़ब।m

शब्‍द संख्‍या- 216

झूटका विदाइ

झूटका वि‍दाइ

जहि‍ना हारल नटुआकेँ झूटका वि‍दाइ होइ छै तहि‍ना ने हमरो भेल! मनमे अबि‍ते प्रोफेसर रतनक चि‍न्‍तन धार ठमैक गेलैन‍।
पि‍ताक श्राद्ध-कर्म समपन्न भेलाक तेसरा दि‍न प्रोफेसर रतन दरबज्‍जाक कुर्सीपर ओंगैठ‍ कऽ बैस मने-मन बीतल काजक समीक्षा करै छला। जहि‍ना नख-सि‍खक वर्णन होइत तहि‍ना ने सि‍ख-नखक सेहो होइए। मुदा काजक समीक्षा तँ मशीन सदृश होइए, जे पार्ट पाछू लगौल जाइए आ खोलैकाल पहि‍ने खुलैए‍।
प्रोफेसर रतन छगुन्‍तामे पड़ल छैथ जे समए केतए-सँ-केतए ससैर गेल आ...। आब‍ की थारी-लोटा आ कपड़ा-लत्ताक घटबी ओइ तरहेँ अछि‍ जेना पहि‍ने छल? कहू, ई केहेन भेल जे एते रूपैआ लोटा पाछू गमा देलौं! जँ समाजक बात नै मानितौं तँ दोखी होइतो, मानलौं तँ की मानलौं! लोटाक चर्च हुनका सभकेँ नै करक चाहि‍ऐन‍। तहूमे तेना लाबा-फरही करए लगला जे इस्‍टिलि‍या केना देबै, लोहा छी अशुद्ध होइए। नियमत: फूल, पि‍तैर‍ वा ताम हेबाक चाही! चानी-सोना तँ राजा-रजबारक भेल। ..वि‍चार अनि‍वार्य भऽ गेल। फेर एहेन प्रश्‍न किए उठल जे घरही नै दऽ बच्‍चासँ बुढ़ धरि‍ जे पंच औता सभकेँ होइन। सियानोक पनि‍पीबा वएह हएत जे धि‍या-पुताक।‍ तखन तँ लोटासँ लोटकी धरि‍क ओरि‍यान करू। तहूमे तेहेन अनरनेवा गाछ जकाँ भरि‍गर गाछ ठाढ़ कऽ देलैन‍‍ जे हाइ स्‍कूलक शिक्षक–गंगाधर–लोटाक संग धोतियो बँटलैन‍। तैठाम एको अलंग नै करितैथ, से केहेन होइतैन।
बजारसँ घुमला पछाइत‍ जहि‍ना नीक वस्‍तु देखलापर‍ मनमे उमकी उठैत, आ अधला देखलापर डुबकी लि‍अ पड़ैत, सएह ने भेल...।
प्रोफेसर रतनक मन कोसी-कमलाक एकबट्ट भेल पानि‍ जकाँ घोर-मट्ठा भऽ गेलैन‍। चि‍लहोरि‍ जकाँ झपटैत पत्नीकेँ कहलखि‍न-
मन बि‍साइन-बि‍साइन भेल जाइए आ अहाकेँ एक कप चाहो ने जुड़ैए?”
पति‍क आदेश सुनि‍ सुजीता चाहक ओरि‍यान केलैन‍।
चाह दैत सुजीता, पजरामे बैस जट-जटीन जकाँ पुछलखि‍न-
की भेल जे एना मन वि‍धुआएल अछि‍?”
ओना चाहक चुस्‍कीसँ रतनक बि‍सबि‍सी थोड़े कमलैन‍ जरूर, मुदा नि‍ड़कटोवैल‍ भऽ कऽ छुटल नै छेलैन‍। ओही झोंकमे झोंकि‍ देलखि‍न-
हएत कथी झूटका वि‍दाइ भेल!”
पति‍क बात सुजीता नै बुझि‍ सकली। बुझि‍यो केना सकि‍तैथ‍। मुदा रोड़ाएल दालि‍क सुगन्‍ध जकाँ अनुमानए लगली। मनमे जे कुवाथ भेल छैन‍‍‍ से जाबे खोलता नइ, ताबे केना बुझब? जँ कोनो तेहेन बात रहि‍तैन‍ तँ एना साँप जकाँ गैंचि‍या-गैंचि‍या किए चलि‍तैथ‍! बजली-
कनी-काल अराम करू, हमरो हाथ काजेमे बाझल अछि, ओकरा सम्‍हारि‍ लइ छी।m
शब्‍द संख्‍या- 359

मुँहक खतियान

मुँहक खतियान

ऐबेर दुर्गापूजाक नव उत्‍साह अछि‍। उत्‍साहो उचि‍ते, हाले-सालमे मलेमासक वि‍दाइ भेल अछि‍‍। एक दि‍न माघ बितने तँ आशा फुरफुराइत पाँखि‍ झाड़ए लगैए‍, भलेँ पच्‍चीस दि‍नक टप-टप पाला खसैत शीतलहरी आगू किए ने हुअए। मुदा से नहि, कहि‍यो नावपर गाड़ी चढ़ैए तँ कहि‍यो गाड़ीपर नाव। तहूमे दुनूक बीच, एहेन रंग-रूपक मि‍लानी रहै छै जे दुनू दुनूकेँ पीठेपर उठबैए आ पेटेमे रखैए। से ऐबेर थोड़े हएत, तेते ने लोक रौदियाएल अछि‍ जे महारेपर सँ कुदि-कुदि‍ उमकत...।
औझुका दि‍न भगवतीक माटि‍ लेल जाएत। भोजक पाते देख‍ धि‍या-पुता चपचपाए लगैत जे खूब खेबैन। आखि‍र भोज होइते किए छइ। चारि‍ बजे भोरेसँ पीह-पाह शुरू भऽ गेल। ओना रघुनी भायकेँ बुझल रहैन‍‍ मुदा तैयो पीह-पाह नीक नै लगैत रहैन‍। कारण रहइ जे दि‍नक फल भोजन बुझि‍ क्रमि‍क काजक क्रि‍या बुझै छैथ। जाबे चौकक हवा-पानि पीबए जइतैथ, तइसँ पहिनहि चाहक चुल्हि‍ पजरल देखलैन‍।
अपन मनकमना पुरबैत तेतरा दस कप चाहक भोज केलक। भोजक सत्तैर‍‍मे भोजैत अपन बात बजि‍ते अछि, तेतरो बाजल-
भाय, ट्रेन्‍ड डरेबर भऽ गेलि‍यौ, भगवतीक दयासँ आब कोनो दुख-तकलीफ परि‍वारकेँ नै हएत।
दोकानक दोसर ब्रेंचपर पोखरिया, असामी आ रामेसर सेहो बैसल छल। तेतराक बात जेना रामेसरक छातीमे छेदि‍ केलकै तहि‍ना रामेसरकेँ झोंक चढ़ि गेलइ। बाजल-
बाप जे मरूआ लेलकै से तँ अखन तक सठाएले ने भेलइ। आ..!”
रामेसरक बात सुनि‍ते तेतरा लोढ़ियौलक। मुदा कएल की‍ जाए? दुनूकेँ थोम-थाम लगबैत रघुनी भाय कहलखि‍न-
दू घन्‍टा लोककेँ बातो बुझैमे लगतैन‍ तँए दू घन्‍टा दुनू गोरे अपन-अपन घरपर जाउ।
घर दिस रामेसर बढ़ैत बाजल-
बाढ़ि‍मे घर खसि‍ पड़ल, नइ तँ अखने बोही आनि‍ कऽ पंचक बीचमे फेक‍ दैति‍ऐ।
घरमुहाँ होइत तेतरा बाजल-
की बुझि पड़ै छै जे बबेबला सनकी अछि‍, झाड़ि‍ देबइ। जँ ओकर बाँकीए छै तँ मनुख जकाँ फुटमे कहैत।m

शब्‍द संख्‍या- 278

हूसि‍ गेल

हूसि‍ गेल

भोज खा बाबा अबि‍ते रहैथ‍ कि पोता–रमचेलबा–मन पड़लैन। तखने देखलैन‍ जे तीमन-तरकारीक मोटरी माथपर नेने दच्‍छिनसँ अबैए‍। रमचेलबाकेँ देखते बाबाक मन सहैम‍ गेलैन‍ जे सभ दि‍न पोताकेँ संग नेने जाइ छेलौं, आ...। लगले मनमे एलैन‍ जे जे पूत हरवाहि करए गेल देव-पि‍तर सभसँ गेल...। तैबीच हाथमे लोटा देख रमचेलबा लग आबि पुछि देलकैन-
केतए गेल छेलह बाबा हौ?”
बाबा अवाक भऽ गेला।मनमे उठलैन- आब तँ यएह सभ ने करत, तँए अनुकूल बना राखब जरूरी अछि। निधोख होइत बाबा बजला-
बौआ, तूँ हाटपर गेलह आ एमहर बिझो भऽ गेलै तँ की‍ करि‍तौं?”  
जहि‍ना नि‍धोख बाबा बजला तहि‍ना रमचेलबा पुछलकैन-
बनलह कि‍ने?”
बाबाकेँ मन पड़ि‍ गेलैन‍ पूर्वांचलक मणिपुरी भोज; जइमे जे वस्‍तु जेते नीक रहै छै ओ ओते पहि‍ने परोसि खुऔल जाइए। मुदा अपना ऐठाम तँ अन्नकेँ अन्न बुझनि‍हार आगूमे आएल पहि‍ल अन्नक पूजा करत...। बाबा बजला-
बौआ, नीक भेलौ जे तों नइ गेलेँ।
अपन बात सुनि‍ रमचेलबा पुछलकैन-
से की हौ?”
अनुकूल होइत रमचेलबाकेँ देख बाबा कहलखिन-
धुर! हूसा गेल।
अकचकाइत रमचेलबा पुछि देलकैन-
से की हौ?”
की कहबौ, भात-दालि‍ बड़ पवि‍त्र बनल छेलै, तैपर अल्‍लू-परोरक तरकारी तेहेन बनल छेलै जे देखि‍ए कऽ मन हलैस‍ गेल। खूब खेलौं। तेकर पछाइत‍‍ जे नीक-नीक वि‍न्‍यास सभ आबए लगलै, ओकरा दि‍स केना तकितौं!”
तब तँ खूब बनलह?”  
अपूछ भऽ गेल!”m


शब्‍द संख्‍या- 204

सरही सौबजा

सरही सौबजा


दि‍न भरि‍ सात गोरेक संग झंझारपुरि‍या वेपारी आम तोड़ि काँच-पाकल आ फुटल बेरा, टौकड़ी बना, ट्रकक प्रतिक्षामे टहलैत गामक चाहक दोकानपर आबि‍ अनेरे बजैत-
एहेन ठकान जि‍नगीमे नइ ठकाएल छेलौं, जेहेन आइ ठकेलौं!”
चाहे दोकानक छर्ड़ा बुझि‍ आनो-आन छर्ड़ा छोड़लक-
झंझरपुरि‍या तँ इलाकाकेँ ठकैए आ ओकरा ठकि‍ लेत हमर गौंआँ?”
वेपारियोकेँ मनमे कि‍छु रहै तँए पाछू हटैले तैयार नहि। बत-कटौवैल‍ एहेन चलि‍ गेल जे ने एकोटा ऐ गामक नीक अछि‍ आ ने झंझरपुरि‍या। बोलीक मारि‍ तँ धुड़-झाड़ होइत, मुदा आगू बढ़ैक साहस कि‍यो ने करए। एकटा गामक प्रति‍ष्‍ठा बुझि‍ तँ दोसर घोड़नक कटान बुझि।
ओना चौकक रोहानी ठीक छेलै कि‍एक तँ सूर्यास्‍तक समए छल। चौकक रोहानी देखते जटा भाय चाहे दोकानपर बैसला। समाजि‍क प्रश्‍न, तँए हस्‍तक्षेप कएल जा सकैए। जटा भाय पुछलखिन-
कथीक घोंघौज छी?”
झंझारपुरबला वेपारी कहलकैन-
अहीं गाममे लखनजी सँ पाँच हजारमे सौबजा आमक एकटा गाछ नेने छेलौं तइमे ठकि‍ लेलैन‍।
अपन चर्च सुनि‍ लखनजी सेहो मोबाइलि‍क दोकानपर सँ चाहक दोकानक आगूमे आबि‍ ठाढ़ भेला। वेपारीक प्रश्‍न उठि‍ते लखनजी पुछलखि‍न-
की ठकि‍ लेलौं, बाजू।
वेपारी कहलकैन-
कलमी बुझि‍ नेने छेलौं, सरही दऽ ठकि‍ लेलौं!”  
तैपर लखनजी पुछलखिन-
केतेमे नेने छेलौं आ आम केतेक भेल?”
से तँ नफगर अछि‍, पाँच हजारमे नेने छेलौं। खर्च-बर्च काटि‍ कहुना पाँच हजार बँचबे करत?”
जटा भाय पुछलखिन-
तखन जे एना बजै छी से उचि‍त भेल?”
वेपारी कहलकैन-
हमर बात दोसर अछि‍। सौबजा कलमी होइ छइ। हि‍नकर अँठियाहा छिऐन, माने सरही छिऐन। ओना साइजोमे ठीक छैन।
जटा भाय-
अहाँ केना बुझै छी जे मुँह-नाक एक रहि‍तो सरही छी?”
वेपारी कहलकैन-
चचाजी, अहूँ भासि‍ जाइ छी। कहुना भेलौं तँ वेपारी भेलौं कि‍ने। कुमारि‍-बियौहतीक भाँज जँ नै बुझबै तँ घटकैती कएल हएत?m
शब्‍द संख्‍या- 269

दुधबला

दूधबला

फगुआक समए। पीह-पाहसँ मौसमक रंग चढ़ि‍ रहल छल। दि‍नुका काज उसारि‍ नि‍त्‍यानन्‍द काका दरबज्‍जापर बैस सालक फगुआक नीक-बेजापर ऊपर-निच्चाँ वि‍चारि रहल छला। जाड़सँ गरमीक प्रवेश भऽ रहल अछि‍। ठाढ पानिकेँ इनहोराइ-ले ठंढ मारि‍ तँ सि‍रसि‍साइए पड़तै। जँ से नइ तँ इनहोराएत केना? मुदा तेहेन दोखाह दोरस हवा बहि‍‍ गेल जे सोझ बाट माने नीक रस्‍ता बाउल-गरदासँ अन्‍हरा कऽ तेहेन बहबाँरि‍ बनि‍ रहल अछि‍ जे भरि‍ मुँह बाजब कठि‍न भेल जा रहल अछि‍।
सूर्यास्‍त तँ भऽ गेल मुदा अन्‍हराएल नै छेलइ। मोटर साइकि‍लसँ उतैर‍ मनोहर नि‍त्‍यानन्‍द काकाकेँ प्रणाम करैत आगूक चौकीपर बैसल।
कि‍छु दि‍न पूर्व धरि‍ नि‍त्‍यानन्‍द काका मनोहरकेँ दूधबेच्‍चा बुझै छला, मुदा पनरह-बीस दि‍न पहि‍ने शंका जगलैन‍ से जगले रहि‍ गेलैन‍। जइसँ वि‍चार बदलए लगल छेलैन‍। मुदा कोनो वि‍चारकेँ बदलैसँ पहि‍ने ऊपर-निच्चाँ देख लेब जरूरी बुझि‍ पुछलखि‍न-
कारोबारक की हाल छह?”
नि‍त्‍यानन्‍द कक्काक उत्तर दइसँ पहि‍ने मनोहरक मनमे आएल जे जखन फगुआक सनेस अनने छिऐन तखन आगूमे रखैमे कोन लाज। अनेरे साँइक नाओं सभ जानए आ हए-हए करए!’ जुगोक तँ धर्म होइ छइ। के भँगखौका शराब नै पीबैए‍। ओ सभ तँ निशोकेँ पानि‍ उताइर‍ देने अछि‍। भाय जखन एकटा प्रेमी अछि‍ तखन तँ जि‍नगी भरि‍ प्रेम करू नइ तँ पुरुखक आँखि‍सँ गिरब ओते महत नै रखै छै जेते मौगीक आँखि‍सँ। ..मुदा अपनाकेँ सम्‍हारि‍ वि‍चारि लेब जरूरी बुझि‍ बाजल-
काका, आइक जुगमे दूध बेचने गुजर चलत, तखन तँ..?”
मनोहरक बात नि‍त्‍यानन्‍द काकाकेँ ठहकलैन‍। मुदा तेयौ मन नै मानलकैन‍ बजला-
केते गोरे गाममे दूधबेच्चा छह?”
गर पाबि‍ मनोहर बाजल-
काका, आब कि‍ कोनो गाइए-महींसिक दूध बिकाइए! आब तँ गाछसँ लऽ कऽ लोहा धरि‍क दूध बि‍काइए। केतेक नाओं कहब। जेम्‍हरे देखै छी, तेम्‍हरे सएह।
सएहक सह पाबि‍ नि‍त्‍यानन्‍द काका हूँहकारी भरलैन-
से सएह।m
शब्‍द संख्‍या- 275 

बुढ़िया दाादी, कथाकार श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल

बुढ़ि‍या दादी

नहि जानि‍ दादीकेँ एहेन क्रोध किए भऽ गेलैन‍। एक तँ औहुना बैशाख-जेठक सुखाएल जारैन‍ चरचराइत रहैए, खढ़क छाड़ल-छार पटपटाइत रहैए, तइ हि‍साबे दादियोक खटखटाएब अनुकूले भेल। दादी माने तीन पीढ़ी ऊपर नहि, गामक बनौआ दादी। नवो-नौतारि‍ बनौआ दादी होइते छैथ, उचि‍तो छइ।
आठ-दस बर्खक पोता अपन कुत्ताकेँ अनठि‍यासँ लड़ा देलक जइसँ कोनचरक सजमैनक गाछ टुटि‍ गेलैन‍, तेकरे तामस दादीकेँ पोतापर रहैन‍। जखन टुटलैन‍ तखन बाधमे रहैथ‍ तँए नै देखलखि‍न। तखन ततबे, कुत्तेक झगड़ा भरि‍।
बारह बजे बाधसँ अबि‍ते, जहि‍ना हजारो चेहराक बीच प्रेमीक नजैर प्रेमि‍कापर जा अँटैक जाइत, तहि‍ना दादीक नजैर सजमैनक गाछपर पहुँच‍‍ गेलैन‍। लटुआएल-पटुआएल पड़ल देखलखि‍न। नरसिंह तेज भेलैन‍, मुदा परि‍वारक सभ गबदी मारि‍ देलक। तँए अधडरेड़ेपर तामस अँटैक गेलैन‍। जँ अकासक पानि‍केँ धरती नै रोकए तँ पताल जाइमे देरी लगतै?
दोसर साँझ जखन बाधसँ घुमि‍ कऽ दादी एली तँ नीक जकाँ भाँज लगि‍ गेलैन‍ जे पोताक कि‍रदानीसँ गाछ नोकसान भेल। तामस लहरए लगलैन‍। छौड़ाकेँ सोर पाड़लखि‍न-
अगति‍या छेँ रौ, रौ अगति‍या?”
नाओं बदलल बुझि‍ गोवि‍न्‍दोकेँ अवसर भेटलै। अन्‍हारे गरे चौकी-दोगमे नुका रहल। अपने फुरने दादी भटभटाए लगली-
भरि‍ दि‍न छौड़ा एमहर-सँ-ओमहर ढहनाइत रहैए आ कुत्ता-वि‍लाइ तकने घुड़ैए!”  
मुदा लगले मन ठमैक गेलैन‍। भरि‍सक अँगनामे नै अछि‍, खाइ-बेर भेल जाइ छै, केतए छिछियाइ-ले गेल जे अखन धरि‍ अँगनामे नै अछि‍। पुतोहुकेँ पुछलखिन‍-
कनि‍याँ, बौआ कहाँ अछि‍।
बेटाकेँ अपन जान सुरक्षि‍त बुझि‍ पुतोहु कहलकैन-
बड़ी-काल सँ नै देखलि‍ऐ।
पोताकेँ तकैले बुढ़ि‍या दादी वि‍दा भेली।  
सुतै बेर गोवि‍न्‍दा अलि‍साएल आबि‍ दादीकेँ कहलक-
दादी बि‍छान बीछा दे।
गोवि‍न्‍दक बात सुनि‍ दादी पि‍घैल गेली। ओछाइन ओछा कऽ सुता देलखि‍न। सेन्‍धपर पकड़ल चोर जकाँ, तामस फेर करुआ गेलैन‍। मुदा नि‍नि‍याँ देवीक कोरामे गोविन्‍दाकेँ देख‍ क्रोध घोंटए लगली। मनमे उठलैन- अखन छोड़ि‍ दइ छि‍ऐ, भोरहरबामे पेशाब करैले उठेबे करत, बुझतै केहेन होइ छै सजमैनक गाछ तोड़नाइ। जाबे सभ करम नै कराएब ताबे चालि‍ नै छुटतै।
भोरहरबामे गोवि‍न्‍द दादीकेँ उठबैत बाजल-
दादी-दादी।
दादी गबदी मारैक वि‍चार केलैन‍। मुदा तीन बेरक पछाइत‍‍ तँ गरि‍येबे करत, तइसँ नीक जे तेसर हाकमे अपने बाजि‍ दिऐ। की हेतै, एकटा सजमनि‍येँक गाछ ने टुटल। फेर रोपि‍ लेब।m

शब्‍द संख्‍या- 332 

''बजन्‍ता-बुझन्‍ता'' बीीहैन कथा संग्रहक दोसर संस्‍करणसँ सँसाभार...

Tuesday, June 21, 2016

बेगरता

दोसर मँुहेँ करोटिया दय सुतल मकेँ अपना दिस घुमाबैत - "धूर जाउ ! कोना मुँह घूमेने सुतल छी, दस मिनट पहिने अप्पन बेगरता काल बिसरि गेलियै कोना जोँक जकाँ सटल छलौं ।"

एसगर - प्रेम बीहनि कथा

बासोपत्ती बस अड्डा । 'म'केँ दिल्ली जेए बला ट्रेन दरभंगासँ पकरैक छलै । बासोपत्तीसँ दरभंगाक धरिक यात्रा बससँ । बसक इन्तजारमे 'म' एकटा लगेज हाथमे नेने ठाड़ । ततबामे 'स' अफसीयाँत भागि कय आबि 'म' लग ठाड़ होति, टूकुर टूकुर ओकर मुँह तकैत । दुनू आँखिसँ नोर निकलि 'स'केँ गाल होति गरदनि धरि टघरि गेल ।
म, "तु एतेक कनै किएक छेँ?"
स म केर दुनू हाथ खीच, ओकर हाथपर अपन मुँह रखैत, "हम कहाँ कनि रहल छी ।"
ओकरा उदास आ कनैत देखि म दूटा बस छोरि देलकै ।
"हमरो ल' चलू, अहाँ बिनु हम एहिठाम नहि जी सकब । ओहीठाम हम सबकेँ कहबै जे हम अहाँक नोकरानी छी । अहाँक नेनाकेँ खेलाएब, घरमे पोछा लगाएब, बर्तन धोब ।"
ई कथन छल एकटा बिधबा माएक जेकर बेटा दिल्ली बाली संगे ब्याह कय दिल्लीए बसि गेल छल आ माए एसगर गाममे ।
जगदानन्द झा 'मनु'

Thursday, May 26, 2016

प्रतिभाशाली

"प्रतिभाशाली लोक पोस नै मानै छै" ई बात बहुत बेरसँ एकटा बूढ़ साहित्यकार युवा साहित्यकारक पक्षमे बाजि रहल छलाह. ओ फेर तर्क देलाह जे सुच्चा रचनाकर्मी स्वतंत्र होइत छै ओकरा केकरो गुलामी नै करबाक चाही. सभामे सभ हुनकर तर्कसँ हारि गेल छल.
बूढ़ साहित्यकार घर एला तँ किछु सुनसान लगलनि. बूढ़ीकेँ सोर पाड़लनि. बूढ़ीकेँ एबासँ पहिनेहे एकटा बेटा आबि कहलकनि "आब हम भिन्न होबए" चाहैत छी. बूढ़ साहित्यकार बिना किछु बजने अंगनासँ निकलि गेलथि.

Friday, May 6, 2016

प्रेम

गुदरी बाजारक भीड़ भाड़सँ निकलैत, एकटा दुकानक आँगा टीवीक आबाज सुनि डेग रूकि गेल । टीवीसँ अबैत मात्र ओकर अबाजे सुनाइ द रहल छल । ओकर देह नहि देखा रहल छल मुदा अबाजेसँ ओकरा चिन्हनाइ कतेक आसान छै । 
आइसँ तीस वर्ष पहिने, हमरे संगे संग नमी वर्ग धरि पढ़ै बाली, सुन्दर, चंचल मात्र मूठ्ठी भरि डाँड़ बाली ---- 
"कि प्रेम इहे छैक की मात्र देहक प्रजनन अंगपर एकाधिकार बना कय राखैमे सफल भेनाइ ।"
@जगदानन्द झा 'मनु'

मँुह झौँसा

“गै दैया ! एतेक आँखि किएक फूलल छौ ? लगैए रा त भरि पहुना सुतए नहि देलकौ।”
“छोर, मँुह झौँसा िकएक नहि सुतए देत, अपने तँ ओ बिछानपर परैत मातर कुम्भकरन जकाँ स ुति रहल आ हम भरि रा ति कोरो गनैत बितेलहुँ।”
जगदानन्द झा 'मनु' 

सोहागिन

हल्द्वानी, हम आ सा । क़ब्रिस्तान पार कय क हम दुनू पहाड़क उपर चढ़ैत, समतल जगह ताकि पार्ककेँ एकटा वेंचपर बैसि, देहक गर्मीकेँ कम करैक हेतु बर्फमलाइ (आइस्क्रीम) कीन खेनाइ शुरू केलौंहँ ।
दुनू गोटा अप्पन अप्पन आधा बर्फमलाइ खेने होएब कि, सा "जँ हम अहाँक सामने मरि गेलौं तँ हमर सारापर चबूतरा बना देब ।" 
मेघ धरि उँच उँच पहाड़, चारू कात प्राकृतिक सौंदर्य, मखमल सन घास, स्वर्गसन वातावरण, बर्फमलाइ केर आनन्दक बिच अचानक एहेन गप्प सुनि, बर्फमलाइ हमर मुँहसँ छूटि हाथमे ठिठैक गेल । कनिक काल सा केर मुँह पढ़ैक असफल प्रयास केलाक बाद; "अवस्य एकटा सुन्दर चबूतरा । जँ हम पहिने मरि गेलौं तँ एतेक व्यवस्था ज़रूर कय जाएब जे एकटा नीक चबू.... "
बिच्चेमे सा हमर मुँहकेँ अप्पन हाथसँ दाबैत, "नीक नहि साधारणे चबूतरा मुदा अहाँक हाथे आ ओहिपर लिखल हुए "सोहागिन सा ।"
@ जगदानन्द झा 'मनु'

अगिला जनम

“डाँड़ टूटल जाइए भरि रा ति अहाँ सूतए नहि देलहूँ । बड़ हरान करै छ ी, अगिला जनममे अहाँ हिजड़ा होएब जे कोनो आओर मौगीकेँ एना तंग नहि कए सकब।”
“ठ ीक छै ! अगिला जनम अगिला जनममे देखल जेतै, एहि जनमक आनन्द तँ लए लिए । आ अगिला जनममे ओहि हिजड़ाक ब्याह जँ अहिक संगे भए गेलहि तँ ।"
@जगदानन्द झा 'मनु'

Tuesday, December 22, 2015

व्यंग्य कथा

व्यंग्य कथा
एकटा मैथिली व्यंग्य श्रृंखला लिखि रहल छी। नाम छै "लाल कक्काक उकाठी"। आइ ओकर पहिल अध्याय प्रस्तुत अछि।
आइ लाल कक्का घूमैत घामैत पछबाय टोल दिस चलि गेलाह। ओतय बुधियार बाबा अपन मकान बनबाबैमे व्यस्त छलाह। पिलर पर मकान बनैत छलै। मुदा पिलर आ देबाल दुनू टेढ़ देखि क' लाल कक्का ठमकि गेलाह आ बुधियार बाबाकेँ कहलखिन-"यौ अहाँक मकान खसि पड़त। पिलर आ देबाल दुनू टेढ़ भेल अछि। एना किए बना रहल छी।" बुधियार बाबा जबाब देलखिन-"किछु नै हेतै। एक नम्बर ईंटा आ असली सीमटीक मदतिसँ मकान बना रहल छी।" लाल कक्का-"मुदा टेढ़ बाकुच देबाल आ पिलर रहत तँ कखनो खसि पड़त ई मकान। आ लोक की कहत जे भानुमतिक कुनबा जोड़ि लेने छी अहाँ।" बुधियार बाबा खिसिया क' बाजलाह-"अहाँ परम्परावादी लोक बूझना जाइत छी। हम ऐ अनुशासनकेँ नै मानैत छिए। जखने नीक ईंटा आ सीमटी भेंटल की ओकरा कहुना क' जोड़बा दैत छिए। भले ओ सूगरक खोभारी बनि जाय वा मालक बथान। रहतै तँ ओ मकाने ने।" लाल कक्का जबाब देलखिन-"हम परम्परावादी नै छी। बाबा झोपड़ीमे रहैत छलाह। बाबूजी खपड़ाक मकान बनेने छलाह। हम ढलाई बला मकान बनेलहुँ। मुदा देबाल सभक सोझे छलै। कनी अनुशासनक जरूरी तँ सब चीजमे छै ने यौ।" आब बुधियार बाबा बमकि उठलाह आ बाजलथि-"मास्टरसँ रिटायर हम भेलहुँ मुदा अहाँ हमरा मास्टरी झाड़ि रहल छी। जखन कि हम अपने मास्टर रहितो कहियो मास्टरी नै झाड़लौं। अहाँ हमर मकानक समीक्षा करबामे अक्षम छी। तैं एतयसँ जाउ।" आब लाल कक्काकेँ बुझबामे आबि गेल छलनि जे बुधियार बाबाक छात्र सब भोथ किए छलाह। कियाक तँ ओ कहियो मास्टरी झाड़बे नै कएने हेथिन। बिना बहस कएने लाल कक्का ओतयसँ घसकि गेलाह। मुदा ई चिन्तन करैत गेलाह जे बुधियार बाबा जँ अनुशासन नै मानैत छथिन तँ कहीं ओ काल्हि नंगटे गाममे घूम' नै लागथि। फेर सोचलनि जे मालो जाल तँ नंगटे घूमैत छै। कियो ओकर नोटिस कहाँ लैत छै। भ' सकैत छै जे आब मनुक्खो नंगटे घूम' लागत आ लोक नोटिस नै लेतै। ओना लाल कक्का टेढ़ बाकुच मकानक चिन्ता सेहो करैत गेलाह जे कहीं मकान खसि पड़लै तँ एक दू टा अकाल मृत्यु भइये जेतै। संगे इहो कल्पना करय लागलाह जे कहीं देखा देखी गाममे सभ टेढ़े बाकुच मकान नै बनाब' लागै। ई सब सोचैत गाम पर पहुँचलाह तँ बेटा कहलकनि-"बाबूजी एक नम्बर ईंटा आ सीमटी आनि लेने छी। कहियासँ शुरू करू मकानक जीर्णोद्धार।" लाल कक्का सिहरि गेलाह कियाक तँ हुनकर पुत्र बुधियारे बाबाक छात्र छलनि।

Tuesday, December 8, 2015

बिहनि कथा

बिहनि कथा
फोन
सावित्री भोरेसँ चिन्तित छलीह। दू दिनसँ बेटासँ कोनो गप नै भेल छलैन्हि। बेटा रमेश बंगलौरमे इंजीनियर छलाह।हुनका फुरसति कम होईत छलैन्हि। तैं ओ गाम नै आबैत छलाह। माता पिता सालमे एक दू बेर बंगलौर प्रवास क' कए हुनकासँ भेंट क' आबैत छलखिन्ह। मुदा फोन पर प्रतिदिन एक बेर गप भ' जाईत छलैन्हि। जहिया गप नै होइन्हि तहिया माताजी चिन्तित भ' जाईत छलखिन्ह। पछिला दू दिनसँ नै रमेशक फोन आएल छल आ नै ओ माएक फोन उठबै छलाह। तैं माए एते चिन्तित छलीह। ओ रमेशक बाबूकेँ कहलखिन्ह जे एक बेर फेरसँ फोन लगबियौ ने। ओ फेरसँ फोन लगा क' सावित्रीक हाथमे फोन द' देलखिन्ह। ऐ बेर रमेश फोन उठा लेलक। मुदा फोन उठबिते माएसँ कह' लागल जे दू दिनसँ आफिसक काजसँ अलगे परेशान छी आ अहाँक फोनसँ अलगे। माए कहलखिन्ह जे बउआ कमसँ कम एक बेर रोज अपन समाचार बता देल करू तँ हम निश्चिंत रहब। अहाँ परदेसमे रहै छी ने। पुत्र कहलखिन्ह जे नो न्यूज इज गुड न्यूज होइत छै से नै बूझै छिही। ई छुछका मोह देखेनाइ बन्न कर आ फोन राख। एखन ऊपरसँ टीम आएल छै आ बड्ड काज अछि। ई कहैत ओ फोन काटि देलक। माएक मुँह अप्रतिभ भ' गेलै। मुदा ओ अपन भावनाकेँ सम्हारैत फोन अपन पतिकेँ घूमबैत बाजलीह जे बउआ नीके छथि। हम हुनकर आवाज सुनि लेलियैन्हि। ई फोन बड्ड नीक होईत छै। जँ ई नै रहितै तँ बउआक कुशल क्षेम कोना बुझितौं। ई कहैत ओ भनसाघर दिस नोरियाएल आँखिये बढ़ि गेलीह।
ओम प्रकाश, बिहनि कथा

Friday, July 31, 2015

Umesh Mandal_सगर राति दीप जरय :: १९ सितम्‍बर २०१५._Nirmali


सगर राति दीप जरय :: १९ सितम्‍बर २०१५

मिथिलाक प्रसिद्ध साहित्‍य गोष्‍ठी- सगर राति दीप जरयक ८७म आयोजन निर्मलीमे होएत ई निर्णए तँ पछिले गोष्‍ठीमे भऽ गेल छल, जे समाचार अपने लोकनिकेँ प्राप्‍तो अछि। मुदा कहिया होएत आ निर्मलीमे केतए होएत ई साफ नइ भेल रहए, जे अझुका बैसकमे भऽ गेल।
आइ सॉंझमे निर्मलीक स्‍थानीय साहित्‍य प्रेमी सबहक बैसक भेल। जइमे श्री विनोद कुमार, श्री सत्‍य नारायण प्रसाद, श्री सुरेश महतो, श्री राजदेव मण्‍डल, श्री राम विलास साहु, श्री राम प्रवेश मण्‍डल, श्री राजाराम यादव, श्री मनोज शर्मा, श्री रामलखन भंडारी एवं श्री सुरेन्‍द्र प्रसाद यादव आदि महतपूर्ण व्‍यक्‍ति सभ रहथि।
सगर रातिक कथा गोष्‍ठीक इतिहासक संग सुन्नी-हकारक महतपर विचार-विमर्श चलल। ऐ विशेषताकेँ अक्षुण्ण राखल जाए ई बात श्री राजदेव मण्‍डलजी कहलनि। सभ कियो निर्णए लेलनि जे अगिला गोष्‍ठी ऐतिहासिक हुअए।  संगे दिन-तारीख आ स्‍थानक चयन सेहो भऽ गेल जे निम्‍न अछि।
अपने लोकनि (कथाकार, आलोचक) सादर अमंत्रित छी।
दिन- शनि
तारीख- १९ सितम्‍बर २०१५
स्थान : श्यामा रेसिडेन्सी कॉम विवाह हॉलएस.बी.आइ. केम्पस- निर्मली (सुपौल)

Sunday, July 5, 2015

देह

लगभग एक वर्ष बाद लघुकथा लिखबाक प्रयास केलहु ।ई लिखबाक हिस्सक छुटि गेल छल ।केहन बनलै से जरूर बताएब ।
लघुकथा - 186
देह

लालबाबूकेँ देख कऽ आबि रहल छी ।बुझू तऽ अंतिमे दर्शन छल ।आब बचबाक कोनो चान्स नै छै ।बड पैघ हैमरेज भेल छै ।एकटा आँखि बाहर भऽ गेल छै ।देखिते मोन हौरऽ लागल तेँ हाॅस्पिटलसँ चलि एलियै ।आबिते कनियाँ गहूँम पिसेबाक लेल कहि देलनि ।हमर मोन कोनादन कऽ रहल छल ।देहमे शक्ति नै बुझना जाइत छल ।हम दबले अबाजमे कहलियनि, " हे यै, आइ हमरासँ गहूँमक बोरा नै उठाएल हएत ।आइ छोड़ू ।साँझमे भाते बना लेब ।"
ई सुनिते कनियाँ तामसे चिकरऽ लागली ," बुझल अछि ने जे हमरा सोहारिये नीक लगैत छै ।एते टा चकत्ता सन देह पोसने छी तखनो बोरा नै उठत !"
बुझू तऽ ई सुनिते हमर रोआँ भुलकि गेल ।लालबाबूक कल्हुका बलिष्ठ देह आ अझुका मरनासन्न देह देख अपन कनियाँक अज्ञानतापर आश्चर्य भऽ रहल छल ।आखिर देह कते दिन एक समान रूपसँ संग दै छै ?

अमित मिश्र

Monday, September 1, 2014

गंगाजलक धोल (लक्ष्‍मी दास)

 गंगाजलक धोल

सहदेव काकाकेँ गामे कि‍छु गोरे सहदेवकाका कहै छन्‍हि‍ तँ कि‍छु गोरे फटहाकाका सेहो कहै छन्‍हि‍। कि‍छु गोरे सहदेव भैया कहै छन्‍हि‍ तँ कि‍छु गोरे फटहाभैया सेहो कहै छन्‍हि‍। मुदा हमर ने कि‍छु कहि‍यो बि‍गाड़लनि‍ आ ने नीके केलनि‍ तँए हम सहदेव कके कहै छि‍यनि‍।
अहाँ कहब जे लोकक एकहरी नाओं होइ छै हुनकर कि‍ए दोहरी छन्‍हि‍? दोहरीक कारण अछि‍ जे जे घटि‍या काज सहदेव काका अपने करै छथि‍ ओही काजले दोसरकेँ रेड़बो करै छथि‍न आ आँखि‍क पानि‍योँ उतारि‍ दइ छथि‍न। ओना केते गोरे एहनो छथि‍ जे अपनो सहदेव कक्काक केलहा काज लोके लग उगलि‍ दुसबो करै छन्‍हि‍ आ फटहो कहै छन्‍हि‍। मुदा जहि‍ना गर्दखोर अपन गरदा झाड़ि‍ फ्रेश भऽ जाइए तहि‍ना अपन गरदा झाड़ि‍ सहदेवो काका फ्रेश भऽ जाइ छथि‍।
आइ सहदेव काका केकर मुँह देखि‍ ओछाइन छोड़ने छला केकर नै, भोरे-भोर दुनू परानीमे झगड़ा बझि‍ गेलनि‍। खि‍सि‍या कऽ अलोधनी काकी आगूमे थूक फेकि‍ कहलकनि‍-
अहाँ पुरुख छी आकि‍ पुरुखक झड़ छी?”
पत्नीक समुचि‍त उत्तर दऽ सहदेव काका भरि‍ दि‍नका जतरा दुइर नै करए चाहै छला, मुदा झगड़ा बेर चुपो रहब हारि‍ मानब बूझि‍ बजला-
अहाँ कहने जँ हम पुरुखक झड़ छी तँ अहूँ तँ झड़क झरनि‍येँ ने भेलौं।
सहदेव कक्काक बात जेना अलोधनी काकीकेँ रब-रबा कऽ छूबि‍ लेलकनि‍। जहि‍ना कुकुर कटौजमे दाँतसँ पकड़ा-पकड़ी करैत घीचा-तीरी करए लगैए तहि‍ना काकी बजली-
गामक लोक जे फटका कहैए, से कोनो झूठ कहैए। अहाँकेँ ने कोनो काजक ठेकान अछि‍ आ ने कोनो बातक ठेकान अछि‍।
जेना लंकामे अग्‍नि‍वाणकेँ रोकल गेल, तहि‍ना सहदेव काका अलोधनी काकीक अगि‍याएल बोलकेँ रोकेत बजला-
कथी ले अनेरे अपने मुहेँ दोखी बनै छी, एतबो ने बुझै छि‍ऐ जे हमरा फटहा कहैए ओ कि‍ अहाँकेँ फटही नै कहत।
अपन हूसैत वाणकेँ देखि‍ काकी पाशा बदलि‍ बजली-
लोक दुसैए, तेकर लाज नै होइए?”
जेना ठोरक बरी पकै छै तहि‍ना काका पकबैत बजला-
जे दुसत से पहि‍ने अपन घरवालीकेँ पुइछ‍ लि‍अ जे अपने केते गंगाजलक धोल छी।

छुतहरि (दुर्गानन्‍द मण्‍डल)

83म सगर राति‍ दीप जरय'मे सखुआ-भपटि‍याहीमे पठि‍त लघु कथा- 

छुतहरि

सि‍मराक शि‍वनन्‍दन बाबूक दोसर बालक राजाबाबू, नाओंक अनुरूप राजकुमारे सन लगै छल। बेस पाँच हाथ नमहर, गोर-नार, भरल-पूरल देह, पहि‍रन-ओढ़न सेहो राजकुमारे सन। वि‍धाताक कृपासँ हुनक पत्नी देखए-सुनएमे सुन्‍दरि‍। मध्‍यम वर्गीए परि‍वारमे जनम। नैहर सेहो भरल- पूरल। राजाबाबूक बि‍आह नीक घरमे भेल। कोनो तरहक कमी नै। जेते जे बरि‍याती गेल रहथि‍, सभ कि‍यो खान-पानसँ प्रसन्न रहथि‍। बड़-बढ़ि‍याँ घर-परि‍वार छल। राजाबाबू बि‍आहक पछाति‍ओ अध्‍ययन जाड़ीए रखलनि‍। नीक-नहाँति‍ पढ़ैले पटनामे नाओं लि‍खा डेरा रखलनि‍। छुट्टी भेलापर गामो चलि‍ अबै छला। गाड़ी-सवारी भेने गाम आबए-जाएब कठीन नै छल। अहीक्रममे राजाबाबूकेँ पहि‍ल सन्‍तानक रूपमे एकटा बालक- अनील आ एकटा कन्‍या सुधाक जनम भेल। माए-बापक अनुरूप दुनू बच्‍चो तेतबए सुन्‍दर छल। क्रमश: दुनू बच्‍चाक टेल्हुक भेलापर ज्ञानोदय झंझारपुरमे नाओं लि‍खा देलखि‍न। बच्‍चा सभ ओतै रहि‍ पढ़ए-ि‍लखए लगल।
एमहर पटनामे रहैत राजाबाबूक संगति‍ खराप हुलगलनि‍। जइसँ ओ दोस्‍ती-यारीमे पीबए लगला। एक दि‍नक गप छी, गाम एलाक बाद अधरति‍यामे जोरसँ हल्‍ला भेल जे राजाबाबू पेटक दर्दे चि‍चि‍या रहल छथि‍। राति‍क मौसम देखि‍ गामक डाक्‍टर बजौल गेला। सुइया-दवाइ दऽ आगू बढ़ैक सलाह देलखि‍न। बि‍मारी उपकले रहनि‍। पत्नी वि‍शेष जतनसँ पथ-परहेजसँ राखि‍ दुइए मासमे दुखकेँ कन्‍ट्रोल कऽ लेलनि‍। एमहर राजाबाबूक मन ठीक होइते फेर जि‍द्द कऽ पटना चलि‍ गेला। परि‍कल जीह केतौ मानल जाए, पुन: वएह रामा-कठोला। गाम आबथि‍ आ भैया जे पाइ दन्‍हि‍ आकि‍ नै दन्‍हि‍ तँ पत्नीएक गहना-जेबर बन्हकी लगा-लगा पीबए लगला। कहबीओ छै चालि‍-प्रकृत-बेमए ई तीनू संगे जाए। छओ मास ने तँ बि‍तलै आकि‍ वएह पुरने दुख राजाबाबूकेँ उखड़लनि‍। मुदा ऐबेरक दर्द बड़ तीव्र छल। सुतली राति‍मे राजाबाबू अपना बि‍छौनपर छटपटए लगला। पेट पकड़ने जोड़-जोड़सँ चि‍चि‍यए लगला। नि‍सि‍भाग राति‍ रहने हो-हल्‍ला सुनि‍ लोक सभ जागल। लोकक लेल अँगनामे करमान लगि‍ गेल। दर्दक मारे राजाबाबू पलंगपर छटपटा रहल छला। एकबेर बड़ी जोड़सँ दर्दक बेग एलै आ राजाबाबू खूनक उन्‍टी करैत सदा-सदाक लेल शान्‍त भऽ गेला।
अँगनामे कन्ना-रोहट उठि‍ गेल। टोल भरि‍क लोक सभ जागि‍ गेल। मुदा राजाबाबू तँ सभसँ रि‍स्‍ता–नाता तोड़ि‍ परमधाम चलि‍ गेल छला। परात भेने बि‍ना बजौने सभ आदमी मि‍लि‍ बाँस काटि‍, तौला-कराही, सरर-धूमन आ गोइठापर आगि‍ दऽ राजाबाबूक पहि‍ल सन्‍तान अनील हाथमे दऽ अपने आमक गाछीमे राजाबाबूकेँ डाहि‍-जारि‍ सभ कि‍यो घर घुमला।   
कौल्हुका राजाबाबू आइ अपन महलकेँ सुन्न कऽ पत्नीकेँ कोइली जकाँ कुहकैले छोड़ि‍ चलि‍ गेला। पत्नीक वएस मात्र पचीसेक आस-पास, सन्‍तानो तँ मात्र दुइएटा। मुदा अपन कर्मक अनुसार आइ कोइली बनि‍ कुहैक रहल छथि‍। काल्हि‍ तक जे सोल्हो सिंगार आ बत्तीसो आवरण केने साक्षात् राधाक प्रति‍मूर्ति मेनका आ उर्वशी सुन्नरि‍ छेली ओ आइ उज्जर दप-दप साड़ी पहि‍रि कुहैक रहल छलि‍। केतए गेलनि‍ भरि‍ हाथ चुड़ी, केतए गेलनि‍ भरि‍ माङ सेनुर...। सभटा धूआ-पोछा गेल। केकरो साहसे ने होइ जे सामने जा बोल-भरोस हुनका दैत। समुच्‍चा टोल सुनसान-डेरौन लगैत। तही बीच छह मास धरि‍ ओकर कुहकब केकरा हृदैकेँ ने बेधि‍ दैत। केना ने बेधि‍ दैत!
आखि‍र वेचारीक वएसे की भेलै। मुदा छओ मास तँ भेले ने रहै आकि‍ ओ घरसँ बाहर, आँगनसँ डेढ़ीआ आ डेढ़ीआसँ टोला-पड़ोसामे डेग बढ़बए लगली। जे कहि‍यो हुनक पएरो ने देखने रहनि‍ ओ आब मुहोँ देखि‍ रहल अछि‍। हुनक हेल-मेल सभसँ पढ़ल जा रहल छन्‍हि‍। आब तँ ओ अपना घरमे कम आनका आँगनमे बेसी समए बि‍तबए लगली। सासु-ि‍दयादि‍नीक गपकेँ छोड़ि‍ अनकर गपपर बेसी धि‍यान दि‍अ लगली। नीक आ अधला तँ सभ समाजमे ने लोक रहै छै। से आब कि‍छु लोक हुनका गुरु मन्‍तर दि‍अ लगलखि‍न। आ ओहो नीक जकाँ धि‍यान-बात दि‍अ लगली। जहि‍ना कहबी छै जे खेत बि‍गड़ि‍‍ गेल खढ़ बथुआ सन ति‍रि‍या बि‍गड़ए जँ जाइ हाट-बजार...। जे काल्हि‍ तक ओकर उकासीओ ने कि‍यो सुनने छल से आइ तँ ओ उड़ाँत भऽ गेलि‍। बि‍ना कोनो धड़ी-धोखाक गामक मुखि‍या-सरपंचक संग हँसि‍-हँसि‍ बजै-भुकए लगली। गामक राजनीति‍मे हाथ बँटबए लगल। गामक उचक्का छौड़ा सभ संगे हाट-बजार करए लगल।
एतबे नै, ओ अपन जीवन-यापनक बहाना बना ब्‍यूटीपार्लर सेहो जाए लगली। सत्संगे गुणा दोषा रंगीन दुनि‍याँ आ वातावरणक प्रभाव ओकरापर पड़ल लगल। ओकर अपन वैधव्‍य जि‍नगी पहाड़ सन लागए लगलै। आब ओ चाहए जे ई उजरा धूआ-साड़ीकेँ फेकि‍ रंगीन दुनि‍याँमे चलि‍ आबी। ओ रसे रसे-रसे उजड़ा साड़ी छोड़ि‍ हल्का छि‍टबला साड़ी पहि‍रए लगल। मन जे एते एकरंगाह रहै से आब सभरंगाह हुअ लगलै। रूप-गुण लछन-करम सभ बुझू जे बदलए लगल। आब ओकर मौलाएल गाछक फूल खि‍लए लगल। एक दि‍न मुखि‍याकेँ कहि‍-सुनि‍ इन्‍दि‍रा अवास स्‍वीकृति‍ करौलक आ बि‍च्‍चे आँगनमे घर बना लेलक। आब जे कि‍यो छौड़ा-माड़रि‍ भेँट-घाँट करए आबए तँ ओ ओही घरमे बैसा चाह-पान करए लगल। चाहो-पान होइ आ हँसी चौल सेहो। एते दि‍न जेकरा भाफो नै नि‍कलै तेकर आब हँसीक ठहाका दरबज्‍जोपर लोक सुनए लगल। गामक आ टोलक बि‍स्‍कुटी लोकक चक्कर-चाि‍लमे पड़ि‍ ओ भैंसुरसँ अरारि‍ कऽ अपन हक-हि‍स्‍सा लेल लड़ए लगली। लड़ि‍-झगड़ि‍ सर-समाजकेँ बैसा पर-पंचायत कऽ ओ बाध-बोनसँ लऽ चर-चाँचर, वाड़ी-झारी एतबे नै डीह तक बाँटबा लेलक। आब तँ कहबी परि‍ भऽ गेल जे अपने मनक मौजी आ बहुकेँ कहलक भौजी। जखनि‍ जे मन फुड़ै तखनि‍ सएह करए। कि‍यो हाँट-दबार करैबला नै। कारणो छेलै, जँ कि‍यो कि‍छु कहैक साहसो करए तँ अपन इज्‍जत अपने गमा बैसए। आब तँ ओ चर्चेआम भऽ गेलि‍। अही बीच ओ एकटा छौड़ाक संग बम्‍बै पड़ा गेल। आहि‍ रे बा! परात होइते घोल-फच्‍चका शुरू भेल ‘कनि‍याँ केतए गेली केतए गेेली’ आकि‍ दू दि‍नक बाद मोबाइल आएल जे ओ तँ बम्‍बैमे अछि‍ फलल्‍मा छौड़ाक संग। ओना गामोसँ मोबाइल कएल गेल जे कनि‍याँ गाम घूमि‍ आबथि‍। मुदा ओ तँ अपने सखमे आन्‍हर।
कि‍छु दि‍नक बाद जेना-तेना पकड़ि‍-धकड़ि‍ ओइ छौड़ाक संग गाम आनल गेल। मुदा ओ तखनो सबहक आँखि‍मे गर्दा झोंकि‍ कोट मैरेज कऽ लेलक तेकर बादे गाम आएल। एतेक भेला बादो गामक समाज बजौल गेला। सभ तरहेँ सभ कि‍यो समझबैक परि‍यास केलनि‍। मनबोध बाबा जे गामक मुँहपुरुख छथि‍ ओ ओकरा बुझबैत कहलखि‍न-
सुनू कनि‍याँ, अखनो कि‍छु ने बि‍गड़लै हेन, आबो ओइ छौड़ाक संग-साथ छोड़ि‍ गंगा असलान कऽ समाजक पएर पकड़ि‍ लि‍औ। जे भेलै से भेलै। सभ अहाँकेँ जाति‍मे मि‍ला लेत। जाति‍ नाम गंगा होइ छै।
मुदा मनबोध बाबाक बातक कोनो असरि‍ ओकरापर नै पड़लै। ओइ छौड़ाक संग-साथ छौड़ैले तैयार नै भेल। अन्‍तमे गौआँ-घरूआक संग मनबोध बाबा ओकरा जाति‍सँ बाड़ि‍ आँगनासँ ई कहैत‍-
“एकरा आँगनमे राखब उचि‍त नै ई कनि‍याँ कनि‍याँ नै छुतहरि‍ छी छुतहरि‍...।”
हम ओत्तै ठाढ़ भेल कि‍छु ने बाजि‍ सकलौं, कि‍छु ने कऽ सकलौं। की नीक की अधला से तखनि‍ नै बूझि‍ पेलौं जे आइ बूझि‍ रहल छी अखनो समाजकेँ समाढ़ गहि‍आ कऽ पकड़ने अछि‍।

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